Thursday, June 23, 2011

काम, क्रोध, लोभ


विनय बिहारी सिंह




गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है- काम, क्रोध और लोभ मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं। इनसे जो मुक्त है, वही ईश्वर के पथ पर आसानी से चल सकता है। इसी को परमहंस योगानंद जी ने लिखा है कि डिजायर, एंगर एंड ग्रीड आर वर्स्ट एनिमीज आफ अ डिवोटी। परमहंस जी ने गीता की अद्भुत व्याख्या की है। दो खंडों में उनकी पुस्तक है- गॉड टाक्स विद अर्जुन। उसे जितनी बार पढ़िए उतनी बार आप एक नए आध्यात्मिक अर्थ को जानेंगे। कामनाएं ही तो मनुष्य को नचाती हैं। यह चाहिए, वह चाहिए, या यह मिल जाता, यह मिल जाता तो जीवन सुखी हो जाता। लेकिन भगवान ने कहा है कि भौतिक वस्तुओं से सुख नहीं मिलेगा। मनुष्य इच्छाओं की सैकड़ों फांसियों में जकड़ा हुआ है। वह उससे मुक्त नहीं होना चाहता। स्त्री, पति, पुत्र, परिवार, मित्र नाते- रिश्ते और यह मोहिनी माया। वह भले ही छटपटा रहा हो, लेकिन उससे दूर नहीं जाना चाहता। भगवान ने कहा है- अर्जुन, इस दुखों के समुद्र रूपी संसार से बाहर निकलो। कैसे? वैराग्य और ईश्वर की अनन्य भक्ति से। साधना से। समूची भगवद् गीता में भगवान ने अर्जुन से कहा है सात्विक भोजन, सात्विक कर्म और सात्विक साधना की सहायता से तुम्हें मुक्ति का मार्ग मिल जाएगा अर्जुन। भगवान ने अर्जुन से ही नहीं परोक्ष रूप से यह बात हम सबसे भी कही है। इस पर जितना मनन किया जाए उतना ही अच्छा।

1 comment:

वन्दना said...

प्रभु भक्ति से सब कुछ संभव है।