Wednesday, December 31, 2008

रामकृष्ण वचनामृत के लेखक- श्री म




विनय बिहारी सिंह

रामकृष्ण वचनामृत के लेखक श्री म उच्च कोटि के संत थे। आप चौंक सकते हैं- श्री म कौन सा नाम है? दरअसल उनका नाम था- महेंद्रनाथ गुप्त। लेकिन वे नहीं चाहते थे कि उनका नाम प्रचारित हो। रामकृष्ण परमहंस उनके गुरु थे और वे चाहते थे कि लोग उनके गुरु के बारे में जानें, उनके बारे में नहीं। जब सबने कहा कि आखिरकार किताब के लेखक के तौर पर कोई नाम तो जाना चाहिए। तो उन्होंने अपना नाम रख लिया- म। लेकिन प्रकाशन प्रभारी को सिर्फ म अच्छा नहीं लगा इसलिए किताब के लेखक के नाम के पहले श्री लगा दिया गया- श्री म। लेकिन उन्हें प्यार व श्रद्धा से लोग मास्टर महाशय कहते थे। कलकत्ता के अमहर्स्ट स्ट्रीट में वे रहते थे। श्री म वैसे तो गणित के श्रेष्ठ अध्यापक थे और आजीविका के लिए उन्होंने रिटायर होने के बाद भी पढ़ाना जारी रखा लेकिन उनका ज्यादातर समय साधना में ही बीतता था। वे मां काली के अनन्य भक्त थे। परमहंस योगानंद जब बच्चे थे तभी उनकी मां का देहांत हो गया। उन्हें लगा कि अब मां से भेंट तो नहीं हो सकेगी। लेकिन जगन्माता से तो भेंट हो सकती है। क्यों न श्री म या मास्टर महाशय से इसके लिए प्रार्थना की जाए। वे एक दिन मास्टर महाशय के घर पहुंचे औऱ उनसे प्रार्थना की कि क्या वे जगन्माता का दर्शन नहीं करा देंगे? काफी संकोच के बाद श्री म यानी मास्टर महाशय राजी हो गए। उसी दिन जब परमहंस योगानंद जी अपने घर की छत पर बने अपने ध्यान करने वाले छोटे से कमरे में ध्यानमग्न थे तो जगन्माता ने दर्शन दिए। तब रात के १० बजे थे। अचानक अद्भुत प्रकाश चमका और जगन्माता के दर्शन हुए। अपनी मशहूर पुस्तक योगी कथामृत में परमहंस योगानंद ने इस घटना का रोचक उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है- जगन्माता (शायद काली माता) अत्यंत सुंदर थीं। जगन्माता ने कहा- मेरे बेटे मैं तो तुम्हें हमेशा प्यार करती हूं और करती रहूंगी। अगले ही दिन वे सुबह- सुबह मास्टर महाशय के घर पहुंचे और उनसे पूछा- जगन्माता ने मेरे बारे में क्या कहा? मास्टर महाशय ने उनसे कहा- आप मेरी परीक्षा ले रहे हैं छोटे सर। क्या जगन्माता ने आपके घर पर कल रात १० बजे आपको दर्शन नहीं दिया? आपसे बातें नहीं कीं? परमहंस योगानंद जी समझ गए कि मास्टर महाशय उच्च कोटि के संत हैं। मास्टर महाशय कोई भी बात कहते थे तो यह नहीं कहते थे कि यह उनका विचार है। वे हमेशा यही कहते थे कि- ऐसा मेरे गुरु ने कहा था। क्या अद्भुत भक्ति है। वे जब चाहे जगन्माता से बातें कर सकते थे। परमहंस योगानंद जी कई बार उनके साथ दक्षिणेश्वर के कालीमंदिर में गए और वहां अलौकिक अनुभूतियां पाईं। मास्टर महाशय ने डूब कर रामकृष्ण वचनामृत लिखा है। इसका हिंदी में अनुवाद किया है हिंदी के मशहूर कवि- लेखक सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने। निराला जी ने खुद ही मां सरस्वती की जो वंदना लिखी है वह अत्यंत लोकप्रिय है- वर दे वीणा वादिनी, वर दे। मास्टर महाशय ने कुछ चमत्कार भी किए। जैसे एक बार वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सामने परमहंस योगानंद की छाती पर हल्का सा थपथपाया और अचानक सभी आवाजें आनी बंद हो गईं। कारें, ट्राम और अन्य वाहन मानो बिना शब्द के चल रहे थे। परमहंस योगानंद जी ने लिखा है कि उन्हें चारो तरफ दिखाई देने लगा। यानी उनके सिर के पीछे क्या हो रहा है वह भी दिखाई देने लगा। उनके बाएं और दाएं भी। अद्भुत अनुभव था। परमहंस योगानंद के कुछ मित्र उनकी ओर देखते हुए गुजरे लेकिन ऐसे मानों उन्हें पहचानते न हों। परमहंस योगानंद जी को इस हालत में परम शांति का अनुभव हुआ था। परमहंस योगानंद ने बड़े होकर समूचे विश्व में योग का प्रचार किया। उन्होंने भारत में योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया और अमेरिका में सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप की स्थापना की। ये दोनों संस्थाएं आज भी चल रही हैं और यहां योग्य भक्तों को क्रिया योग की दीक्षा दी जाती है।

Tuesday, December 30, 2008

ये संत- महात्मा करते क्या हैं?




विनय बिहारी सिंह


कई मित्रों ने सवाल किया है कि संत- महात्मा करते क्या हैं? वे समाज का भला तो करते नहीं? आज इसी पर विचार किया जाए। लेकिन यहां उन कथित बाबाओं, संतों वगैरह की बात नहीं हो रही जो धर्म या आध्यात्म को धन और ख्याति के बाजार में उतरने की सीढ़ी मानते हैं। उनकी संख्या आज बहुत ज्यादा हो चली है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म, अध्यात्म या संसार के सभी धर्म ग्रंथ व्यर्थ हैं। आज भी इन धर्म ग्रंथों की प्रासंगिकता है। यहां उनकी बात हो रही है जो परमार्थ के लिए संत हैं या बीते समय में रहे हैं।


-वृक्ष कबहुं न फल भखै, नदी न संचै नीर।


परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर।।


(वृक्ष कभी अपना फल नहीं खाता, न ही नदी अपना जल संचित करती है। साधु परमार्थ के कारण ही शरीर धारण करता है)।


इससे तो साफ हो गया कि साधु- संतों का काम क्या है। आध्यात्म तो विग्यान है (तकनीकी कारणों से ग्य ऐसे ही लिख पा रहा हूं)। हमारे दिमाग में १०० बिलियन न्यूरांस होती हैं। जब हम नींद में होते हैं इनमें से ज्यादातर सुषुप्ता अवस्था में होती हैं। लेकिन ज्योंही हम जग जाते हैं, ये सक्रिय हो जाती हैं। जागते ही हमारा दिमाग चारो तरफ दौड़ने लगता है। सच्चे साधु- संतों ने हमें सिखाया है कि दिमाग को कैसे शांत रख सकते हैं। आइंस्टाइन ने हमें बताया था- इनर्जी इज इक्वल टू मैटर। यानी पदार्थ को ऊर्जा में बदला जा सकता है। इसी तरह ऊर्जा को भी पदार्थ में बदला जा सकता है। फिर आइंस्टाइन ने ही कहा- अगर किसी ऊर्जा को माइनस २७३ डिग्री सेल्सियस तक ले जाया जाए तो वह जिरो इनर्जी यानी ऊर्जा विहीन की स्थिति होगी। इसे ही हम टोटल केल्विन स्टेट कहते हैं। ध्यान या मेडिटेशन के जरिए, हम इसी टोटल केल्विन स्टेट तक पहुंचते हैं। तब हमारा मन एकाग्रचित्त हो जाता है। संत- महात्मा हमें इसी टोटल केल्विन स्टेट तक पहुंचने का वैग्यानिक तरीका बताते थे। इससे क्या फायदा होता है? इसे बताने की जरूरत है क्या? मन जब शांत रहेगा तो हमारा दिमाग ज्यादा रचनात्मक होगा। झगड़ा- फसाद औऱ तनाव से मुक्त होने का तरीका साधु- संत पैसा लेकर नहीं बताते थे। वे तो इसे मुफ्त में बांटते थे। व्यक्ति से ही तो समाज, देश औऱ दुनिया बनती है।

Monday, December 29, 2008

गंध बाबा



विनय बिहारी सिंह


गंध बाबा के नाम से प्रसिद्ध विशुद्धानंद परमहंस सूर्य विग्यान के प्रवर्तक माने जाते हैं। वे तत्काल कोई भी गंध पैदा कर सकते थे। गुलाब, चमेली, केवड़ा और ऐसे ही अनंत फूलों का गंध पैदा करने में उन्हें एक सेकेंड लगता था। वे सिर्फ गंध ही नहीं, फल, मिठाई या कुछ भी हवा से पैदा कर देते थे। लेकिन ठहरिए। हवा से नहीं, सूर्य की किरणों से पैदा करते थे क्योंकि सूर्य विग्यान में वे पारंगत थे। तो फिर रात को सूर्य की किरणें कहां रहती हैं? उनका कहना था सूर्य की किरणों का प्रभाव रात में भी रहता ही है। सूर्य विग्यान, चंद्र विग्यान, नक्षत्र विग्यान, वायु विग्यान और शब्द विग्यान पर उनकी पुस्तकें आज भी मिल सकती हैं। वे एक वस्तु को दूसरे में बदलने में माहिर थे। यानी आपके सामने अगर एक गिलास रखा है तो उसे वे बड़े मेज में बदल सकते थे। गंध बाबा यानी विशुद्धानंद सरस्वती १८वीं शताब्दी में पैदा हुए और उनका निधन १९३७ में हुआ था। यह प्रश्न सहज ही उठ सकता है कि उनकी जन्मतिथि कैसे पता चलेगी? जैसा कि अनेक संतों के साथ यह रहस्य है, गंध बाबा की प्रामाणिक जन्म तिथि कहीं उपलब्ध नहीं है। उनके एक प्रसिद्ध भक्त गोपीनाथ कविराज ने लिखा है कि एक बार वे सिद्धियों के बारे में उन्हें (गोपीनाथ कविराज को) समझा रहे थे। इसी क्रम में उन्होंने अपनी तर्जनी उंगली को इतना लंबा और मोटा कर दिया कि वे अवाक् रह गए। गोपीनाथ कविराज काफी दिनों तक वाराणसी में रहे औऱ बाद में वे कोलकाता के पास मध्यमग्राम नामक इलाके में बस गए औऱ अंतिम समय तक वहीं रहे। वे गंध बाबा के बहुत करीबी शिष्य थे और उच्च कोटि के साधक थे। उन्होंने भी विस्तार से अपने गुरु के बारे में लिखा है। गंध बाबा का कहना था कि मान लीजिए कपूर बनाना है। तो सूर्य की श्वेत रश्मियों के ऊपर क म त र शब्द स्थापित कर देने से कपूर तत्काल आपके सामने हाजिर हो जाएगा। लेकिन कपूर में तो म या त शब्द है ही नहीं? इस पर वे मुस्करा देते थे। यानी यह रहस्य है। बहरहाल गंध बाबा कहते थे कि यह सब चमत्कार ईश्वर की शक्तियों का मामूली अंश है। कोई भी यह चमत्कार कर सकता है, बशर्ते कि उसमें एकाग्रता और अत्यंत गहरी आस्था हो।

Friday, December 26, 2008

संत नामदेव



विनय बिहारी सिंह


संत नामदेव अपने समय के विलक्षण संत थे। उनका जन्म तो महाराष्ट्र के सतारा जिले के गांव नारस वामनी में हुआ था। लेकिन उनके जन्म के बाद ही उनके माता- पिता सोलापुर जिले के पंढरपुर में बसने चले गए। पिता दर्जी का काम करते थे। पंढरपुर में ही भगवान का एक मंदिर था- जिसे विट्ठल या विठोवा कहा जाता था। जब नामदेव पांच साल के थे तो उनकी मां ने कुछ प्रसाद चढ़ाने के लिए दिया और कहा कि वे इसे विठोवा को चढ़ा दें। नामदेव सीधे मंदिर में गए और विठोवा को प्रसाद चढ़ा कर कहा कि इसे खाओ। लोगों ने कहा- यह मूर्ति है। खाएगी कैसे? लेकिन नामदेव मानने को तैयार नहीं थे कि विठोवा उनका प्रसाद नहीं खाएंगे। बच्चे की जिद मान कर सब अपने- अपने घर चले गए। मंदिर में कोई नहीं था। नामदेव धाराधार रोए जा रहे थे और कह रहे थे- विठोवा या तो यह प्रसाद खाओ नहीं तो मैं यहीं, इसी मंदिर में जान दे दूंगा। दिल को चीर देने वाली बच्चे की कारुणिक पुकार सुन कर विठोवा पिघल गए। वे हाड़- मांस के जीवित व्यक्ति के रूप में प्रकट हुए और विठोवा का प्रसाद खाया। नामदेव को भी खिलाया। नामदेव तो विठोवा के दीवाने हो गए। दिन- रात विठोवा, विठोवा या विट्ठल, विट्ठल की रट लगाए रहते थे। धीरे- धीरे स्थिति यह हो गई कि नामदेव की हर सांस विठोवा के नाम से चलने लगी। नामदेव ने कई चमत्कार भी किए। लेकिन मजा यह था कि नामदेव को यह मालूम नहीं था कि वे चमत्कार कर सकते हैं। एक व्यक्ति का एक पैर बिल्कुल खराब था। उसे विठोवा मंदिर की सीढियां चढ़ने में बहुत कष्ट होता था। नामदेव ने उसके खराब पैर को थोड़ी देर के लिए सहलाया औऱ उस व्यक्ति के पैरों में ताकत आ गई। वह व्यक्ति तो नामदेव के पैरों पर ही गिर पड़ा। नामदेव चकित थे, बोलेम- एसा क्यों कर रहे हो मित्र? वह बोला- भगवन आपने मेरे ऊपर असीम कृपा कर दी। नामदेव भोले ढंग से बोले- मेरी क्या ताकत है मित्र? सब विठोवा करते हैं। बहाना किसी को बना देते हैं। जो तुम हो वही मैं हूं।

Thursday, December 25, 2008

पहले परमात्मा को चाहो, चीजों को नहीं- जीसस क्राइस्ट



विनय बिहारी सिंह


जीसस क्राइस्ट परमात्मा के अवतार थे। उन्होंने कहा- सीक ये द गॉड, आल थिंग्स विल बी एडेड अन टू यू। यानी सबसे पहले परमात्मा को चाहो। उसे पाओ। बाकी सारी चीजें तुम्हारे पास खुद ब खुद दौड़ी चली आएंगी। वह चीजें भी जिनकी हमें जरूरत है और हमें इसका भान तक नहीं है। परमात्मा सर्वग्य हैं। वे सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान भी हैं। आज क्रिसमस के दिन जीसस क्राइस्ट को सभी एक बार याद करते हैं क्योंकि वे करुणा, क्षमा, दया, प्यार और बेसहारों के सहारा हैं। परमहंस योगानंद ने जीसस क्राइस्ट पर बहुत खूबसूरत पंक्तियां लिखी हैं-क्लाउड कलर जीसस कमओ माई क्लाउड कलर जीसस कमओ माई क्राइस्ट, ओ माई क्राइस्टओ माई क्राइस्ट, ओ माई क्राइस्टजीसस क्राइस्ट कम।क्लाउड कलर जीसस कम।। कई चित्र ऐसे भी हैं जिनमें भगवान कृष्ण और जीसस क्राइस्ट हाथ में हाथ मिला कर चल रहे हैं। दरअसल गीता और बाइबिल की कई बातें एक जैसी हैं। कोलकाता में क्या हिंदू और क्या ईसाई सभी क्रिसमस को उत्सव के रूप में मनाते हैं। जीसस क्राइस्ट ने कहा- मैं ईश्वर का पुत्र हूं। लेकिन उन्होंने यह भी कहा- तुम भी ईश्वर के पुत्र हो। उन्होंने कहा- मनुष्य को भगवान ने अपने रूप में बनाया है। परमहंस योगानंद ने जीसस क्राइस्ट के बारे में बहुत लिखा है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है- सेकेंड कमिंग आफ क्राइस्ट। यह पुस्तक जीसस क्राइस्ट के दर्शन और उनकी महानता को स्पष्ट तरीके से सामने लाती है। भारत सर्व धर्म समभाव वाला देश है। हमारा देश मानता है कि इस पृथ्वी पर जितने भी संत- महात्मा हुए हैं, उन्होंने अपने समय में मनुष्य का बड़ा उपकार किया है। मनुष्य को उनका आभारी होना चाहिए। जीसस क्राइस्ट ने मनुष्य को करुणा, प्रेम, दया और सहानुभूति का जो पाठ पढ़ाया, वह अद्भुत है। आज समूचे विश्व में क्रिसमस धूमधाम से मनाया जाता है। भगवान कृष्ण की तरह जीसस क्राइस्ट की असीम करुणा और दया के सागर हैं। वे मनुष्य ही नहीं सभी जीवों पर कृपा करें, यही हमारी प्रार्थना है।

Wednesday, December 24, 2008

भगवान श्रीकृष्ण का कर्मयोग संदेश




विनय बिहारी सिंह

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कर्मयोग की श्रेष्ठ व्याख्या की है। उन्होंने कहा है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन तो करना ही चाहिए। अकर्मण्य नहीं रहना चाहिए। लेकिन कर्तव्य करते हुए कर्ता भाव नहीं रहना चाहिए। यानी यह काम मैं कर रहा हूं, यह सोच नहीं होनी चाहिए। मेरी रोजी- रोटी का काम ईश्वर चला रहे हैं। जो मैं भोजन कर रहा हूं, उसे ईश्वर दे रहे हैं। जो मैं सांस ले रहा हूं, वह भी ईश्वर की कृपा से ही संभव है। इस तरह खाते, सोते, जागते, काम करते हुए और यहां तक कि फूलों को देखते हुए भी ईश्वर का आभार जताना चाहिए। हर सुंदर कार्य में ईश्वर को शामिल करते हुए आपका जीवन भी सुंदर हो जाएगा, यही भगवान का संदेश है। भगवान श्रीकृष्ण ने यह भी कहा है कि फल की आशा न करो। यानी जब हम अच्छा काम करेंगे तो उसका फल तो अच्छा होगा ही। उसकी उम्मीद करने से बेहतर है अगला काम और बेहतर हो। इस तरह हमारा जीवन बेहतर से बेहतरीन होता जाएगा। फल की उम्मीद में ठिठकना नहीं है। काम करते जाना है। कई संत तो यह भी कहते हैं कि भगवान से अहेतुक प्रेम होना चाहिए। यानी आप प्यार करें या न करें, मैं आपके बिना एक पल भी नहीं रह सकता। मैं आपको प्यार करता हूं। बस, भगवान तो ऐसे भक्तों के वश में आ जाते हैं। लेकिन जहां उनसे मांगने लगेंगे- यह दो, वह दो तो वहां निस्वार्थ प्रेम गायब हो गया। अरे भगवान तो अंतर्यामी हैं। क्या वे नहीं जानते कि मेंरे भक्त को क्या चाहिए? वे जानते हैं। उनसे मांगना क्या है। और अगर वे नहीं भी देते हैं तो न दें। हमें तो उनका प्यार चाहिए। मैं उन्हें प्यार करता हूं क्योंकि वे हमारे पिता हैं, माता हैं, सखा हैं, सबकुछ तो वही हैं- त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव, त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव। लेकिन भगवान निष्ठुर नहीं हैं। वे गीता के १८वें अध्याय में अर्जुन से कहते हैं- सर्व धर्मान परित्यज्ये, मा मेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्व पापेभ्यो, मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।(सभी धर्मों को छोड़, मेरी शरण में आ जाओ अर्जुन। मैं तुम्हें सभी पापों (अन्याय के खिलाफ युद्ध के संदर्भ में) से मुक्त कर दूंगा। शोक मत करो।)वे तो करुणा सागर हैं। उनकी शरण में जाने से परम शांति और स्थिरता आ जाती है।

Tuesday, December 23, 2008

ईश्वर का पुत्र


ईसाई धर्म में जीससका क्या स्थान है, इससे हर कोई भलीभांति परिचित है। लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि जीससको केवल इसलिए सूली पर चढा दिया गया था, क्योंकि वे खुद को ईश्वर का पुत्र मानते थे।
दरअसल, रोमन साम्राज्य के अंतर्गत आता था जीससका देश जूडिया।रोमन गवर्नर पांटियसपायलट की एक पागल व निर्दोष व्यक्ति को सूली पर चढाने में कोई रुचि नहीं थी। एक ऐसा आदमी, जो दावा करता था कि मैं ईश्वर का एकमात्र पुत्र हूं।
दरअसल, उसे अधिकतर लोग पागल ही मानते थे। लेकिन वह किसी व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुंचा सकता था। पांटियसपायलट ने माना कि जीससनिर्दोष हैं और उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है। यदि उन्हें इस विचार से आनंद मिलता है कि वह ईश्वर का एकमात्र पुत्र है, तो उन्हें ऐसा सोचने देना चाहिए।
वास्तव में, यदि आपके मन में ईष्र्या के भाव पैदा हो रहे हैं, तभी दूसरे प्रकार के विचार आ सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति सोचे कि मैं ईश्वर का एकमात्र पुत्र हूं, तो उस व्यक्ति के प्रति विरोध प्रकट करने का सवाल ही नहीं उठता है! क्योंकि किसी भी व्यक्ति के पास इस बात का कोई ठोस प्रमाण ही नहीं है कि वह ईश्वर का पुत्र है या नहीं! व्यक्ति न केवल ईश्वर का पिता हो सकता है, बल्कि वह ईश्वर का पुत्र और भाई भी हो सकता है। यह व्यक्ति मात्र की कल्पना हो सकती है। यदि आप किसी व्यक्ति से मिलते हैं और वह आपसे कहता है कि वह ईश्वर का पुत्र है, तो क्या आप यह सोचते हैं कि उस व्यक्ति को सूली पर चढा देना चाहिए?
संभव है कि आप यह सोचें कि सामने वाला व्यक्ति अपनी राह से भटक गया है। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि उसे सूली पर चढा दिया जाए। सच तो यह है कि उस व्यक्ति को आनंद मनाने का पूरा अधिकार है। अब यदि दूसरे शब्दों में कहें, तो आपको उस व्यक्ति का उत्साह और बढाना चाहिए, क्योंकि ईश्वर को पाना बहुत कठिन है और आपने ईश्वर के रूप में पिता को पा लिया है। यह संभव है कि वह आपको ईश्वर के ठिकाने का कोई संकेत बता दे।
जीससने किसी व्यक्ति को कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था। एक शहर से दूसरे शहर में जाकर यह कहना कि मैं ईश्वर का एकमात्र पुत्र हूं, यह कोई अपराध नहीं है। लेकिन यह यहूदियों के स्वाभिमान के लिए खतरनाक था, क्योंकि एक गरीब इनसान उनसे कह रहा था कि वह ईश्वर का पुत्र है! अन्यथा यह एक निर्दोष मामला था, उस बेचारे पर तनिक भी क्रोध प्रकट करने की कोई आवश्यकता नहीं थी! आपको स्वच्छ और बोझ-रहित होना होगा, क्योंकि आप शिखर को छूने जा रहे हैं। ये सारे बोझ आपकी प्रगति को बाधित कर देंगे। आप सत्य को जानने जा रहे हैं, इसलिए सत्य के संबंध में किसी धारणा को मत ढोएं, क्योंकि यही धारणा आपके और सत्य के बीच में अवरोध बन जाएगी। -[ओशो]

Monday, December 22, 2008

सारे महत्वपूर्ण विभाग माताओं के पास



विनय बिहारी सिंह
सभी जानते हैं कि मां सरस्वती विद्या की देवी हैं। वे मातृ शक्ति हैं। देखा जाए तो सारे महत्वपूर्ण विभाग मातृ शक्ति के पास हैं। रक्षा, विदेश औऱ गृह मंत्रालय विभाग मां दुर्गा और काली के पास है, शिक्षा विभाग- मां सरस्वती के पास औऱ फाइनेंस या वित्त मां लक्ष्मी के पास हैं। ये माताएं शक्ति स्वरूपा हैं। कहा जाता है शक्ति के बिना कुछ नहीं। सच तो है। बिना शक्ति के हम अपने मुंह में खाना तक नहीं डाल सकते। हमारे पूरे शरीर की देखभाल माताएं ही करती हैं। तब हम क्यों न मां की अराधना करें। कहा भी गया है- या देवी सर्वभूतेसु, शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः। मां सरस्वती शिक्षा की देवी हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम पढ़े- लिखें नहीं और सिर्फ सरस्वती की पूजा करें। नहीं। सरस्वती की पूजा करने का अर्थ है- गहन अध्ययन, मनन और अपने विषय में पटु होना। पढ़ने, गुनने से ही मां सरस्वती खुश होती हैं। शिक्षा के जितने भी अंग हैं- कला, संगीत, तकनीक और अन्य शिक्षाएं उसकी जनक मां सरस्वती ही हैं। हमारा सौभाग्य है कि शिक्षा विभाग, रक्षा विभाग और वित्त विभाग माता के पास है।

Friday, December 19, 2008

चैतन्य देव क्यों हैं महाप्रभु?

विनय बिहारी सिंह

कुछ लोग सवाल करते हैं कि प्रभु तो ठीक है लेकिन चैतन्य देव को चैतन्य महाप्रभु क्यों कहा जाता है? है न रोचक सवाल? लेकिन इसका जवाब भी उतना ही रोचक है। चैतन्य देव को गौरांग महाप्रभु, चैतन्य महाप्रभु और यहां तक कि संक्षेप में महाप्रभु भी कहा जाता है। पश्चिम बंगाल में आपको अनेक दुकानें दिख जाएंगी, जिनका नाम महाप्रभु स्वीट्स या महाप्रभु स्टोर आदि है। ठीक वैसे ही जैसे- रामकृष्ण स्टोर या रामकृष्ण स्वीट्स आदि। तो चैतन्य देव महाप्रभु क्यों हैं? भगवान कहते हैं कि भक्त हमारे, हम भक्तन के। कहीं- कहीं उन्होंने यह भी कहा है कि भक्त हमसे भी बड़ा है। अगर प्रभु इतने बड़े हैं तो उनका अनन्य भक्त महाप्रभु होगा ही। लेकिन सभी भक्त महाप्रभु नहीं हो सकते। जो अनन्य भक्त होगा। यानी जो प्रभु के अलावा और कुछ सोच ही नहीं सकता। सोते, उठते, बैठते, स्नान करते, काम करते यानी हर क्षण, ईश्वर में ही रमा रहने वाला भक्त महाप्रभु हो सकता है।
एक बार चैतन्य महाप्रभु हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे गाते हुए चले जा रहे थे। रा्स्ते में एक धोबी अपनी पत्नी के साथ तालाब में कपड़े धो रहा था। चैतन्य महाप्रभु ने कहा- मेरे साथ कीर्तन करो। धोबी अनिच्छा से हरे राम हरे राम गाने लगा। देखते देखते वह इतना भाव विभोर हो गया कि उसके हाथ से कपड़ा छूट गया। उसकी पत्नी अवाक हो गई। बोली- यह क्या पागलपन है? चैतन्य महाप्रभु ने धोबी की पत्नी से भी कहा- तुम भी मेरे साथ कीर्तन करो। उसने कीर्तन करने से इंकार कर दिया। चैतन्य महाप्रभु ने कहा- एक बार, सिर्फ एक बार गाओ। अचानक धोबी की पत्नी भी कीर्तन करने लगी- हरे राम, हरे राम राम राम हरे हरे। उसके हाथ से भी कपड़ा छूट गया। धीरे- धीरे सारा गांव चैतन्य महाप्रभु के साथ कीर्तन करने लगा। ऐसा था प्रभाव चैतन्य महाप्रभु का। इसीलिए तो वे महाप्रभु हैं।

Thursday, December 18, 2008

पातंजलि योग सूत्र बार- बार पढ़ने योग्य

विनय बिहारी सिंह

पातंजलि योग सूत्र अद्भुत पुस्तक है। गीता प्रेस ने इसे प्रकाशित किया है। इसमें बताया गया है कि अष्टांग योग क्या है। अष्टांग योग- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। यम यानी क्या नहीं करना चाहिए। नियम यानी क्या करना चाहिए। आसन यानी कैसे बैठना चाहिए। प्राणायाम यानी श्वांस कैसे नियंत्रित करें। धारणा यानी ईश्वर की छवि मन में कैसे अंकित करें। ध्यान - ईश्वर पर आप लगातार ध्यान केंद्रित करें। समाधि- यह अंतिम स्थिति है। तब मन का ईश्वर में लय हो जाता है। यह तो संक्षेप में है। विस्तार से यह पातंजलि योग सूत्र में मिलेगा।
ध्यान- यानी ईश्वर पर लगातार ध्यान लगाना। सामान्य व्यक्ति का ध्यान लगातार ईश्वर पर नहीं लगता। लेकिन धीरे- धीरे अभ्यास से यह निरंतर भगवान में लीन हो जाता है। तब मन ईश्वर के अलावा और कहीं जाता ही नहीं। खाते, पीते, सोते, काम करते और यहां तक कि चलते- फिरते मन ईश्वर में ही लगा रहेगा। यह है मन का ईश्वर में लय होना। इसके लिए परमहंस योगानंद ने कई वैग्यानिक तकनीक बताए हैं जिसे ऋषि- मुनियों ने प्राचीन काल में विकसित किया है। परमहंस योगानंद की पुस्तक- योगी कथामृत में इसका विस्तार से वर्णन है। योगी कथामृत दुनिया की लगभग सभी भाषाओं में अनूदित हो चुकी है।

Wednesday, December 17, 2008

संत रैदास के बारे में कुछ नए तथ्य

विनय बिहारी सिंह

संत रैदास अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे। वे जब ध्यान में बैठते थे तो उन्हें होश नहीं रहता था कि कितने पहर रात बीत गई। कई बार तो वे सुबह तक ध्यानमग्न बैठे रहते थे और अगले दिन फिर अपने रोजमर्रा के कामों में जुट जाते थे। उनके चेहरे पर कोई थकान नहीं रहती थी। उल्टे उनका चेहरा तरोताजा और खूबसूरत दिखता था। संन्यासिनी मीरा बाई ने उन्हें यूं ही अपना गुरु नहीं बनाया था।
संत रैदास का भजन-
प्रभु जी तुम चंदन, हम पानी
बहुत ही प्रसिद्ध है और आज भी भक्त इसे सुन कर भाव विभोर हो जाते हैं। संत रैदास वैसे तो जूता- चप्पल सीने का काम करते थे, और उनकी स्कूली शिक्षा- दीक्षा कम ही हुई थी लेकिन उनका गयान बहुत गहरा था और बड़े बड़े विद्वान उनकी बातें सुनने के लिए लालायित रहते थे। उनका ग्यान किताबी नहीं, अनुभवजन्य था। संत रैदास से मिलने वालों में लगभग सभी समकाली विद्वान शामिल थे।
एक बार वे काफी थके थे। रात को वे खा- पीकर रात को ध्यान करने जा रहे थे तभी उनके यहां एक साधु आए और भोजन की इच्छा जताई। घर में एक दाना अनाज नहीं था। पड़ोस में मांगने गए लेकिन वहां भी अनाज नहीं था। तब वे रात को बनिए के घर गए। उसकी दुकान खुलवाई और उधार अनाज ले आए। दुकानदार रैदास की अहमियत जानता था। वह उनके चमत्कारों को देख चुका था। घर अनाज आया, खाना बना। अतिथि ने खाया और तब तक आधी रात बीत गई थी। लेकिन फिर भी संत रैदास ध्यान में बैठे और पूरी रात ध्यान करते रहे। थकान की उन्होंने परवाह नहीं की। ध्यान में प्रभु मिलन से ज्यादा सुख और ही क्या सकता है?

Tuesday, December 16, 2008

कबीर दास के बारे में कुछ नए तथ्य

विनय बिहारी सिंह

कबीर दास २४ घंटे ईश्वर के साथ रहते थे। जब वे कपड़े बुनते थे तब भी। बाजार जाते थे, तब भी। कैसे? वे हर काम ईश्वर को सौंप देते थे। यह साधारण व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। साधारण व्यक्ति हर क्षण ईश्वर चिंतन नहीं करता। कई बुरे विचार भी उसके दिमाग में आ जाते हैं। बुरे विचार ईश्वर को कोई कैसे सौंप सकता है? कोई सच्चा साधक ही हर काम ईश्वर के अधीन मान कर, खुद को ईश्वर का एक यंत्र मान कर भक्ति में मग्न रह सकता है। कबीर दास ने अपने मन को साध लिया था। वे कपड़े बिकने का हिसाब लगा रहे होते थे तो भी कहते थे- उसकी (ईश्वर की) कृपा से आज इतनी बिक्री हुई। जो आमदनी होती थी उसी संतोष कर लेते थे और जो साधु संत अतिथि के रूप में आते थे उनका सत्कार भी करते थे। लेकिन इसके लिए वे जम कर मेहनत करते थे। ज्यादा से ज्यादा कपड़े तैयार करते थे। हर वक्त भजन गाते रहते थे। वही भजन आज हम साखी, सबद और रमैनी के रूप में पढ़ रहे हैं। उनके शिष्य उसे नोट कर लेते थे और सुरक्षित रख लेते थे।
बाद के दिनों में कबीर दास ने कपड़े बुनना लगभग छोड़ ही दिया था। वे दिन रात भजन कीर्तन में लगे रहते थे। साधु सेवा, सत्संग या एकांत में बैठ कर ध्यान। अंतिम समय में वे मगहर चले गए। लोगों की मान्यता थी कि काशी में प्राण त्यागने पर स्वर्ग मिलता है। वे बहुत दिनों तक काशी में रहे। लेकिन जब उन्हें लगा कि उनका शरीर छोड़ने का समय आ गया है तो वे मगहर चले गए। वहां उनकी समाधि आज भी है।
लेकिन हाल ही में एक और तथ्य सामने आया है। मगहर में जब उनके शिष्यों में झगड़ा हुआ कि उन्हें दफनाया जाए या हिंदू रीति से जलाया जाए तो एक शिष्य ने अचानक उनका कफन उठा कर देखा कि कबीर दास का शव है ही नहीं। उसके बदले फूल ही फूल हैं। उसी का बंटवारा कर दिया गया। आधे को दफनाया गया और आधे को हिंदू रीति से जलाया गया। उसी दिन कबीर दास जी को मध्यप्रदेश में एक जंगल के किनारे नर्मदा स्नान करते हुए कई लोगों ने देखा। यह भी मान्यता है कि कई वर्षों तक वहीं वे अपनी साधना करते रहे। आज भी नर्मदा के किनारे कबीर दास जी की समाधि है।

Monday, December 15, 2008

तैलंग स्वामी के बारे में कुछ नए तथ्य

विनय बिहारी सिंह

तैलंग स्वामी के बारे में कुछ नए तथ्य जानकर बड़ी खुशी हुई। उन्होंने लगभग ४० साल की साधना की। तब जाकर वे अमरनाथ से लौट कर इलाहाबाद होते हुए वाराणसी में आए। वे अंत तक वहीं रहे। उनकी उम्र कितनी थी, यह किसी को नहीं मालूम। कई लोग ३०० साल बताते हैं तो कई ५०० साल तक।
उनके पास कोई थोड़ी देर के लिए भी बैठता था तो उसका मन शांति और आनंद से भर जाता था। ऐसे तपस्वी दुर्लभ होते हैं। वे पंचगंगा घाट, दशाश्वमेध घाट और कभी कभी मणिकर्णिका घाट पर रहते थे। उन्होंने असाध्य रोगों से पीड़ित अनंत लोगों को स्वस्थ किया। लेकिन कभी भी स्वस्थ कर देने का श्रेय खुद को नहीं देते थे। एक बार एक दुबला पतला व्यक्ति बीमार पड़ा। वह तैलंग स्वामी जी की कृपा से स्वस्थ तो हो गया लेकिन उसका शरीर हड्डियों का ढांचा रह गया। उसने कई टानिक वगैरह पीए। कुछ नहीं हुआ। वह फिर तैलंग स्वामी की शरण में गया। उन्होंने कहा- रोज एक गिलास दूध पीया करो। उसने कहा- मैं तो रोज पीता हूं। वे बोले- नहीं, ऐसे नहीं, यह भभूत लो। इसे दूध में मिला कर पीया करो। उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया। महीने भर में उसके चेहरे पर लाली आ गई। उसके शरीर पर मांस आ गया और वह खेल कूद प्रतियोगिता में अव्वल आया। तैलंग स्वामी की कृपा के प्रति उसने आभार जताया तो वे बोले- मेरी नहीं, सब ईश्वर की कृपा है। वही स्वस्थ रखता है, और हम अपनी करतूतों के कारण बीमार होते हैं। बीमारी हम लाते हैं। ईश्वर तो हमें स्वस्थ रखता है।

Friday, December 12, 2008

क्या है ऊं तत् सत्

विनय बिहारी सिंह

ऋषियों और संतों ने कहा है कि ऊं शब्द ब्रह्म है। और वही सत्य है। बाकी सब असत है। ऋषि पातंजलि ने कहा है कि जिसने ऊं से संपर्क कर लिया उसने ईश्वर से संपर्क कर लिया। ईश्वर ही सत्य है। ऊं अनादि, अनंत और नित्य है। हम सो जाते हैं लेकिन ऊं सर्वत्र, हर समय, हर वस्तु में व्याप्त और स्पंदित होता रहता है। तब हम इस स्पंदन को महसूस क्यों नहीं कर पाते? इसलिए कि यह ध्वनि अत्यंत सूक्ष्म है। लेकिन अगर आप शांत, स्थिर मन और ठीक से धारणा करें तो साफ- साफ सुनाई पड़ सकती है। निरंतर। जैसे कभी न रुकने वाली तेल की धार हो। इसकी नकल नहीं की जा सकती। मुंह से निकाला गया ऊं असली ऊं की नकल नहीं है। यह एक आभास मात्र है।
यही ऊं ईश्वर की क्रियाशील शक्ति है। ईश्वर सक्रिय है। इसलिए वह शक्ति है। कुछ संतों का कहना है कि ईश्वर जब निष्क्रिय होते हैं तो वे शिव हैं, लेकिन जब सक्रिय होते हैं तो वे शक्ति हैं- दुर्गा हैं, काली हैं या माता पार्वती हैं। उनसे कैसे संपर्क किया जा सकता है? शांत और ध्यानस्थ हो कर। निरंतर प्रार्थना करते हुए। प्रार्थना में काफी शक्ति है। सच्चे दिल से गहरे और निरंतर प्रार्थना ऊं तत सत तक पहुंचा देती है। हरि ऊं तत् सत्।

Wednesday, December 10, 2008

भगवान निराकार हैं या साकार?

विनय बिहारी सिंह

कई बार लोग तर्क करते हैं कि भगवान निराकार हैं या साकार? ऐसे विवाद का कोई अर्थ नहीं है। गीता में स्वयं भगवान कृष्ण कहते हैं- मैं साकार और निराकार दोनो हूं। चूंकि निराकार भगवान पर ध्यान केंद्रित करना साकार मनुष्य के लिए मुश्किल है, इसलिए साकार भगवान को ही इष्ट मानना उचित है। श्रीमद् भागवत में लिखा है कि भगवान के किस रूप पर ध्यान केंद्रित किया जाए। कहा है- भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भुज रूप का ध्यान करना चाहिए। भगवान के बाईं ओर वाले दोनों हाथों में से एक में शंख और एक में पद्म (कमल) है। दोनों दाईं ओर वाले हाथों में से एक में चक्र और गदा है। गले में वनमाला और कौस्तुभ मणि है। चेहरा अत्यंत मृदु और आंखें ध्यान करने वाले पर कृपा बरसा रही हैं। भगवान ध्यान करने वाले की तरफ देख कर कृपा से मुस्करा रहे हैं और भक्त की तरफ शांति और आनंद की तरंगें प्रेषित कर रहे हैं। उनकी कृपा भक्त के चारो तरफ बरस रही है। यह ध्यान करते करते कल्पना कीजिए कि आप भगवान में ही घुल रहे हैं। आप और भगवान एक ही हैं।
इसका अर्थ हुआ कि पहले भगवान को साकार रूप में ग्रहण कीजिए। धीरे धीरे आप स्वयं निराकार में पहुंच जाएंगे। क्योंकि साकार रूप सीमा के अंदर है। लेकिन निराकार रूप असीम है। अनंत है। इसीलिए भगवान साकार और निराकार दोनों हैं।

Tuesday, December 9, 2008

तैलंग स्वामी

विनय बिहारी सिंह

तैलंग स्वामी ने कितने वर्ष इस पृथ्वी पर बिताने के बाद अपना शरीर छोड़ा, यह रहस्य ही है। कुछ विशेषग्यों का कहना है कि वाराणसी में जब उन्होंने शरीर छोडा़ तो उस समय उनकी आयु करीब ३०० वर्ष थी। लेकिन कुछ उनकी आयु ५०० वर्ष भी बताते हैं। बहरहाल, तैलंग स्वामी की आयु जानना हमारा लक्ष्य नहीं है। तैलंग स्वामी ने इस दुनिया को जो अद्भुत शिक्षा दी, वह है- अनावश्यक चीजों की तरफ ध्यान न देकर, लगातार ईश्वर में ही मन लगाना। वे प्रवचन या भाषण नहीं देते थे। वे जीवन के ज्यादातर वर्षों में चुप ही रहे। बोले भी तो बहुत कम। लेकिन अपनी दिनचर्या, आचार, व्यवहार या साइलेंट वाइब्रेशन (मौन) से ईश्वरीय तरंगें सारी दुनिया में फैलाते रहते थे। ़
वे नंगा रहा करते थे। शरीर पर कोई वस्त्र नहीं। एक बार वाराणसी में एक अंग्रेज पुलिस वाले ने उन्हें नंगा देख कर उन्हें जेल भिजवा दिया। शाम को देखा गया कि तैलंग स्वामी के कमरे का ताला तो बंद है लेकिन वे जेल की छत पर आराम से टहल रहे हैं। बार- बार उन्हें जेल में बंद किया गया लेकिन हर बार वे अपनी दिव्य शक्ति से जेल से बाहर निकल आते। हार कर प्रशासन ने उन्हें मुक्त कर दिया।
तैलंग स्वामी कभी कुछ खाते नहीं थे। लेकिन अगर कोई भक्त प्रेम से उन्हें कुछ देता था तो वे खाते जरूर थे। कभी कभी वे कई किलो मिठाई खा जाते थे। उनके भक्त कहते थे- मिठाई वे नहीं खाते हैं, कोई और खाता है। एक दुष्ट व्यक्ति ने तैलंग स्वामी की परीक्षा लेने के लिए ताजे चूने के घोल को दही बता कर तैलंग स्वामी से खाने का अनुरोध किया। यह चूने का घोल भी बड़े से ड्रम में था। तैलंग स्वामी मुस्कराते हुए सारा घोल खा गए। सामान्य व्यक्ति अगर इतना घोल खाता तो उसकी मृत्यु निश्चित थी, लेकिन तैलंग स्वामी डकार लेते हुए मुस्करा रहे थे। थोड़ी ही देर में जिस व्यक्ति ने उन्हें चूने का घोल दिया था, उसके पेट में भयानक दर्द हुआ। वह दर्द के मारे चीखने, चिल्लाने और जमीन पर लोटने लगा। वह तैलंग स्वामी से अपने जीवन की भीख मांगने लगा। तब जाकर तैलंग स्वामी ने उस पर कृपा की। वह स्वस्थ हो गया। लेकिन फिर कभी किसी साधु पुरुष के साथ उसने कोई घातक मजाक नहीं किया।
तैलंग स्वामी बाबा विश्वनाथ या शंकर भगवान के मनुष्य अवतार कहे जाते थे। वे अत्यंत कृपालु थे। कोई सच्चा भक्त अगर उनसे पवित्र हृदय से कुछ मांगता था तो उसे वे दे भी देते थे। लेकिन उनका आशीर्वाद मूक होता था। उनका शरीर अत्यंत विशाल था। पेट लगभग पीपे की तरह लंबा चौड़ा था। लेकिन भोजन उनके लिए आवश्यक नहीं था।
जगत का कल्याण हो, लोग सात्विक जीवन जीएं, ईश्वर की भक्ति करें, यही तो कोई भी संत चाहता है।

Monday, December 8, 2008

ईश्वर अर्थात शांति और प्रेम

विनय बिहारी सिंह

परमहंस योगानंद ने कहा है कि ध्यान करते समय ईश्वर को शांति, प्रेम या आनंद में से किसी रूप में अनुभव कीजिए। लेकिन इसमें से किसी एक विचार पर ही केंद्रित रहिए। धीरे- धीरे आप उसी रूप में घुल मिल जाएंगे। उन्होंने कहा है- सात्विक मनुष्य ईश्वर का ही प्रतिरूप है। अगर आप भीतर से निर्मल हैं तो सब कुछ निर्मल ही दिखेगा। यह निर्मलता आए कैसे? ईश्वर के प्रति समर्पण से। ईश्वर के प्रति समर्पण कैसे हो? ईश्वर भक्ति से। भक्ति कैसे आएगी? ईश्वर से प्रेम करने पर। लेकिन आप पूछ सकते हैं- यह प्रेम कैसे पैदा हो? इसका उत्तर यह है कि यह पैदा करना पड़ेगा। कबीर दास ने कहा है- प्रेम न खेतो नीपजे, प्रेम न हाट बिकाय। प्रेम न खेत में पैदा किया जा सकता है और न इसे बाजार में खरीदा जा सकता है। इसे तो खुद के भीतर पैदा करना होगा।
रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि अपनी पत्नी, बच्चे या मां- बाप के लिए संसार के लोग कितना रोते हैं। लेकिन ईश्वर के लिए कोई नहीं रोता। जबकि हमारी सांस तक ईश्वर की ही कृपा से चलती है। ईश्वर से डर कर नहीं, अपना प्रियतम जान कर प्रेम करना होगा। भगवान हमारे हैं। वे हमारे मां, पिता, मित्र और भाई सबकुछ हैं। वे हमारे रक्षक हैं, करुणासागर हैं, कृपासिंधु हैं, सर्वग्याता हैं और सर्वशक्तिमान हैं।

Friday, December 5, 2008

ईश्वर से मिला देते हैं हनुमान जी



विनय बिहारी सिंह
महाकवि तुलसी दास ने भक्ति के अद्वितीय देवता हनुमान जी के बारे में हनुमान चालीसा में लिखा है- राम दुआरे, तुम रखवारे होत न आग्या, बिनु पैसारे।। बिना हनुमान जी के आदेश के भगवान से भेंट नहीं होती। इसका अर्थ है- बिना चरम भक्ति के ईश्वर नहीं मिलते। चरम भक्ति कैसी हो? हनुमान जी जैसी। कथा है कि एक बार माता सीता यानी जानकी जी मांग में सिंदूर लगा रही थीं। हनुमान जी ने पूछा- मां, यह सिंदूर किसलिए? माता ने जवाब दिया- अपने पति की रक्षा के लिए। हनुमान जी ने तब पूरे शरीर में ही सिंदूर पोत लिया और कहा- यह भी भगवान राम के लिए है। किसी भी मंदिर मे जाएं हनुमान जी का रंग सिंदूरी ही होता है। एक और चित्र है- हनुमान जी अपना सीना चीर कर खड़े हैं- सीने के भीतर- राम, लक्ष्मण और माता जानकी हैं। यानी हनुमान जी के रोम रोम में, मन, बुद्धि और आत्मा में भगवान राम समाए हुए हैं। राम के बिना हनुमान जी हो ही नहीं सकते, रह ही नहीं सकते। भगवान तो कहते भी हैं- हम भक्तन के भक्त हमारे। हनुमान जी के बारे में तो भगवान राम ने कहा भी है- हनुमान, मुझमें और तुममें कोई अंतर नहीं है। रामकृष्ण परमहंस ने कहा है- एक बार हनुमान जी ने भगवान से कहा- जब मैं सामान्य अवस्था में होता हूं तो अपने आपको आपके चरणों में पाता हूं। जब भावावस्था में होता हूं तो लगता है आप और मैं एक ही हैं। कई बार तो हनुमान जी भक्ति में इतने डूबे होते थे कि वे पेड़ पर बैठे होते थे और भगवान नीचे। हनुमान जी को कोई होश नहीं है कि वे अपने अराध्य के ऊपर बैठे हैं। वे तो राम से ओत- प्रोत हैं। उन्हें होश कहां है। उन्हें तो चारो तरफ राम ही राम दिखाई दे रहा है। कहां सेवक और कहां सेव्य। इसीलिए अगर हम भक्ति की बात करते हैं तो हनुमान जी की बात करनी ही पड़ेगी। हनुमान जी इसीलिए भगवान माने जाते हैं। वे भगवान हैं ही। क्योंकि वे भगवान राम उनमें हैं और वे भगवान राम में हैं। माता जानकी ने उन्हें - आठों सिद्धियां और नौ निधियां दी हैं। लेकिन हनुमान जी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सिद्धियां और निधियां उनकी दासी हैं। वे उधर ध्यान ही नहीं देते। और जो हनुमान जी की भक्ति करता है? वह तो परम सौभाग्यशाली है ही।

Thursday, December 4, 2008

दुर्गतिनाशिनी हैं मां दुर्गा


विनय बिहारी सिंह
मां दुर्गा के हाथों में जो विभिन्न शस्त्र हैं, वे उनके भक्तों को भी मिल जाते हैं। बशर्ते कि उनमें अटूट भक्ति हो। मां दुर्गा शेर पर सवार हैं। यह कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। कुंडलिनी शक्ति को अगर साधना के जरिए जगाया जाए तो वह नियंत्रित हो कर आग्या चक्र तक जाती है और फिर मनुष्य की चेतना सहस्रार का दर्शन पाती है और उसी में लीन होती है। यह कितने आनंद का विषय है, साधक ही इसकी व्याख्या कर सकता है। यह शक्ति ही मां दुर्गा की सवारी के रूप में देखी जा सकती है। कुछ दूसरे संत इसकी एक और तरह से व्याख्या करते हैं। उनका कहना है कि शेर सर्वाधिक शक्तिशाली जानवर है। मनुष्य के भीतर भी एक शक्तिशाली पशु है। अगर उसे पोषित किया गया तो मनु्ष्य के भीतर पशु वृत्तियों का प्राधान्य होगा। अगर पशु वृत्तियों पर नियंत्रण कर लें तो वे आपकी गुलाम हो जाएंगी। इंद्रिय, मन और बुद्धि अगर आपके नियंत्रण में हैं तो आप ईश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं। मां दुर्गा तो स्वयं ईश्वर की अवतार हैं। इसलिए अपने भक्तों को पशु वृत्तियों पर लगाम कसने के लिए प्रेरित करने मकसद से वे शेर पर सवार हैं। वे तो सर्वशक्तिमान हैं, सर्व व्यापी हैं और सर्व ग्याता हैं। उनकी निरंतर स्तुति करने से हमारे कठिन से कठिन दुख दूर हो जाते हैं।

Wednesday, December 3, 2008

कृष्ण और काली कैसे एक हैं?








विनय बिहारी सिंह
अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि कृष्ण और काली कैसे एक हैं? इसका प्रमाण क्या है? प्रमाण तो वे संत और सन्यासी हैं जो कृष्ण और काली के दर्शन कर चुके हैं। इनमें रामकृष्ण परमहंस और परमहंस योगानंद जैसे दिव्य संतों का नाम लिया जा सकता है। रामकृष्ण परमहंस तो गोपाल (कृष्ण) के साथ स्नान करते थे, उनके साथ खाते थे और बाल कृष्ण शरारत करते थे तो उन्हें मारते भी थे। बालकृष्ण मार खा कर रोते थे। फिर वे रामकृष्ण परमहंस से रूठ जाते थे। रामकृष्ण परमहंस तब रो कर उन्हें मनाते थे। गोपाल एक संत का सरल हृदय औऱ भक्ति देख कर पिघल जाते थे और फिर उनके साथ खेलने लगते थे। मां काली ने उन्हें कैसे दर्शन दिया, यह इन पंक्तियों के लेखक ने पहले ही एक लेख में विस्तार से बताया है। इसी तरह परमहंस योगानंद ने कृष्ण और जगन्माता के कैसे दर्शन किए यह उनकी पुस्तक योगी कथामृत (आटोबायोग्राफी आफ अ योगी) में है। भगवान कृष्ण के दो बाएं हाथों में शंख और पद्म (कमल का फूल) है तो मां काली के दाहिनी ओर के दोनों हाथ भक्तों को अभय दान और वरदान दे रहे हैं। भगवान कृष्ण के दोनों दाएं हाथों में चक्र और गदा है तो मां काली के दोनों बाएं हाथों में नरमुंड और खड्ग है। यानी दो हाथों में दुष्ट शक्तियों के संहार के साधन और दो हाथों में भक्तों की रक्षा और वरदान- यह मां काली और भगवान कृष्ण दोनों ही के चित्र संकेत करते हैं। मां काली का तीसरा नेत्र भी है। दोनों भौंहों के बीच में।यह दिव्य नेत्र है। भक्तों को भी यह दिव्य नेत्र उपलब्ध हो सकता है। अगर वे अपना हृदय और दिमाग मां काली को अर्पित कर दें। भगवान कृष्ण को तो योगेश्वर या महायोगी कहा ही गया है। जब वे अर्जुन को अपना दिव्य रूप दिखाते हैं तो उनकी असंख्य आंखें, असंख्य मुंह, असंख्य हाथ पैर और सारे अंग हैं। यानी वे अनंत हैं। मां काली भी अनंत हैं। दोनों ही एक हैं। एक प्रकृति हैं तो दूसरे पुरुष। और अगर गहरे जाएं तो प्रकृति और पुरुष भगवान ही हैं। वे ही प्रकृति हैं और वे ही पुरुष। तमाम संतों ने कहा है कि जो कृष्ण हैं, वही काली हैं।

Tuesday, December 2, 2008

क्या है जगन्माता का स्वरूप



विनय बिहारी सिंह
जगन्माता या काली माता या दुर्गा माता का स्वरूप क्या है? यह हमेशा से उत्सुकता का विषय रहा है। क्या उनका सिर्फ वही रूप है जिसे हम चित्रों में या मूर्तियों में देखते हैं? या कि इससे इतर भी कोई रूप है। जो रूप हम देखते हैं आखिर वह किसने बनवाया। काली के अनन्य भक्त रामप्रसाद या रामकृष्ण परमहंस को जगन्माता के दर्शन हुए थे। वे अपनी साधना के प्रारंभिक दिनों में मां, मां, मां कह कर लोटते रहते थे। एक दिन वे दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में जगन्माता की मूर्ति के सामने रो कर दर्शन देने की प्रार्थना कर रहे थे। अचानक उन्होंने कहा- अगर दर्शन नहीं दोगी तो मैं तुम्हारे खड्ग से अपनी गरदन काट लूंगा। वे रोते हुए आगे बढ़े तभी उन्हें मां का दिव्य रूप दिखाई पड़ा। वह रूप कैसा था। दिव्य प्रकाश जिसके आलोक में रामकृष्ण परमहंस गहरी समाधि में चले गए। मां काली का रूप कैसा है? रामकृष्ण परमहंस कहते थे- मां काली, काले रंग की थोड़ी ही हैं। वे काल की अधिकारिणी हैं, इसीलिए उनका नाम काली है। परमहंस योगानंद ने भी लिखा है-कौन कहता तू है कालीमेरी मां जगदंबेलाखों रवि, चंद्र तेरी काया से हैं चमकते।। मां काली के अनन्य भक्तों ने उनकी व्याख्या कैसी की है? मां के बाईं ओर वाले एक हाथ में खड्ग है जो बुरी प्रवृत्तियों के नाश के लिए है। दुष्टों के नाश के लिए है। बाईं ओर वाले ही दूसरे हाथ में कटा हुआ मुंड है। साधक कहते हैं कि यह मानव मस्तिष्क का प्रतीक है। जब तक अहंकार का नाश नहीं होगा, जगन्माता दर्शन नहीं देंगी। मां के दाहिनी ओर वाला ऊपरी हाथ अभय मुद्रा में है। यानी वे कहती हैं- मेरे भक्तों, तुम्हें किसी बात का डर नहीं है। निर्भय रहो। दाहिनी ओर का निचला हाथ आशीर्वाद दे रहा है। फलो- फूलो। लेकिन क्या मां सहज ही दर्शन दे देती हैं? नहीं। हम लोग अपनी पत्नी, बच्चों या करीबी लोगों के हित के लिए व्याकुल होते हैं, इसके कई गुना अगर मां के दर्शन की व्याकुलता हो तो वे तुरंत दर्शन देंगी। पहले जब बच्चा रोता है तो मां उसे खिलौने देकर बहला देती है और अपना काम करने लगती है। लेकिन जब बच्चा खिलौना नहीं, सिर्फ मां को चाहता है तो वह समझ जाती है कि बच्चे को अब फुसलाना मुश्किल है। तब वह दौड़े- दौड़े आती है। यानी उनके दर्शन के लिए चरम भक्ति, चरम व्याकुलता होनी चाहिए। यह नहीं कि मां की पूजा भी हो रही है और संसार का प्रपंच भी चल रहा है। तब तो वे मान लेंगी कि बच्चे को सिर्फ खिलौना ही चाहिए। खिलौने तो उनके पास अनंत हैं। लेकिन एक बार उन्हें प्रेम से पुकारने पर वे दौड़ कर आती हैं। लेकिन इसके लिए मां का सच्चा भक्त होना पड़ेगा। संपूर्ण समर्पण करना पड़ेगा। मेरी सब कुछ मां ही हैं, और कोई नहीं। यह धारणा जब आपके दिलो- दिमाग पर जड़ जमा लेगी और आप जब दिन रात व्याकुलता से मां- मां पुकारने लगेंगे तो वे आपको अपने गोद में बैठा लेंगी। कई साधक भगवान कृष्ण और काली को एक ही मानते हैं। कई लोगों के तो नाम भी कालीकृष्ण रखा जाता है। रामकृष्ण परमहंस कहते थे- काली और कृष्ण एक ही हैं। आइए गीता का एक उद्धरण लें। अर्जुन जब भगवान श्रीकृष्ण से अपने दिव्य रूप दिखाने को कहते हैं तो भगवान उन्हें वह रूप दिखाते हैं। गीता के ११ वें अध्याय के ८ वें श्लोक में भगवान कहते हैं- न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमेश्वरम्।।( परंतु मुझको तू इन प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निसंदेह समर्थ नहीं है, इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूं, उसी से तू मेरी ईश्वरी. योगशक्ति को देख।) यह वे उस अर्जुन को कहते हैं जिसे वे अपना ही रूप मानते हैं (देखें गीता का अध्याय १० का ३७ वां श्लोक जिसमें वे कहते हैं कि मैं पांडवों में धनंजय अर्थात तू हूं)। यानी अपनी जैसी विभूति को भी असली रूप दिखाने के लिए भगवान दिव्य आंख देते हैं। तो सामान्य आदमी कैसे असली रूप देख सकता है? लेकिन साधकों का कहना है कि चरम भक्ति ही वह दिव्य आंख है जिससे भक्त भगवान को देख सकता है। चूंकि अर्जुन उस समय शोक और दुविधाग्रस्त था, इसलिए उसे दिव्य की जरूरत पड़ी। वरना यह दिव्य आंख भगवान सहज ही अपने भक्त को दे देते हैं। मनुष्य के शरीर को क्षेत्र कहते हैं। एसा गीता के १३वें अध्याय में है। क्षेत्र के तहत पंच महाभूत- आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का सूक्ष्म भाग, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति के अलावा दस इंद्रियां- कान, त्वचा, आंख, जीभ और नाक, वाक, हाथ, पैर, लिंग और गुदा। एक मन, पांच इंद्रियों के विषय- शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गंध तथा- इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, स्थूल देह, चेतना, धृति (यानी आपके मन ने क्या पकड़ रखा है) - इसी का नाम मनुष्य का शरीर है, जिसे क्षेत्र कहा जाता है। यह क्षेत्र जितना निर्मल होगा, भक्ति उतनी ही दृढ़ होगी। अटल श्रद्धा, भक्ति और विश्वास से ही मां या जगन्माता के दर्शन होते हैं, ऐसा साधकों ने बताया है। दुर्गा माता का रूप भी विभिन्न दिव्य अस्त्र- शस्त्रों से लैस और शेर पर सवार दिखाया जाता है। ये शस्त्र सभी देवताओं ने असुर से लड़ने के लिए दिए थे। लेकिन साधकों का कहना है कि जगन्माता को कोई उधार दे ही क्या सकता है। वे तो स्वयं ब्रह्मांड की स्वामिनी हैं। उनके पास क्या नहीं है। जो अनंत ब्रह्मांडों को एक इशारे पर नचाती हैं, उन्हें किसी से कुछ भी उधार लेने की क्या जरूरत है। इसीलिए तो भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं- सर्व धर्म परित्यज्ये, मा मेकम शरणम ब्रज। अहम त्वा सर्व पापेभ्यो, मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।(हे अर्जुन, तुम सारे धर्मों को त्याग कर, सिर्फ मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सारे पापों यानी बंधनों से मुक्त कर दूंगा, चिंता मत करो।)
मां काली भगवान शंकर की छाती पर पैर रख कर अपनी जीभ बाहर किए हुए हैं। यह क्या है? साधक कहते हैं- भगवान शंकर दिव्य पुरुष के प्रतीक हैं और मां काली दिव्य शक्ति की प्रतीक। दिव्य पुरुष बिना दिव्य प्रकृति के उत्पत्ति, पोषण और विनाश का काम नहीं कर सकता। अन्य साधक कहते हैं- मां की जीभ मनुष्य के भीतर के षड्चक्रों को जगाने के लिए निकली है। षड्चक्र यानी- मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आग्या चक्र और सहस्रार चक्र। मां अपनी जीभ से इन चक्रों को खोलती हैं।

Monday, December 1, 2008

स्वामी विवेकानंद


विनय बिहारी सिंह
स्वामी विवेकानंद ने सहज ही ईश्वर पर विश्वास नहीं कर लिया। उन्होंने इसके लिए अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से बहुत से सवाल किए। सबसे महत्वपूर्ण सवाल था- क्या आपने ईश्वर को देखा है? रामकृष्ण परमहंस का जवाब था- हां, मैंने ईश्वर को देखा है। ठीक उसी तरह, जैसे तुमको इतने नजदीक से देख रहा हूं। स्वामी विवेकानंद को उस दिन भरोसा हो गया। लेकिन जब वे ध्यान करते थे तो कुछ भी दिखाई नहीं देता था। कुछ भी ईश्वरीय तत्व समझ में नहीं आता था। यह बात स्वामी विवेकानंद (जिनका उस समय नाम था- नरेंद्र) ने अपने गुरु से कही। तब उनके गुरु ने कहा- जानते हो ध्यान कैसा होना चाहिए? जैसे- तेल की धार। लगातार। ध्यान क्या है? ध्यान है लगातार ईश्वर पर मन को केंद्रित करना। और कुछ भी न सोचना। अगर बीच बीच में मन इधर- उधर भटकता है तो उसे खींच कर वापस ईश्वर पर केंद्रित करना। फिर विवेकानंद ने वैसा ही करना शुरू किया। गुरु ने प्रसन्न होकर उन पर दिव्य शक्तिपात किया। स्वामी विवेकानंद को मां काली के दर्शन हुए। वे जो चाहते थे, मिल गया। क्योंकि उन्हें सच्चे गुरु मिल गए थे।

Saturday, November 29, 2008

परमहंस योगानंद


विनय बिहारी सिंह
योगी कथामृत (आटोबायोग्राफी आफ अ योगी) के विख्यात लेखक और महात्मा गांधी को क्रिया योग की दीक्छा देने वाले परमहंस योगानंद एक महान संत थे। योगी कथामृत दुनिया की सारी भाषाओं में अनूदित है। उर्दू में भी। परमहंस योगानंद ने सन १९२० में यूरोप और सारी दुनिया में क्रिया योग की जानकारी दी। उन्होंने अपना मुख्य केंद्र अमेरिका को बनाया। भारत में उन्होंने योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया के नाम से और अमेरिका में सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप के नाम से उनके द्वारा स्थापित संस्थाएं आज सारी दुनिया में आध्यात्म का प्रकाश फैला रही हैं। योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया (वाईएसएस) में क्रिया योग बताया जाता है जिसे महान संत श्यामा चरण लाहिड़ी ने सबसे पहले सिखाना शुरू किया। लाहिड़ी महाशय को उनके गुरु महावतार बाबा जी ने क्रिया योग की दीक्छा दी थी। लाहिड़ी महाशय ने क्रिया योग की दीक्छा स्वामी श्री युक्तेश्वर जी को दी। स्वामी श्री युक्तेश्वर ने इसे अपने दिव्य शिष्य परमहंस योगानंद को सिखाया और उनसे कहा कि पश्चिमी देशों के लोगों को इससे लाभान्वित करो। शुरू में परमहंस योगानंद जी कोई भी संगठन बनाने के पक्छ में नहीं थे। उनका कहना था कि संगठन बनाने से आरोप ही ज्यादा मिलते हैं। तब स्वामी श्री युक्तेश्वर जी ने कहा कि क्या आध्यात्मिक मलाई तुम अकेले ही खा लेना चाहते हो? परमहंस योगानंद जी ने गुरु की बात मानी और वाईएसएस और सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप की स्थापना की। आज ये संगठन नहीं होते तो लाखों लोगों को क्रिया योग की दुर्लभ दीक्छा कैसे मिलती? स्वामी श्री युक्तेश्वर जी ने कहा- पश्चिम में समृद्धि तो है लेकिन आध्यात्म शिक्छा की कमी है। स्वामी श्री युक्तेश्वर जी ने बाइबिल और गीता में अनेक समानताओं के बारे में एक पुस्तक लिखी है- कैवल्य दर्शनम। यह पुस्तक वाईएसएस के केंद्रों में हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला और अन्य भाषाओं में उपलब्ध है। सन १९५२ में जब उन्होंने अमेरिका में अपना शरीर छोड़ा तो उनका शरीर शव गृह में एक महीने तक रखा रहा। लेकिन उसमें कोई विकृति नहीं आई । अमेरिका के शव गृह के इंचार्ज ने तब लिख कर दिया था जो आज भी वहां रखा हुआ है। शव गृह के इंचार्ज ने लिखा है कि यह अद्भुत उदाहरण है। एक महीने बाद भी शव का तरोताजा रहना, आश्चर्यजनक है। लेकिन यह सत्य है। मरने के बाद भी महान संत परमहंस योगानंद ने अपने शव के जरिए आध्यात्म का संदेश दिया। उन्होंने कहा- सिर्फ शुद्ध और सच्चा प्रेम ही मेरी जगह ले सकता है। परमहंस योगानंद ने अनेक पुस्तकें लिखी हैं। क्रिया योग में दीक्छा लेने के इच्छुक लोगों को वहां अपना नाम दर्ज कराना पड़ता है। तब उन्हें हर महीने ध्यान करने संबंधी एक लेसन या अध्याय डाक से भेजा जाता है। साल- डेढ़ साल के बाद अगर व्यक्ति ने लेसन में पूछे गए सवालों का ठीक ठीक जवाब दे दिया तो उसे क्रिया योग की दीक्छा के लिए अधिकृत कर दिया जाता है।

Friday, November 28, 2008

सहज भाषा में ईश्वर की बात कहते थे रामकृष्ण परमहंस


विनय बिहारी सिंह
रामकृष्ण परमहंस कहते थे- जैसे पांकाल मछली कीचड़ में ही रहती है फिर भी कीचड़ उसके शरीर से दूर रहता है वैसे ही मनुष्य को संसार में रह कर भी सांसारिक तनावों, झमेलों या वासनाओं का गुलाम नहीं बनना चाहिए। वे एक कहानी सुनाते थे। एक आदमी अपनी स्त्री को बहुत प्यार करता था। उसके बिना वह जी नहीं सकता था। एक दिन उसके गुरु ने एक दवा दी। कहा कि इसके खाते ही तुम्हारा शरीर कुछ देर के लिए मृत जैसा हो जाएगा। लेकिन तुम मरोगे नहीं। तुम्हें होश रहेगा। तुम सबकी बातें सुन सकोगे। फिर उन्होंने वैद्य को सिखाया कि तुम जाकर झूठमूठ यह कह दो कि इसे जिंदा करने के लिए किसी को अपनी जान देनी पड़ेगी। फिर देखो तुम्हारी पत्नी तुम्हें कितना प्यार करती है। तुम तो उसके बिना जी नहीं सकते। वही हुआ। दवा खा कर वह मृत जैसा हो गया। घर में रोना- पीटना मच गया। तब वैद्य आया और बोला कि यह तो जिंदा हो जाएगा लेकिन इसके बदले किसी को जान देनी पड़ेगी। उसकी पत्नी से पूछा गया कि क्या वह अपनी जान देने को तैयार है? पत्नी ने साफ इंकार कर दिया और कहा कि यह तो मर ही गए। मैं मर जाऊंगी तो इन छोटे- छोटे बच्चों को कौन देखेगा? वे कहते थे कि संसार में सब काम करो लेकिन यह जान लो कि असली घर ईश्वर के पास है। वह सब देख रहा है। मनुष्य को उसने इच्छा शक्ति दे कर छोड़ दिया है। ईश्वर देखते रहते हैं कि मनुष्य अपनी इच्छा शक्ति का इस्तेमाल कैसे करता है। रामकृष्ण परमहंस की बातें इतनी सरल होती थीं कि अनपढ़ व्यक्ति के दिल में भी वे उतर जाती थीं। वे कहते थे कि सब रुपए पैसे, परिजन और सांसारिक सुख के लिए रोते हैं। ईश्वर के लिए कौन रोता है। ईश्वर के लिए रोइए तब तो वह मिलेगा। रामकृष्ण परमहंस कहते थे- मनुष्य का जन्म सिर्फ ईश्वर को प्राप्त करने के लिए हुआ है। लगातार प्रार्थना करिए-- हे भगवान, हे भगवान क्या आप दर्शन नहीं देंगे? मैं आपके लिए व्याकुल हूं। लगातार प्रार्थना से उनका दिल पिघल जाता है।

Thursday, November 27, 2008

भगवान शिव हैं कृपा निधान



विनय बिहारी सिंह
भगवान शिव या शंकर या महेश्वर या देवाधिदेव आशुतोष कृपा निधान हैं। समुद्र मंथन के समय जब हलाहल विष निकला तो उसका ताप इतना तीव्र था कि कोई वहां खड़ा नहीं हो सकता था। मानो पूरे ब्रह्मांड में आग लग गई हो। देवता भागे भागे भगवान शंकर के पास पहुंचे और कहा- भगवन, किसी तरह हमारी रक्छा कीजिए वरना पूरी सृष्टि जल कर राख हो जाएगी। समुद्र मंथन में जो विष निकला है, उसे आप ही धारण कर सकते हैं। कृपा सिंधु शंकर भगवान ने उस भयंकर विष को पी लिया और अपने गले में ही रख लिया। इसी के कारण उनका काम नीलकंठ पड़ गया। उन्होंने विष को गले से नीचे नहीं उतारा। ऐसा कौन कर सकता है? जो ब्रह्मांड का नियंत्रक हो। वेदों ने ब्रम्ह कहा है, पुराण ने जिन्हें विष्णु कहा है उसे ही शैव लोगों ने शिव कहा है। दूसरा उदाहरण- जब भगीरथ गंगा को धरती पर ले आए तो गंगा का वेग इतना प्रबल था कि समूची पृथ्वी तहस नहस हो जाती। तब भगीरथ ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि प्रभु गंगा का वेग आप ही कम कर सकते हैं। तब भगवान शिव ने अपनी जटा में गंगा को रोक लिया। इसीलिए गंगा को पवित्र नदी का दर्जा दिया जाता है। भगवान शंकर साधु चरित्र वाले मनुष्यों की रक्छा करते हुए, हमेशा ध्यान मग्न और प्रसन्नचित्त रहते हैं। बस उनका ध्यान करना चाहिए।

हाथ में माला मन में खोट

विनय बिहारी सिंह
ऐसे लोग आपको अक्सर दिख जाएंगे जो हाथ में माला फेर रहे हैं और बात भी कर रहे हैं या किसी महिला की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं या बेटे को कह रहे हैं- जरा अमुख काम कर दो। संत कबीर ने पूजा पाठ के ऐसे ही पाखंडों पर जम कर चोट किया। जैसे-कर का मनका छाड़ि के मन का मनका फेर यानी कर (हाथ) में माला लेकर जाप करने करना छोड़ो। तुम्हारा मन भटक रहा है। मन की माला जपो। तब मन कहीं नहीं भटकेगा। कबीर दास ने एक और प्रवृत्ति पर चोट की। उन्होंने कहा-दाढ़ी बढ़ाय जोगी, होय गैले बकराकाम जराय जोगी होय गैले हिजड़ा।।यानी दाढ़ी बढ़ाने और यौन भाव खत्म करने से कोई सन्यासी नहीं हो जाता। इसके लिए ऋषि पातंजलि का योग सूत्र अपनाना पड़ता है यानी- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। सिर्फ बाहरी रूप सज्जा और काम भाव को जीतने से कुछ नहीं होता। वरना तो हिजड़े भी ऋषि हो जाते। सचमुच हमें कबीर को पढ़ते रहना चाहिए।

Wednesday, November 26, 2008

सूरदास अंधे नहीं थे



विनय बिहारी सिंह


विख्यात कवि सूरदास की रचनाओं को पढ़ कर यह बिल्कुल नहीं लगता कि वे अंधे थे। श्री कृष्ण और श्री राम के सौंदर्य का वर्णन करते हुए उन्होंने जो पद लिखे हैं, उसे पढ़ कर भी यह बात साफ हो जाती है। वे लिखते हैं-(गोपी अपनी सखी से कह रही है-)


सजनी, निरखि हरि कौ रूप।


मनसि बचसि बिचारि देखौ अंग अंग अनूप।।


कुटिल केस सुदेस अलिगन, बदन सरद सरोज।


मकर कुंडल किरन की छबि, दुरत फिरत मनोज।।


अरुन अधर, कपोल, नासा, सुभग ईषद हास।


दसन की दुति तड़ित, नव ससि, भ्रकुटि मदन बिलास।।


अंग अंग अनंग जीते, रुचिर उर बनमाल।सूर सोभा हृदे पूरन देत सुख गोपाल।।


गोपी कह रही है कि हरि का रूप निहार कर मन और वाणी से विचार करके देख िक इनके अंग प्रत्यंग की छटा निराली है। सुंदर घुंघराले केश भौरों के समान हैं। मुख शरद ऋतु के कमल की भांति है और मकराकृत कुंडलों की ज्योति रेखा की शोभा देख कर कामदेव भी लज्जा से छिपता फिरता है। लाल लाल ओठ (होंठ) हैं, कपोल, नासिका और मंद मंद मुसकान बड़ी सुंदर है। दांतों की कांति विद्युत या द्वितीया के चंद्रमा की भांति है और भौंहें तो कामदेव की क्रीड़ा हैं। अंग प्रत्यंग ने कामदेव को जीत लिया है, सुंदर छाती पर वनमाला है। सूरदास कहते हैं कि गोपाल अपनी शोभा से हृदय को पूर्ण आनंद दे रहे हैं। इस वर्णन को पढ़ कर कौन कहेगा कि सूरदास अंधे हैं। एक एक अंग की शोभा का विस्तार से वर्णन क्या कोई जन्मांध व्यक्ति दे सकता है? बिल्कुल नहीं। सूरदास निश्चय ही अंधे नहीं थे। वे खूबसूरत आंखों वाले सुंदर गोरे व्यक्ति थे। हां, वे सांसारिक भोग विलास से विरक्त थे। इसलिए कुछ लोगों ने उन्हें अंधा कह दिया होगा।

Tuesday, November 25, 2008

एक सन्यासी से मुलाकात


विनय बिहारी सिंह

पिछले दिनों कोलकाता में एक सन्यासी से मुलाकात हुई। उन्होंने बातचीत के दौरान बताया कि बातचीत मौन रह कर भी की जा सकती है। यह मेरे लिए एक अद्भुत बात थी। उन्होंने बताया- यह मैं नहीं रमण महर्षि और परमहंस योगानंद ने यह बात कही है। यह वैग्यानिक तथ्य है। मेरी उत्सुकता बढ़ी। उन्होंने कहा कि अगर आपके प्रति कोई दुश्मनी कर बैठा है तो उसके प्रति आप प्यार भेजिए। मन में उसका चेहरा रखते हुए कहते रहिए- मैं आपको प्यार करता हूं। आई लव यू। आपके दिल में उसके प्रति सचमुच प्रेम का भाव होना चाहिए। कुछ दिनों बाद वह आपसे दुश्मनी खत्म कर देगा। हो सकता है वह आपका मित्र बन जाए। मुझे यह विचार अच्छा लगा। सोचा क्यों न इसे सबको बताया जाए। क्या पता इससे समाज में सौहार्द बढ़े।

Monday, November 24, 2008

संत नामदेव के गोविंद



निर्गुण संतों में अग्रिम संत नामदेव वस्तुत:उत्तर-भारत की संत परंपरा के प्रवर्तक माने जाते हैं। मराठी संत-परंपरा में तो वह सर्वाधिक पूज्य संतों में हैं। मराठी अभंगों(विशेष छंद) के जनक होने का श्रेय भी उन्हीं को प्राप्त है। उत्तर-भारत में विशेषकर पंजाब में उनकी ख्याति इतनी अधिक रही कि सिखों के प्रमुख पूज्य ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में उनकी वाणी संकलित हैं, जो प्रतिदिन अब भी बडी श्रद्धा से गाई जाती है। संत नामदेव संत कबीर, रैदास,नानक, दादू मलूककी निर्गुण भक्तिधाराके प्रवर्तक होने के कारण स्वयं भी मूर्ति पूजा,कर्मकांड, जाति-पांति व सांप्रदायिकता के कठोर निंदक रहे हैं। परमात्मा की प्राप्ति के लिए संत-सद्गुरु की कृपा को अनिवार्य मानते हैं:-
संत सूंलेना संत सूंदेना,
संत संगति मिली दुस्तर तिरना
संत की छाया संत की माया,
संत संगति मिलिगोविंद पाया॥
संत नामदेव का जन्म 26अक्तूबर,1270 ई.को महाराष्ट्र में नरसीबामनीनामक गांव में हुआ। इनके पिता का नाम दामाशेटथा और माता का नाम गोणाईथा। कुछ विद्वान इनका जन्म स्थान पण्ढरपुरमानते हैं। दामाशेटबाद में पण्ढरपुरआकर विट्ठल की मूर्ति के उपासक हो गए थे। इनका पैतृक व्यवसाय दर्जी का था। अभी नामदेव पांच वर्ष के थे। तब इनके पिता विट्ठल की मूर्ति को दूध का भोग लगाने का कार्य नामदेव को सौंप कर कहीं बाहर चले गए। बालक नामदेव को पता नहीं था कि विट्ठल की मूर्ति दूध नहीं पीती, उसे तो भावनात्मक भोग लगवाया जाता है। नामदेव ने मूर्ति के आगे पीने को दूध रखा। मूर्ति ने दूध पीया नहीं, तो नामदेव हठ ठानकर बैठ गए कि जब तक विट्ठल दूध नहीं पीएंगे, वह वहां से हटेंगे नहीं। कहते हैं हठ के आगे विवश हो विट्ठल ने दूध पी लिया। बडा होने पर इनका विवाह राजाबाईनाम की कन्या से कर दिया गया। इनके चार पुत्र हुए तथा एक पुत्री। इनकी सेविका जानाबाईने भी श्रेष्ठ अभंगोंकी रचना की। पढंरपुरसे पचास कोस की दूरी पर औढियानागनाथ के शिव मंदिर में रहने वाले विसोबाखेचर को इन्होंने अपना गुरु बनाया। संत ज्ञानदेवऔर मुक्ताबाईके सान्निध्य में नामदेव सगुण भक्ति से निर्गुण भक्ति में प्रवृत्त हुए। अवैदएवं योग मार्ग के पथिक बन गए। ज्ञानदेवसे इनकी संगति इतनी प्रगाढ हुई कि ज्ञानदेवइन्हें लंबी तीर्थयात्रा पर अपने साथ ले गए और काशी,अयोध्या,मारवाड (राजस्थान) तिरूपति,रामेश्वरमआदि के दर्शन-भ्रमण किए। फिर सन् 1296में आलंदीमें ज्ञानदेवने समाधि ले ली और तुरंत बाद ज्ञानदेवके बडे भाई तथा गुरु ने भी योग क्रिया द्वारा समाधि ले ली। इसके एक महीने बाद ज्ञानदेवके दूसरे भाई सोपानदेवऔर पांच महीने पश्चात मुक्तबाईभी समाधिस्थ हो गई। नामदेव अकेले हो गए। उन्होंने शोक और विछोह में समाधि के अभंग लिखे। इस हृदय विदारक अनुभव के बाद नामदेव घूमते हुए पंजाब के भट्टीवालस्थान पर पहुंचे। फिर वहां घुमान(जिला गुरदासपुर) नामक नगर बसाया। तत्पश्चात मंदिर बना कर यहीं तप किया और विष्णुस्वामी,परिसाभागवते,जनाबाई,चोखामेला,त्रिलोचन आदि को नाम-ज्ञान की दीक्षा दी। बाद में अस्सी वर्ष की आयु में पढंरपुरमें विट्ठल के चरणों में आषाढ वदीत्रोदशीसंवत 1407तदानुसार3जुलाई 1350ई. को पण्ढरपुरमें ही समाधि ली। संत नामदेव अपनी उच्चकोटि की आध्यात्मिक उपलब्धियों के लिए ही विख्यात हुए। चमत्कारों के सर्वथा विरुद्ध थे। वह मानते थे कि आत्मा और परमात्मा में कोई अंतर नहीं है। तथा परमात्मा की बनाई हुई इस भू (भूमि तथा संसार) की सेवा करना ही सच्ची पूजा है। इसी से साधक भक्त को दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। सभी जीवों का सृष्टाएवं रक्षक, पालनकत्र्ताबीठलराम ही है, जो इन सब में मूर्त भी है और ब्रह्मांड में व्याप्त अमू‌र्त्त भी है। इसलिए नामदेव कहते हैं:-
जत्रजाऊं तत्र बीठलमेला।
बीठलियौराजा रांमदेवा॥
सृष्टि में व्याप्त इस ब्रह्म-अनुभूति के और इस सृष्टि के रूप आकार वाले जीवों के अतिरिक्त उस बीठलका कोई रूप, रंग, रेखा तथा पहचान नहीं है। वह ऐसा परम तत्व है कि उसे आत्मा की आंखों से ही देखा अनुभव किया जा सकता है। संत नामदेव का वारकरीपंथ आज तक उत्तरोत्तर विकसित हो रहा है।
मंदिर-मस्जिद, जात-पांत आदि के भेदभाव से ऊपर उठकर गोविंद का नाम स्मरण करना ही नामदेव की सबसे बडी सीख है:-
सिमिरसिमिरगोविंद
भजुनामा तरसिभव सिंधु॥
अस्सी वर्ष की आयु तक इस संसार में गोविंद के
नाम का जप करते-कराते सन् 1350ई. में नामा स्वयं भी इस भवसागर से पार चले गए। इस धरती पर जीवों के रूप में विचरने वाले गोविंद की सेवा ही सच्ची परमात्मसेवा है।
डा. बलदेव वंशी

Saturday, November 22, 2008

क्या आप छींक रोक सकते हैं...


ममता गुप्ता और महबूब खान (bbc लन्दन)

छींक कभी-कभी नाक में दम कर देती है
हमें छींक क्यों आती है. छींक आमतौर पर तब आती है जब हमारी नाक के अंदर की झिल्ली, किसी बाहरी पदार्थ के घुस जाने से खुजलाती है. नाक से तुरंत हमारे मस्तिष्क को संदेश पहुंचता है और वह शरीर की मांसपेशियों को आदेश देता है कि इस पदार्थ को बाहर निकालें. जानते हैं छींक जैसी मामूली सी क्रिया में कितनी मांसपेशियां काम करती हैं....पेट, छाती, डायफ़्राम, वाकतंतु, गले के पीछे और यहां तक कि आंखों की भी. ये सब मिलकर काम करती हैं और पदार्थ बाहर निकाल दिया जाता है. कभी-कभी एक छींक से काम नहीं चलता तो कई छींके आती हैं. हां जब हमें ज़ुकाम होता है तब छींकें इसलिए आती हैं क्योंकि ज़ुकाम की वजह से हमारी नाक के भीतर की झिल्ली में सूजन आ जाती है और उससे ख़ुजलाहट होती है.

महाकवि कालिदास का ज्योतिष प्रेम



कवि कुलगुरु कालिदासकी विद्वताऔर बहुमुखी प्रतिभा ने विश्व के समस्त विद्वानों को आकृष्ट किया है। संस्कृत से इतर भाषाओं के विद्वान भी उनकी मुक्तकण्ठ से प्रशंसा करते हैं। उनके ग्रंथों में चारों पुरुषार्थ (धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष),अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, संगीत, दर्शन, इतिहास, भूगोल एवं ज्योतिष के साथ-साथ अन्यान्य विषयों का भी समावेश मिलता है। महाकवि कालिदासने कई महाकाव्यों की रचना की, जिनमें सात प्रसिद्ध हैं-रघुवंशम्, कुमारसंभवम्,मेघदूतम्, ऋतुसंहारम्,अभिज्ञानशाकुंतलम्,विक्रमोर्वशीयम्तथा मालविकाग्निमित्रम्।इन ग्रंथों में यत्र-तत्र ज्योतिषीयप्रयोग महाकवि के ज्योतिष प्रेम को प्रकट करते हैं। महाकवि ने काव्य रचना के साथ जहां आवश्यकता हुई वहां स्पष्ट रूप से ज्योतिष संदर्भो को समायोजित किया। अपने ग्रंथों में महाकवि ने नक्षत्र, तारा, तिथि, मुहूर्त, अयन, ग्रह, दशा, रत्न, ग्रहशांति,शकुन, यात्रा, स्वप्न, राजयोग, ग्रहों की उच्चता,नीचता,वक्रत्व,मार्गत्व,ग्रहण, संक्रांति, ग्रहों का योग, काल विधान, पुनर्जन्म, भवितव्यताआदि का प्रसंगवशवर्णन किया है। अभिज्ञान शाकुन्तलम्के मंगलाचरण में भगवान शंकर की अष्टमूर्तियोंमें सूर्य चंद्रमा रूपी मूर्ति का उल्लेख करते हुए ये द्वेकालंविधत्त:कहकर संपूर्ण काल विधान जो ज्योतिष शास्त्र का मूल उद्देश्य है, को स्पष्ट कर दिया। वस्तुत:तिथि, वार, नक्षत्र योग तथा करण जो पंचाङ्गहैं, सूर्य- चंद्रमा पर ही आधारित हैं। दिवा-रात्रि ही नहीं सृष्टि से लेकर प्रलय पर्यन्त सूर्य चंद्रमा ही काल का विधान कर रहे हैं। ये दोनों ज्योतिषशास्त्र के मेरुदंड हैं। इनमें भी चंद्रमा, सूर्य से ही पोषित हो रहा (प्रकाशित हो रहा है) का स्पष्ट उल्लेख रघुवंशम्के तृतीय सर्ग में है-पुपोषवृद्धिं हरिदश्वदीधितेरनुप्रवेशादिवबालचन्द्रमा:।
किसी भी जातक की कुंडली में यदि पांच ग्रह निर्मल होकर अपने उच्च स्थान में स्थित हों, तो वह जातक निश्चित ही चक्रवर्ती सम्राट होता है,ज्योतिष शास्त्र के इस कथन को महाराजा रघु के जन्मकालकी ग्रह स्थिति (कुंडली) से महाकवि ने प्रमाणित किया है। ग्रहों की प्रतिकूलता में ग्रहशांतिअवश्यमेव लाभदायी होती है, तभी तो महर्षि कण्व शकुन्तला के प्रतिकूल ग्रहशांतिहेतु सोमतीर्थजाते हैं-दैवमस्या: प्रतिकूलंशमयितुंसोमतीर्थगत:। विवाह में शुभ मुहूर्त आवश्यक होता है। हिमालय पुत्री पार्वती से शिव का विवाह निश्चित हो गया तब मांङ्गलिककृत्य जो विवाह से पूर्व होते हैं, को मैना ने मैत्र मुहूर्त तथा उत्तराफाल्गुनीनक्षत्र में कराया। सप्तर्षिगणोंसे विवाह की तिथि पूछकर हिमालय ने स्वाती नक्षत्र में विवाह का दिन निश्चित किया। विवाह का श्रेष्ठ नक्षत्र स्वाती ज्योतिर्विदोंमें मान्य है। इतना ही नहीं वैवाहिक लग्न में सप्तम स्थान सर्वथा शुद्ध होना चाहिए।
विवाह के पश्चात् वधू प्रवेश तथा द्विरागमन में शुक्र सन्मुखप्रतिकूल रहता है। इसका उल्लेख कुमारसम्भवम्के तीसरे सर्ग में किया है। मालविकागिन्मित्रम्में विदूषक राजा से कहता है, चलिए हम लोग निकल चलें कहीं मंगलग्रह के समान वक्री गति से चलता हुआ वह पुन:पिछले राशि पर न आ जाए।
पुन:कहता है कि हे राजन्! ज्योतिषियों ने कहा है कि इस समय आपका नक्षत्र प्रतिकूल चल रहा है। दशाएं अनुकूल एवं प्रतिकूल होती रहती हैं। दोनों में सम रहना चाहिए।
सूर्य की संक्रांति तथा अयन की चर्चा रघुवंशम्के नवम सर्ग में दशरथ के मृगया प्रसंग में द्रष्टव्य है, जहां वर्णन है कि महाराजा दशरथ आखेट करते हुए सुदूर दक्षिण दिशा में चले गए। उस दिन उत्तरायण की स्थिति बन रही थी। सूर्य उत्तर की ओर मुडना चाह रहे थे, उसी समय महाराजा दशरथ ने भी अपना रथ उत्तर की ओर मोड दिया।
नक्षत्रों में अश्रि्वनी, कृत्तिका, पुनर्वसु,पुष्य,उत्तराफाल्गुनी,चित्रा,विशाखाका उल्लेख करते हुए किस नक्षत्र में कितने तारे हैं, का वैज्ञानिक वर्णन किया है। तिथियों में प्रतिपदा,अमावस्या,पूर्णिमा के साथ एकादशी का भी उल्लेख है। मेघदूतम्के उत्तर भाग में प्रबोधनी(देवोत्थान) एकादशी का उल्लेख करते हुए उस दिन यक्ष के शाप निवृत्ति की बात कही है। यही कारण है कि संस्कृत के अनेक विद्वानों ने यही कालिदासकी जन्मतिथि मानी है। मेघों के निर्माण में धुआं, प्रकाश, जल तथा वायु कारण है, का भी उल्लेख उनकी वैज्ञानिक दृष्टि का संकेत करता है। अषाढ माह में वर्षारंभ का उल्लेख मेघदूतम्के दूसरे श्लोक में किया है।
वर्षा के पश्चात अगस्त्य तारा का उदय होता है, का प्रामाणिक ज्योतिषीयवर्णन किया है। कभी वर्षा के समय यदि कू्रर ग्रह वर्षाकारकग्रहों के मध्य आ जाए तो वर्षा नहीं होती, अकाल पड जाता है, इसका उल्लेख रघुवंशम्में है। दो तीन ग्रहों के आपस में युति होने से परिणाम सुखद होता है इसका उल्लेख भी है। अङ्गस्फुरणसे होने वाले परिणामों का यत्र-तत्र वर्णन है। राजा दुष्यंत कण्व के आश्रम में प्रवेश करना चाहते हैं, उसी समय उनकी दाहिनी भुजा फडक उठती है, इसका परिणाम ज्योतिषशास्त्र में पत्नी लाभ कहा गया है। राजा विचार करते हैं कि भला आश्रम में यह कैसे संभव होगा तथापि भवितव्यताकहीं भी होकर रहती है। इस प्रकार वे भवितव्यतामें अपना अटल विश्वास प्रकट करते हैं। रघुवंशम्के चौदहवेंसर्ग में सीता जी का दाहिना नेत्र फडकता है इसे अपशकुन मान वह डर जाती हैं। स्वप्न दर्शन का भी फल होता है, इसका वर्णन रघुवंशम्महाकाव्य में प्राप्त होता है।
अपशकुनों का विस्तृत वर्णन कुमारसम्भवम्महाकाव्य में प्राप्त होता है। जब तारकासुरयुद्ध के लिए प्रस्थान करता है, उस समय गीधोंका झुंड दैत्यसेनाओंके समीप आकर ऊपर मंडराने लगता है, भयंकर आंधी चलने लगती है, आकाश मंडल जलते हुए अंगारों, रुधिरोंऔर हड्डियों के साथ बरसने लगता है तथा दिशाएं जलती हुई प्रतीत होने लगी, ऐसा लगता था जैसे दिशाएं धुंआउगल रही हैं। हाथी लडखडाने लगे, घोडे जमीन से गिरने लगे, सेनाओं में कम्पन होने लगा, कुत्ते इकट्ठे होकर मुख को ऊपर करके सूर्य में दृष्टि लगाकर कान के पर्दे को फाडने वाली भयंकर आवाज में रोने लगे। ऐसे अनेक अपशकुनों को देखकर भी तारकासुरने प्रस्थान किया और उसका परिणाम वह युद्ध में मारा गया। रघुवंशम्में बारहवें सर्ग में जब खर दूषण राम से युद्ध के लिए प्रस्थान करते हैं तो वे शूर्पनखाको आगे करके चले, उसकी नाक कटी थी, अत:यही अपशकुन हो गया, और खरदूषणका विनाश हुआ। रत्‍‌नों का भी प्रभाव मानव पर पडता है, इसके अनेक उदाहरण महाकवि ने दिए हैं। सूर्यकान्तमणिसूर्य की किरणों के स्पर्श से आग उगलती है जबकि चंद्रकान्तमणिचंद्र किरणों के स्पर्श से जल। रत्‍‌न विद्ध होने से कम प्रभावी होते हैं, जैसा कि शकुन्तला के सौंदर्य वर्णन में अनाविद्धं रत्नम्कहा है। पन्ना, माणिक्य, पद्मराग, पुखराज आदि रत्‍‌नों का यथास्थान प्रसंगवशउल्लेख आया है।
इन ज्योतिषीयवर्णनों को देखकर कहा जा सकता है कि महाकवि कालिदासजितने काव्यमर्मज्ञ थे, उतने ही ज्योतिषमर्मज्ञभी। हों भी क्यों न उन पर भगवान् महाकालेश्वर एवं भगवती महाकाली जगदंबा का वरदहस्तजो था।
डा. गिरिजा शंकर शास्त्री

Friday, November 21, 2008

वाल्मीकि रामायण, तुलसी रामायण!

तुलसी रामायण का नाम रामचरित मानस है और इसकी रचना सोलहवीं शताब्दी के अंत में गोस्वामी तुलसीदास ने अवधि बोली में की. जबकि वाल्मीकि रामायण कोई तीन हज़ार साल पहले संस्कृत में लिखी गई थी. इसके रचयिता वाल्मीकि को आदि कवि भी कहा जाता है. क्योंकि उन्होंने अपने इस अदभुत ग्रंथ में दशरथ और कौशल्या पुत्र राम जैसे एक ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम की जीवन गाथा लिखी जो उसके बाद के कवियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी. उसके बाद अलग-अलग काल में और विभिन्न भाषाओं में रामायण की रचना हुई. लेकिन प्रत्येक रामायण का केंद्र बिंदु वाल्मीकि रामायण ही रही है. बारहवीं सदी में तमिल भाषा में कम्पण रामायण, तेरहवीं सदी में थाई भाषा में लिखी रामकीयन और कम्बोडियाई रामायण, पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी में उड़िया रामायण और कृतिबास की बँगला रामायण प्रसिद्ध हैं लेकिन इन सबमें तुलसी दास की रामचरित मानस सबसे प्रसिद्ध रामायण है.

दानवीर महाराज रघु


भगवान रघु अयोध्या के सम्राट थे। वे भगवान श्रीराम के प्रपितामह थे। उनके नाम से ही उनके वंश के क्षत्रिय रघुवंशी कहे जाते हैं। एक बार महाराज रघु ने एक बडा भारी यज्ञ किया। जब यज्ञ पूरा हो गया, तब महाराज ने ब्राह्मणों तथा दीन-दुखियों को अपना सारा धन दान कर दिया। महाराज इतने बडे दानी थे कि उन्होंने अपने आभूषण, सुंदर वस्त्र और सारे बर्तन तक दान कर दिए। महाराज के पास साधारण वस्त्र ही रह गए। वे मिट्टी के बर्तनों से काम चलाने लगे। यज्ञ में जब महाराज रघु सर्वस्व दान कर चुके, तब उनके पास ऋषि कौत्सनाम के एक ब्राह्मण कुमार आए। महाराज ने उनको प्रणाम किया, आसन पर बैठाया और मिट्टी के पात्र वाले जल से उनके पैर धोए। स्वागत-सत्कार हो जाने पर महाराज ने पूछा- आप मेरे पास कैसे पधारे? मैं क्या सेवा करूं?
कौत्सने कहा-महाराज मैं आया तो किसी काम से ही था, किंतु आपने तो पहले ही सर्वस्व दान कर दिया है। मैं आप जैसे महादानी उदार पुरुष को संकोच में नहीं डालूंगा। महाराज रघु ने नम्रतापूर्वक प्रार्थना की, आप अपने आने का उद्देश्य जरूर बता दें। कौत्सने बताया कि उनका अध्ययन पूरा हो गया है। अपने गुरुदेव के आश्रम से घर जाने से पहले गुरुदेव से उन्होंने गुरु दक्षिणा मांगने की प्रार्थना की। गुरुदेव बडे स्नेह से कहा- बेटा तूने यहां रहकर जो मेरी सेवा की है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। मेरी गुरु दक्षिणा तो हो गई। तू संकोच मत कर। प्रसन्नता से घर जा। लेकिन कौत्सने जब गुरु दक्षिणा देने का हठ कर लिया, तब गुरुदेव को थोडा क्रोध आ गया। वे बोले-तूने मुझसे चौदह विद्याएं पढी हैं, अत:प्रत्येक विद्या के लिए एक करोड सोने की मोहरें लाकर दे। गुरु दक्षिणा के लिए चौदह करोड सोने की मोहरें लेने के लिए ही कौत्सअयोध्या आए थे।
महाराज ने कौत्सकी बात सुनकर कहा- जैसे आपने यहां तक आने की कृपा की है, वैसे ही मुझ पर थोडी-सी कृपा और करें। तीन दिन तक आप मेरी अग्निशालामें ठहरें। रघु के यहां से एक ब्राह्मण कुमार निराश लौट जाए, यह तो बडे दु:ख एवं कलंक की बात होगी! मैं तीन दिन में आपकी गुरु दक्षिणा का कोई-न-कोई प्रबंध अवश्य कर दूंगा। कौत्सने अयोध्या में रुकना स्वीकार कर लिया। महाराज ने अपने मंत्री को बुलाकर कहा-यज्ञ में सभी सामंत नरेश कर दे चुके हैं। उनसे दुबारा कर लेना न्याय नहीं है। लेकिन कुबेरजीने मुझे कभी कर नहीं दिया। वे देवता हैं, तो क्या हुआ? कैलाश पर्वत पर रहते हैं, इसलिए पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट को उन्हें कर देना चाहिए। मेरे सब अस्त्र-शस्त्र मेरे रथ में रखवा दो। मैं कल सबेरे कुबेर पर चढाई करूंगा। आज रात मैं उस रथ पर ही सोऊंगा। जब तक ब्राह्मण कुमार को दक्षिणा न मिले, राजमहल में पैर नहीं रख सकता। उस रात महाराज रघु रथ में ही सोए। लेकिन बडे सवेरे उनका कोषाध्यक्ष उनके पास दौडा आया और कहने लगा-महाराज खजाने का घर सोने की मोहरों से ऊपर तक भरा पडा है। रात में उसमें मोहरों की वर्षा हुई है। महाराज समझ गए कि कुबेरजीने यह मोहरों की वर्षा की है। महाराज ने सब मोहरों का ढेर लगवा दिया और कौत्ससे बोले-आप इस धन को ले जाएं। कौत्सने कहा, मुझे तो गुरु दक्षिणा के लिए चौदह करोड मोहरें चाहिए। उससे अधिक एक मोहर भी मैं नहीं लूंगा। महाराज ने कहा, लेकिन यह धन आपके लिए ही आया है। ब्राह्मण का धन हम अपने यहां नहीं रख सकते। आपको ही यह सब लेना पडेगा। कौत्सने बडी दृढता से कहा-महाराज मैं एक ब्राह्मण हूं। धन का मुझे करना क्या है! आप इसका चाहे जो करें। मैं तो एक भी मोहर अधिक नहीं लूंगा। कौत्सचौदह करोड मोहरें लेकर चले गए। शेष मोहरें महाराज रघु ने दूसरे ब्राह्मणों को दान कर दिया।
डा वीराचार्यशास्त्री

सच्चा वीर

एक वृद्ध अमेरिकी व्यक्ति अपने पोते-पोतियों को अपने मन की बात बता रहा था। उसने बच्चों को बताया, उसके मन के अंदर एक संघर्ष चल रहा है। एक पक्ष है-भय, क्रोध, ईष्र्या, शोक, पश्चाताप, लोभ, द्वेष, हीनता, अभिमान, अहंकार आदि का। दूसरा पक्ष है-आनंद, हर्ष, शांति, प्रेम, आशा, विनम्रता, परोपकारिता, सहानुभूति, दानशीलता,उदारता, सत्यता, विश्वास आदि का। संभव है कि ऐसा संघर्ष तुम्हारे अंदर और अन्य व्यक्तियों में भी चल रहा होगा। कुछ क्षण के लिए बच्चे सोच में डूब गए। तब एक बच्चा बोला- दादा जी! अंत में किस पक्ष की जीत होगी? वृद्ध व्यक्ति बोला, हम जिसे जिताना चाहेंगे, यानी जैसे मनोभावोंको हम स्वयं में बढावा देंगे, उसी की जीत होगी।
आत्मबल है सहायक
वास्तव में, दूषित मनोवृत्तियांही कायरता की सूचक हैं, न कि वीरता की। दरअसल, वीर और पराक्रमी व्यक्ति वही होते हैं, जो अत्याचार करने वाले लोगों का विरोध करते हैं और निर्बल की सहायता करते हैं। ऐसे लोगों में उनका आत्मबल ही होता है, जो दूसरे लोगों में व्याप्त बुरी प्रवृत्तियों को समाप्त करने में सहायक होता है। यदि हम भी अपने भीतर परोपकार, दया, दानशीलताजैसे मनोभाव चाहते हैं, तो आत्मबल को विकसित करना अत्यंत आवश्यक है।
सत्य की राह
वीर व्यक्तियों में यह आत्मबल सत्य की राह पर चलने के कारण ही उत्पन्न होता है। और इसीलिए वे हमेशा सत्य का साथ देते हैं। अपने कहे गए सत्य वचनों को पूरा करने के लिए वे अपने जीवन की भी परवाह नहीं करते।
कौन उससे प्रसन्न है अथवा कौन उससे अप्रसन्न, इस बात की चिंता सत्य के पथिक नहीं करते। उनका एक ही उद्देश्य होता है, जरूरतमंदों की मदद करना। इस फेर में यदि कोई व्यक्ति उनसे अप्रसन्न हो जाता है, तो वे इसे नजरअंदाज कर देते हैं।
सरल मार्ग का चुनाव
हम जीवनपर्यन्तइन दो विचारों पर मंथन करते रहते हैं कि कौन कार्य हमारे लिए अच्छा है और कौन बुरा? विवेकी जन वही मार्ग चुनते हैं, जो उनके लिए सरल और शुभ हो। ऐसे लोग अपने लक्ष्य को पाने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा इसी तरफ मोड देते हैं। उनकी यह ऊर्जा सकारात्मक होती है। सच तो यह है कि नकारात्मक प्रवृत्तियां, जैसे-भय, क्रोध, ईष्र्या आदि दर्शाने वाले मनोभाव हमें गलत राह की ओर ले जाते हैं, यानी वे विनाश की ओर ले जाने वाले साबित हो सकते हैं। गीता में काम, क्रोध और लोभ को नरक का द्वार बताया गया है। साथ ही, यह भी कहा गया है कि जो लोग आत्मोन्नतिके इच्छुक हैं, उन्हें इन तीनों दुर्गुणोंका त्याग कर देना चाहिए।
सदाचारी बनें
यदि हम चिंता, भय, क्रोध, ईष्र्या, शोषण आदि दुर्गुणोंके दास बन जाएं, तो हमारा जीवन नीरस ही नहीं, भार भी प्रतीत होने लगता है। यहां तक कि व्यक्ति नशे की शरण में जाने, वैरागी बनने, आत्महत्या करने आदि जैसे कुकृत्यों को अंजाम देने लगता है। यदि हम सदाचारी बनें, तो इससे न केवल स्वयं का भला होगा, बल्कि हम आसपास के लोगों की मदद भी करने में समर्थ हो सकते हैं। दूसरी ओर, यदि हमारा व्यवहार दुराचारी व्यक्ति के समान है, तो हम अपना तो सर्वनाश करेंगे ही, साथ ही साथ हमारे आस-पास का वातावरण भी दुखदायी हो जाएगा। सच ही कहा गया है कि जब बुराई की बेल बढती है, तो उसके विषैले फल संसार में अनेक प्रकार के दुष्परिणाम पैदा करते हैं।
जीव को दो प्रकार के दुखों का सामना करना पडता है- बाहरी और भीतरी। भौतिक अभिलाषाओं की पूर्ति न होने से बाहरी दुख उत्पन्न होते हैं और अन्तर्मन में उठने वाली अभिलाषाओं से भीतरी दुखों का सर्जन होता है। हमें अपने अंदर और बाहर उत्पन्न दुखों से संघर्षपूर्ण लडाई लडनी पडती है। सच तो यह है कि हमारा जीवन इस पृथ्वी पर एक संघर्षपूर्ण युद्ध के समान है। और हम इस युद्ध का सामना तभी कर पाएंगे, जब हम निडर और आत्मविश्वासी होंगे। जिस प्रकार मृत्यु एक शाश्वत सत्य है, उसी प्रकार जीवन में संघर्ष भी अवश्यंभावी है।
श्रेष्ठ जन कहते हैं कि जीवन के संघर्षो का मुकाबला सदा जीतने के भाव से करना चाहिए। उनसे बच कर भागने के बजाय उनका दृढतापूर्वक सामना करना चाहिए, तभी सही मार्ग निकल सकता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन के शत्रुओं, जैसे-काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि को कम नहीं समझना चाहिए। यही हमारे मुख्य शत्रु हैं, जिन्हें हमें हराना है, ताकि हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। इन बुरी ताकतों को हराने के लिए संकुचित हठधर्मिता को छोडना होगा और सतत प्रयास करते रहना होगा, तभी हम सफलता की ओर कदम बढा सकेंगे।
लाजपत राय सभरवाल

Thursday, November 20, 2008

शरणागत वत्सल थे महर्षि सौभरि

ऋषियों को वेदों ने प्रजापति के अंग-भूत की संज्ञा दी है; उन्हें जन्म से ही सच्चे धर्म का ज्ञान था एवं आचरण भी उसी के अनुरूप होता था। वे त्रिकालदर्शी होते थे। सतयुग के उन्हीं श्रेष्ठ ऋषियों में थे महर्षि सौभरि।ब्रह्मा जी के पौत्र महर्षि घोर के पौत्र ऋषि सौभरिमंत्रद्रष्टामहर्षि कण्व के पुत्र थे। सदैव तपस्या में लीन रहने वाले ऋषि कण्व का रमणीक आश्रम था जहां शिष्यों की शिक्षा-दीक्षा अनवरत चलती रहती थी। उस काल में वृत्तासुरका आतंक संत-महात्माओं के लिए कष्टदायक बना हुआ था। उसने इन्द्र से इन्द्रासन बलपूर्वक छीन लिया था। वृत्तासुरको भस्म करने के लिए इन्द्र ने महर्षि दधीचिसे प्रार्थना की तथा उनकी अस्थियां प्राप्त कर बज्रबनाया और वृत्तासुरको मार दिया। वृत्तासुरके भस्म होने के बाद बज्रसृष्टि को भी अपने तेज से जलाने लगा। इस समाचार को नारद जी ने भगवान विष्णु से कहा और सृष्टि की रक्षा हेतु निवेदन किया। भगवान विष्णु ने नारद जी को बताया कि जहां एक ओर बज्रमें नष्ट करने की शक्ति है; तो दूसरी ओर सृजन करने की विलक्षण क्षमता भी है। विष्णु जी ने नारद जी से भूमण्डल पर महर्षि दधीचिके समकक्ष किसी तपस्वी ऋषि का नाम बताने को कहा। नारद ने महर्षि कण्व की प्रशंसा करते हुए उन्हीं का नाम इस हेतु प्रस्तावित किया। भगवान विष्णु महर्षि कण्व के आश्रम पर पहुंचे और बज्रके तेज को ग्रहण करने का आग्रह किया। ऋषिश्रेष्ठने सृष्टि के कल्याण के लिए उस तेज को ग्रहण करना स्वीकार किया। विष्णु भगवान ने कहा कि बज्रका तेज संहारक के साथ-साथ गर्भोत्पादकभी है। कुछ दिनों बाद ऋषि पत्नी गर्भवती हुई। पुत्ररत्नकी प्राप्ति हुई। ये ही आगे चलकर तपोधन महर्षि सौभरिहुए। बालक सौभरिने पिता कण्व से तत्वमसि का ज्ञान प्राप्त किया। ऋषि कण्व ने उन्हें सबका मूल सत् बताया। जगत का ईश्वर हमारी अपनी ही अन्तरात्मा स्वरूप है उसे दूरवर्ती कहना ही नास्तिकताहै। ऋषि ने आगे कहा-वत्स! जगत की अनन्त शक्ति तुम्हारे अन्दर है। मन के कुसंस्कारउसे ढके हैं, उन्हें भगाओ, साहसी बनो, सत्य को समझो और आचरण में ढालो। कण्व पुन:बोले-पुत्र! जैसे समुद्र के जल से वृष्टि हुई वह पानी नदी रूप हो समुद्र में मिल गया। नदियां समुद्र में मिलकर अपने नाम तथा रूप को त्याग देती हैं; ठीक इसी प्रकार जीव भी सत् से निकल कर सत् में ही लीन हो जाता है। सूक्ष्म तत्व सबकी आत्मा है, वह सत् है। वह सत् तू ही है। तत्वमसि तत्वज्ञान प्राप्त कर एवं पिताजीसे आज्ञा प्राप्त कर सबसे मिलकर हर्षित हो सौभरिवनगमन करते हैं।
महर्षि सौभरिसृष्टि के आदि महामान्य महर्षियोंमें हैं। ऋग्वेद की विनियोग परंपरा तथा आर्षानुक्रमणीसे ज्ञात होता है कि ब्रह्मा से अंगिरा,अंगिरासे घोर, घोर से कण्व और कण्व से सौभरिहुए। इसके अनुसार सौभरिबहुऋचाचार्यमहामहिम ब्रह्मा के पौत्र के पौत्र हुए। मान्यता है कि फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को इन्होंने जन्म ग्रहण किया। महर्षि सौभरिएक हजार वर्ष तक यमुना हृदजहां ब्रज का कालीदहऔर वृन्दावन का सुनरखवन है, में समाधिस्थ हो तपस्या करते हैं। इन्द्रादिकसमस्त देव उनकी परीक्षा के लिए महर्षि नारद को भेजते हैं। नारद जी भी सौभरिजी के तप एवं ज्ञान से प्रभावित हो वंदन करते हैं तथा सभी देवगण उनका पुष्प वर्षा कर अभिनंदन करते हैं। इधर अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट राजा मान्धातावर्षा न होने के कारण राज्य में अकाल पडने से बहुत दुखी थे। अपनी सहधर्मिणी से प्रजा के कष्टों की चर्चा कर ही रहे थे; कि घूमते-घूमते नारद जी सम्राट मान्धाताके राजमहल में पधारे। सम्राट ने अपनी व्यथा नारद जी को निवेदित कर दी। नारद जी ने अयोध्या नरेश को परामर्श दिया कि वे शास्त्रों के मर्मज्ञ, यशस्वी एवं त्रिकालदर्शी महर्षि सौभरिसे यज्ञ करायें। निश्चय ही आपके राज्य एवं प्रजा का कल्याण होगा। राजा मान्धातानारद जी के परामर्श अंतर्गत ब्रह्मर्षि सौभरिके यमुना हृदस्थित आश्रम में पहुंचे तथा अपनी व्यथा कथा अर्पित की। महर्षि ने ससम्मानअयोध्यापतिको आतिथ्य दिया और प्रात:काल जनकल्याणकारी यज्ञ कराने हेतु अयोध्यापतिके साथ अयोध्या पहुंच जाते हैं।
यज्ञ एक माह तक अनवरत रूप से अपना आनंद प्रस्फुटित करता है और वर्षा प्रारम्भ हो जाती है। सम्राट दम्पति ब्रह्मर्षि को अत्यधिक सम्मान सहित उनके आश्रम तक पहुंचाने आये। महर्षि का अपनी तपस्या के अंतर्गत नैतिक नियम था कि आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को प्रतिदिन भोज्य प्रदान किया करते थे। शरणागत वत्सल महर्षि सौभरिकी ख्याति भी सर्वत्र पुष्पित थी। विष्णु भगवान का वाहन होने के दर्प में गरुड मछलियों एवं रमणकद्वीप के निवासी कद्रूपुत्र सर्पो को अपना भोजन बनाने लगा। सर्पो ने शेषनाग से अपना दुख सुनाया। शेषनाग जी ने शरणागत वत्सल महर्षि सौभरिकी छत्रछाया में शरण लेने का परामर्श उन्हें दिया। कालियनाग के साथ पीडित सर्प सौभरिजी की शरणागत हुए। मुनिवरने सभी को आश्वस्त किया तथा मछली एवं अहिभक्षीगरुड को शाप दिया कि यदि उनके सुनरखस्थित क्षेत्र में पद रखा तो भस्म हो जाएगा। इस क्षेत्र को महर्षि ने अहिवास क्षेत्र घोषित कर दिया। तभी से महर्षि सौभरिअहि को वास देने के कारण अहिवासी कहलाये। इस प्रकार उस स्थल में अहि,मछली तथा सभी जीव जन्तु, शान्ति पूर्वक निवास करते रहे। तपस्या करते बहुत काल हो जाने पर भगवान विष्णु एक दिवस सौभरिजी के पास आकर निर्देश देते हैं कि सृष्टि की प्रगति के लिए ऋषि जी गृहस्थ धर्म में प्रवेश करें और इसके लिए नृपश्रेष्ठ मान्धाताके अन्त:पुर की एक कन्या से पाणिग्रहण करें। इच्छा न होने के बावजूद सृष्टि कल्याण के लिए भगवान विष्णु के निर्देशानुसार महर्षि सम्राट मान्धाताके यहां पहुंचे तो उनकी पचासों कन्याओं ने उनको वर बनाने की इच्छा जताई। कन्याओं का पाणिग्रहण वेद रीति से सौभरिके साथ कर दिया तथा अपार दहेज देकर उनके आश्रम अहिवास (सुनरख) को विदा किया। योग माया ने महर्षि के निर्देश पर सभी के लिए अलग-अलग आवासों की व्यवस्था कर दी। महर्षि सौभरिपत्नियों के साथ योग बल से रहते थे। एक दिवस मान्धातापुत्रियों का कुशल-क्षेम जानने महर्षि के आश्रम आये। प्रत्येक पुत्री के प्रासाद में नृपको महर्षि मिलते तथा पुत्री सर्वथा आनन्दित। महर्षि ने राजा को काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार को त्यागने का उपदेश किया। महर्षि सौभरिके गुणवान एवं रूपवानपांच सहस्रपुत्र-पुत्रियां हुए तथा पौत्र-प्रपौत्र भी हुए जो अहिवासीकहलाये। एक दिन महर्षि को लगा कि उनका काम पूरा हो गया है और सभी पत्‍ि‌नयों एवं परिवार को बताकर पुन:तपस्या की ओर बढने की इच्छा हुई।
ऋषि पत्नियों ने भी महर्षि के साथ ही तपस्या में सहयोग करने का आग्रह किया। तपस्या में लीन हो प्रभु दर्शन कर समाधिस्थ हो गए। महर्षि का तपस्थलआज भी एक टीले के रूप में विद्यमान है जहां मंदिर में महर्षि सौभरिकी पूजा होती है। भक्त उदार मना महर्षि की आराधना कर मनचाहा मनोरथ प्राप्त करते हैं।
डा. कन्हैया लाल पाण्डेय

सूफी काव्य के अग्रदूत बाबा शेख फरीद



शेख फरीद भारतीय सूफी काव्य के प्रथम और प्रामाणिक हस्ताक्षर हैं। सूफी काव्य के बुनियादी संकल्प शेख फरीद की वाणी में नये उद्बोधन के साथ उभरते हैं। सूफी जीवन दर्शन सामाजिक जीवन के संतुलन पैदा करने वाली जीवन शैली थी। जिसका प्रचार-प्रसार हमें शेख फरीद के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्वमें मिलता है। उत्तरभारत की सूफी परंपरा शेख फरीद के जीवन के दर्शन से केवल प्रभावित ही नहीं रही, बल्कि इसका सही अनुसरण लोक-जीवन में भी मिलता है।
शेख फरीद जीवन के नैतिक मूल्यों की वकालत भी करते हैं तथा इसे आदर्श जीवन का मानदण्ड भी स्वीकार करते हैं। शेख फरीद की वाणी में ऐसे कई पहलू देखे जा सकते हैं। शेख फरीद का जीवन दर्शन केवल किताबी नहीं है, उसमें सही जिन्दगी की वह तस्वीर भी अंकित है जो आलोक-स्तंभ बनकर आस्था के नए स्वरों को जन्म देती है। जीवन की प्रत्येक सच्चाई को शेख फरीद गंभीरतापूर्वक लेते हैं। वे जीवन के धनात्मक मूल्यों के पक्षधर हैं। फरीद की वाणी में मानव जीवन का महाबिम्बविद्यमान है। इस महाबिम्बमें जन्म, शैशव, यौवन और बुढापे का चित्रण बडी खूबसूरती से हुआ है।
वहीं शेख फरीद की वाणी में स्वतंत्र मानव की वह छवि उभरती है, जिसके कारण वह नेक और उमदा इंसान बना हुआ है। शेख फरीद अकाल पुरखपर सौ-प्रतिशत विश्वास करते हैं। रब्बकी रजा उनके लिए अन्तिम फरमान है। वे ज्ञान और क्रिया में केवल विश्वास ही नहीं रखते बल्कि अपनी वाणी में यह भी साबित करते हैं कि भरोसे का खेल हर व्यक्ति के बस की बात नहीं है। अल्ला की जात पर ईमान रखने वाला व्यक्ति उन तमाम सीमाओं को लांघ जाता है, जिसकी अपेक्षा दुनिया में उससे की जाती है। शेख फरीद की स्थापनाओं में धर्म का असली चेहरा रौशन होता है। इस रोशनी में त्याग, सेवा, भाईचारा तथा जीवन के प्रति गहरी निष्ठा अपना कमाल दिखाती है। इस जागरण में आदमी की वह मनोदशा क्रियाशील होती है, जिसकी वजह से उसका मनोबल मानवीय शक्ति में रूपांतरण हो जाता है।
इसके अलावा फरीद वाणी में यह दास्तान बहुआयामी है। फरीद का अनुभव यथार्थवादी है। फरीद उस परम्परा का तत्काल समर्थन नहीं करते, जिसकी अर्थवत्तायुग के अनुरूप नहीं है। वह चाहते हैं कि परंपरा का सांस्कृतिक सम्प्रेषण सीधे लोक जीवन में हो जिसकी सार्थकता शाश्वत काल तक बनी रहे। शेख फरीद की वाणी में ऐसे जीने के कई साक्ष्य मिलते हैं। फरीद वाणी के विकास में यह विमर्श मूल्यवान भी है तथा सम्पूर्ण अखण्ड भी। वास्तव में शेख फरीद के जीवन दर्शन की यही सम्भावना और गहराई है। शेख फरीद की वाणी में हिन्दोस्तानभी हािजर और पंजाब भी। पंजाबी जन-जीवन के सूक्ष्म ब्यौरों से फरीद वाणी नई साहित्यिक विरासत को जन्म देती है।
दर्शन मीमांसा के कई महत्वपूर्ण संदर्भ फरीद वाणी में नव चेतना के साथ दर्ज हुए हैं। सूफी दर्शन का सरलीकरण फरीद वाणी की विशेषता है। कठिन से कठिन सूफी अनुभव फरीद वाणी में सरल बन जाता है। इसीलिए ओशोफरीद वाणी को शीतल-छांग की संज्ञा देते हैं। फरीद की वाणी में आनंद और सुख के श्लोक एक ऐसा सच्चा वातावरण पैदा करते हैं, जिसमें क्षण, दिन-रात तथा पूरा परिवेश नई दिशा को ग्रहण कर लेता है और मौन की करामात अन्तर्तममन पर बरस जाती है। यही विचार फरीद वाणी का केन्द्र है। फरीद वाणी की अन्त‌र्ध्वनियांसम्पूर्ण सत्य का उद्घाटन कर देती है।
छायारूपइस जगत को उस महान् अस्तित्व से जोड देती है, जिसका सरोकार उस सत्य से होता है जिसकी असलियत अंधेरे और प्रकाश के संघर्ष में जन्म ले रही होती है। शेख फरीद चाहते हैं कि उन अंधेरे रास्तों को सदा के लिए प्रकाशमान बना दिया जाए जो हर आदमी को स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और सौहार्द से वंचित रखता है। फरीद चाहते हैं कि सच्चा इन्सान खुदा पर विश्वास रखे, अपने सत्य को पाने का विश्वास करे तथा तार्किक और बौद्धिक उलझनों में न उलझकर गहन समक्ष से उस सत्य को प्राप्त कर ले, जिसके लिए वह भटक रहा है। फरीद वाणी का यही जीवन्त महान् उपदेश है। बाबा शेख फरीद के पास भी लोगों को अजर और अमर बनाने की नैतिक शिक्षाओं की महान औषधि थी। यह औषधि मन और तन निरोग कर देती थी।
यही कारण है कि शेख फरीद का फलसफा पूरे हिन्दोस्तानमें भाईचारे के सन्देश के साथ फैला।
शेख फरीद समाज में ऐसा माहौल बनाना चाहते थे, जिसके माध्यम से नये दर्शनशास्त्र की मिसाल कायम हो सके। उन्हें यह अहसास था कि दुनिया में रहने वाले रब्बके बन्दे तभी शान्ति से रह सकते हैं यदि प्रेम की सरिता अविरल बहे। मन की तडप, प्रभु को पा लेने की इच्छा तभी स्थिर हो सकती है यदि सच्चे ईश्वर के प्रति न खत्म होने वाली ललक पैदा हो जाए। पंजाबी साहित्य में जो दीपक शेख फरीद जी ने बिरहा की अग्नि वाला जलाया, वह आज तक पंजाबी काव्य में अपनी आभा बिखेर रहा है। शेख फरीद भारतीय भाषाओं में बिरहा के भी पहले कवि हैं। पंजाब का यह सौभाग्य है कि हर बरस बाबा शेख फरीद का पर्व श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। बाबा शेख फरीद को याद करने का अर्थ है, उस सांझे भाईचारे को याद करना, जिसके कारण पंजाब न हिंदू और न मुसलमान बल्कि वह तो महान विरासत है जिसके कण-कण में बाबा शेख फरीद का महान संदेश छुपा हुआ है। बाबा शेख फरीद ने पंजाबियों को भरे-पूरे जीवन की जांच सिखलाई।
प्रो. हरमहेन्द्रसिंह बेदी

Wednesday, November 19, 2008

वैदिक विद्याओं के संपादक : महर्षि वेदव्यास

महर्षि वेदव्यासभगवान विष्णु के कालावतारमाने गए हैं। कलियुग में पाप के प्रबल और पुण्य के क्षीण होने से मनुष्य की आयु, बौद्धिक प्रतिभा एवं आध्यात्मिक शक्ति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडा है। आज संपूर्ण वैदिक ज्ञान रखने वाले पृथ्वी पर दुर्लभ हो गए हैं। वैदिक यज्ञों-अनुष्ठानों का लोप होता जा रहा है। सर्वज्ञ भगवान से यह बात छिपी नहीं थी, अत:जीवों के कल्याण के लिए स्वयं श्रीहरिद्वापरयुगके अंतिम चरण में ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के पौत्र महर्षि पराशरके अंश से कैवर्तराजकी पोष्यपुत्रीसत्यवती के गर्भ द्वारा महर्षि व्यास के रूप में अवतरित हुए।
व्यासजीका जन्म द्वीप में होने से इनका नाम द्वैपायन पडा। श्यामवर्ण का शरीर होने से ये कृष्णद्वैपायन कहलाए। जन्म लेते ही इन्होंने अपनी माता से जंगल में जाकर तपस्या करने की इच्छा प्रकट की। प्रारंभ में इनकी माता ने इन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया, किन्तु अन्त में माता के स्मरण करते ही तत्काल उनके पास आने का वचन देकर इन्होंने माँ की अनुमति प्राप्त कर ली। ये तप करने के लिए हिमालय चले गए और वहाँ नर-नारायण की साधनास्थलीबदरीवनमें तपस्या की। इससे इनकी बादरायण नाम से प्रसिद्धि हो गई।
महर्षि व्यास अलौकिक शक्ति-संपन्न महाविद्वानहैं। लोगों को आलसी, अल्पायु, मंदमतिऔर पापरतदेखकर इन्होंने वेद का विभाजन किया। मनुष्यों की धारणा-शक्ति को कमजोर होते देख व्यासजीने वेद को ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद-इनचार भागों में विभाजित किया और एक-एक वैदिक संहिता अपने चार प्रमुख शिष्यों को पढाई। उन्होंने पैलको ऋग्वेद, वैशम्पायनको यजुर्वेद, जैमिनिको सामवेद तथा सुमन्तुको अथर्ववेदका संपूर्ण अध्ययन कराया। तत्पश्चात प्रत्येक संहिता की फिर अनेक शाखा-प्रशाखाएं हुई। इस प्रकार इन्हीं के द्वारा वैदिक वाङ्गमयका सम्पादन और विस्तार हुआ। व्यास का शाब्दिक अर्थ है विस्तार। वेदों का विस्तार इनके माध्यम से होने के कारण इनका नाम वेदव्यास पडा, जो कि इनके अन्य नामों की अपेक्षा सर्वाधिक लोकप्रिय भी है। समाज का कोई भी वर्ग वैदिक विद्याओं के ज्ञान से वंचित न रहे, इसलिए महर्षि वेदव्यासने महाभारत की रचना की। कहा जाता है कि स्वयं भगवान गणेश ने इस महान ग्रंथ को लिपिबद्ध किया था। इनके द्वारा प्रणीत महाभारत को मनीषी पंचम वेद मानते हैं। श्रीमद्भगवद्गीताइस महाभारत का ही अंश है। व्यासजीने महाभारत को सर्वप्रथम अपने पांचवें प्रमुख शिष्य लोमहर्षणजीको पढाया था।
वेदान्त-दर्शन के साथ अनादि पुराण को लुप्त होते देखकर श्रीवेदव्यासने अट्ठारह पुराणों का प्रणयन किया। उपनिषदों का सार-तत्व समझाने के लिए इन्होंने ब्रह्मसूत्र का निर्माण किया, जिनपर शंकराचार्य, वल्लभाचार्यआदि अनेक महाविद्वानोंने भाष्य-रचना कर अपना-अपना अलग मत स्थापित किया। व्यास-स्मृति के नाम से रचा हुआ इनका एक स्मृतिग्रंथभी उपलब्ध होता है। इस प्रकार भारतीय वाङ्गमयएवं हिन्दू संस्कृति पर वेदव्यासजीका बहुत बडा ऋण है। ये श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण के प्रधान व्याख्याता हैं। सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में इनका विशिष्ट योगदान है। व्यास-जन्मतिथि आषाढी पूर्णिमा गुरुपूर्णिमा के रूप में महापर्वबन गई है, जिसे प्रतिवर्ष अत्यंत श्रद्धा एवं उत्साह के साथ सनातन धर्मावलम्बी मनाते हैं। गुरु-शिष्य परम्परा को सुदृढ बनाने के उद्देश्य से व्यास-पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।
संसार को श्रीमद्भगवद्गीताजैसा अनुपम आध्यात्मिक रत्न श्रीवेदव्यासकी कृपा से ही प्राप्त हुआ। इन्होंने ही भगवान श्रीकृष्ण के उस अमर उपदेश को अपनी महाभारत में ग्रंथित कर उसे संपूर्ण विश्व के लिए सुलभ बना दिया। प्राणियों के कल्याण की कामना से भक्ति-रस के सागर को महर्षि व्यास ने श्रीमद्भागवत महापुराणके 18हजार श्लोकों में बांध दिया है।
दिव्य तेज, असीम शक्ति एवं असाधारण गुणों से संपन्न महर्षि व्यास को मनीषियोंने त्रिदेवोंकी समकक्षताप्रदान की है-
अचतुर्वदनोब्रह्मा द्विबाहुपरोहरि:।
अभाललोचन:शम्भुर्भगवान्बदरायण:॥
श्रीव्यासदेव चतुर्मुख न होते हुए भी ब्रह्मा, दो भुजाओं वाले होते हुए भी दूसरे विष्णु तथा त्रिनेत्रधारीन होने पर भी साक्षात् शिव ही हैं।
इसीलिए इनकी स्तुति में यह कहा गया है-
नमोऽस्तुतेव्यास विशालबुद्धे
फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र।
येन त्वयाभारततैलपूर्ण:
प्रज्वालितो ज्ञानमय: प्रदीप:॥
खिले हुए कमल की पंखुडी के समान बडे-बडे नेत्रों वाले महाबुद्धिमानव्यासदेव!आपने अपने महाभारतरूपीतेल के द्वारा दिव्य ज्ञानमय दीपक को प्रकाशित किया है, आपको नमस्कार है।
वस्तुत:वेद भारतीय संस्कृति के प्राण हैं। भारतीय धर्म, दर्शन, अध्यात्म, आचार-विचार, रीति-नीति, विज्ञान-कला आदि सभी कुछ वेद से ही अनुप्राणित है। हमारे जीवन और साहित्य की ऐसी कोई विधा नहीं है, जिसका बीज वेद में न मिले। सही मायनों में वेद हमारी सभ्यता की आधारभूमिहै। महर्षि वेदव्यासने वेद के विभाजन का युगान्तकारीकार्य करके इस अथाह ज्ञान-राशि को लोकहित में संपादित कर दिया। महाभारत के माध्यम से वेदांशसमाज के सभी वर्गो तक पहुँचाया। ऐसे अवतारीमहापुरुष का अवतरण-दिवस सबके लिए गुरु पूर्णिमा के रूप में सत्प्रेरणाका महापर्वबन गया है।

Tuesday, November 18, 2008

सतत् यायावर स्वामी रामतीर्थ

पंजाब के मुरलीवालाग्राम के निवासी पण्डित हीरानंदके परिवार में सन् 1873ई.में दीवाली के दिन एक पुत्ररत्नकी प्राप्ति होती है। नाम रखा जाता है तीरथराम।शिशु-जन्म के कुछ दिन बाद माता का देहान्त। शिशु के पालन-पोषण का भार उसकी बुआ पर। बालक तीरथशैशवकाल से ही कृशकाय।पांच वर्ष की आयु में विद्यारंभ। प्राथमिक स्तर पर फारसी की शिक्षा। 10वर्ष की आयु तक प्राथमिक शिक्षा पूरी हो जाती है। इसी आयु में विवाह। आगे की पढाई के लिए बालक तीरथरामगुजरांवालाजाता है। वहां पंडित हीरानन्दके मित्र धन्नारामका निवास-स्थान। उन्हीं के यहां रहकर तीरथरामकी पढाई। 14वर्ष की आयु में तीरथराममैट्रिक परीक्षा में पूरे राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त करता है। पुरस्कार स्वरूप उसे राज्य की ओर से छात्रवृत्ति। आगे की पढाई के लिए तीरथरामलाहौर जाता है। पिता की वित्तीय स्थिति चिन्तनीय। वे तीरथको आगे पढाने में असमर्थ। तीरथछात्रवृत्ति के सहारे ही आगे पढने का निर्णय लेता है। अध्ययन क्रम में अनेक व्यवधान। तीरथअपनी संकल्प-शक्ति के सहारे सारी विघ्न-बाधाओं को पार कर जाता है। वह इण्टरमीडिएट परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करता है। उसे पुन:छात्रवृत्ति मिलती है। एक ओर तो शैक्षिक सफलता का यह क्रम, दूसरी ओर भीषण परिस्थितियां तीरथरामके धैर्य और आत्मविश्वास की परीक्षा लेने के लिए और अधिक आतुर। पिता जी तीरथरामकी पत्नी को उसके पास छोड जाते हैं। कहां तो अपना ही ठिकाना नहीं, कहां एक और प्राणी के योगक्षेम के वहन की समस्या। कभी-कभी तो इस दम्पति को निराहारतक रह जाना पडता है। तीरथरामनंगे पांव विद्यालय जाता है। बीएकी परीक्षा में संस्कृत और फारसी विषयों में तीरथको उच्चांक मिलते हैं पर अंग्रेजी में वह अनुत्तीर्ण हो जाता है। अत:पूरी परीक्षा में अनुत्तीर्ण। अब क्या किया जाय? कहीं से कोई सहारा नहीं। इसी घोर अंधकार में आशा का एक दीप टिमटिमाता है। झंडूमलनाम का एक मिठाई वाला है। वह तीरथरामके परिवार के भोजन,आवास आदि की व्यवस्था करता है। इससे तीरथराममें थोडा आत्मविश्वास जगता है। वह पूरी शक्ति लगाकर परीक्षा की तैयारी करता है और अगले वर्ष पूरे विश्वविद्यालय में बीएकी परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करता है। उसे पुन:छात्रवृत्ति मिलती है। तीरथरामकी आयु 19वर्ष है। तीरथरामलाहौर विश्वविद्यालय से ही गणित विषय में परास्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करता है। तीरथरामजीविकोपार्जन हेतु सियालकोटमें अमेरिकन मिशन द्वारा संचालित एक विद्यालय में शिक्षण-कार्य प्रारम्भ करता है। वेतन होता है 80रुपये प्रतिमाह। इसी क्रम में वह दो पुत्रों का पिता हो जाता है। पुत्रों के नाम हैं, मदन गोस्वामी और ब्रह्मानन्द। परिवार के बन्धनों और जीविकोपार्जन की बाध्यताओं से तीरथरामका मन क्रमश:उचटने लगता है। उसकी व्याकुलता दिनों-दिन बढती जाती है।
अंतत:25वर्ष की आयु में नौकरी-चाकरी, घर परिवार छोडकर तीरथरामऋषिकेश के पास ब्रह्मपुरी में निवास करने लगता है। ऐसी लोकमान्यताहै कि इसी स्थान पर तीरथरामको दिव्य-ज्ञान की प्राप्ति होती है। 28वर्ष की अवस्था में तीरथरामएक नया व्यक्तित्व ग्रहण करते हैं। वे तीरथरामसे स्वामी रामतीर्थ हो जाते हैं। वे परम्परागत संन्यास की सीमाओं में बंधना नहीं चाहते हैं। बस, शिखा और सूत्र गंगा जी में फेंककर संन्यास-भाव में आ जाते हैं। टेहरीके महराज ज्ञानाभासे प्रभावित होकर आपको देश-विदेश की यात्रा हेतु प्रेरित करते हैं। स्वामी रामतीर्थ जापान एवं अमेरिका की यात्रा करते हैं। इन देशों में वे लोगों को भारत के औपनिषदिक ज्ञान की झलक दिखाते हैं।
अमेरिका में उनका प्रवास लगभग दो वर्षो
तक रहता है। विदेश-यात्रा से लौटकर महाराज
टेहरीके विशेष आग्रह पर स्वामी रामतीर्थ टेहरीराज्य में गंगा जी के किनारे एक कुटी में निवास करने लगते हैं। एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्वामी रामतीर्थ गंगा-स्नान हेतु जाते हैं। स्नान क्रम में वे आगे ही बढते जाते हैं। अचानक वे एक भंवर में फंस जाते हैं और वहीं उनकी जलसमाधि बन जाती है। यह घटना 1906की है। इस समय स्वामी जी की आयु मात्र 33वर्ष है। स्वामी जी फारसी, संस्कृत और हिंदी के अच्छे कवि थे।
डा. वंशीधर त्रिपाठी

Monday, November 17, 2008

सच्चा आध्यात्मिक नायक स्वामी विवेकानंद


स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत के एक क्रांतिकारी संत हुए हैं। 12जनवरी, 1863को कलकत्ता में जन्मे इस युवा संन्यासी के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ था। इन्होंने अपने बचपन में ही परमात्मा को जानने की तीव्र जिज्ञासावशतलाश आरंभ कर दी। इसी क्रम में सन् 1881में प्रथम बार रामकृष्ण परमहंस से भेंट की और उन्हें अपना गुरु स्वीकार कर लिया तथा अध्यात्म-यात्रा पर चल पडे। काली मां के अनन्य भक्त स्वामी विवेकानंद ने आगे चलकर अद्वैत वेदांत के आधार पर सारे जगत को आत्म-रूप जताया और कहा कि आत्मा को हम देख नहीं सकते किंतु अनुभव कर सकते हैं। यह आत्मा जगत के सर्वाश में व्याप्त है। सारे जगत का जन्म उसी से होता है, फिर वह उसी में विलीन हो जाता है। उन्होंने धर्म को मनुष्य, समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए स्वीकार किया और कहा कि धर्म मनुष्य के लिए है,मनुष्य धर्म के लिए नहीं। भारतीय जन के लिए, विशेषकर युवाओं के लिए उन का नारा था -उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति होने तक रुको मत।
31मई, 1883को वह अमेरिका गए।
11सितंबर, 1883में शिकागोके विश्व धर्म सम्मेलन में उपस्थित होकर अपने संबोधन में सबको भाइयो और बहनोकह कर संबोधित किया।
इस आत्मीय संबोधन पर मुग्ध होकर सब बडी देर तक तालियां बजाते रहे। वहीं उन्होंने शून्य को ब्रह्म सिद्ध किया और भारतीय धर्म दर्शन अद्वैत वेदांत की श्रेष्ठता का डंका बजाया, उनका कहना था कि आत्मा से पृथक करके जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु से प्रेम करते हैं, तो उसका फल शोक या दु:ख होता है।
अत:हमें सभी वस्तुओं का उपयोग उन्हें आत्मा के अंतर्गत मान कर करना चाहिए या आत्म-स्वरूप मान कर करना चाहिए ताकि हमें कष्ट या दु:ख न हो। अमेरिका में चार वर्ष रहकर वह धर्म-प्रचार करते रहे तथा 1887में भारत लौट आए। फिर बाद में 18नवंबर,1896 को लंदन में अपने एक व्याख्यान में कहा था, मनुष्य जितना स्वार्थी होता है, उतना ही अनैतिक भी होता है।
उनका स्पष्ट संकेत अंग्रेजों के लिए था, किंतु आज यह कथन भारतीय समाज के लिए भी कितना अधिक सत्य सिद्ध हो रहा है? स्वामी विवेकानंद ने धर्म को मात्र कर्मकांड की निर्जीव क्रियाओं से निकाल कर सामाजिक परिवर्तन की दिशा में लगाने पर बल दिया। वह सच्चे मानवतावादी संत थे। अत:उन्होंने मनुष्य और उसके उत्थान और कल्याण को सर्वोपरि माना। इस धरातल पर सभी मानवों और उनके विश्वासों का महत्व देते हुए धार्मिक जड सिद्धांतों तथा सांप्रदायिक भेदभाव को मिटाने के आग्रह किए।
युवाओं के लिए उनका कहना था कि पहले अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट बनाओ, मैदान में जाकर खेलो, कसरत करो ताकि स्वस्थ-पुष्ट शरीर से धर्म-अध्यात्म ग्रंथों में बताए आदर्शो में आचरण कर सको। आज जरूरत है ताकत और आत्म विश्वास की, आप में होनी चाहिए फौलादी शक्ति और अदम्य मनोबल।
विवेकानंद ने शिक्षा को अध्यात्म से जोड कर कहा कि जिस संयम के द्वारा इच्छाशक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। हमें तो ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र बने, मानसिक बल बढे, बुद्धि का विकास हो और जिससे मनुष्य अपने पैरों पर खडा हो सके।
पराधीन भारतीय समाज को उन्होंने स्वार्थ, प्रमाद व कायरता की नींद से झकझोर कर जगाया और कहा कि मैं एक हजार बार सहर्ष नरक में जाने को तैयार हूं यदि इससे अपने देशवासियों का जीवन-स्तर थोडा-सा भी उठा सकूं।
इस प्रकार एक सच्चे भारतीय संत की मर्यादा के अनुरूप स्वामी विवेकानंद ने अशिक्षा, अज्ञान, गरीबी तथा भूख से लडने के लिए अपने समाज को तैयार किया तो राष्ट्रीय चेतना जगाने, सांप्रदायिकता मिटाने, मानवतावादी संवेदनशील समाज बनाने की एक आध्यात्मिक नायक की भूमिका निभाते हुए 4जुलाई सन् 1902में कुल 39वर्ष की आयु में अपनी इहलीला समाप्त की।
डा. बलदेव वंशी

Saturday, November 15, 2008

संत कबीर-रचा वंचितों का वेद

कबीर भारतीय चिंतन-परंपरा के पुरस्कर्ताइन अर्थो में हैं, क्योंकि वे मृत्यु का सहर्ष स्वागत करते हैं। आत्म, परम-आत्म और अध्यात्म में कबीर का इतना अगाध विश्वास है कि वे दैहिक मृत्यु को भी नगण्य मानते हैं। उनका ऐसा विश्वास इसलिए भी है, क्योंकि दैहिक मृत्यु के बाद पूर्ण एवं परम आत्मा से मिलन संभव होगा :
जिस मरने से जग डरे, मेरे मन आनंद।
कब मरिहोंकब पायहुं,पूरन परमानंद॥
बिना मृत्यु के परमात्मा से मिलन संभव नहीं है। यहां मरने का एक अर्थ अहंकार का मरना, दंभ को, मैं पन को मारना भी है।
कबीर ने काल और महाकाल के भय से मानव को मुक्त कर जीवन की महत्ता सिद्ध की है। निर्धन, दमित, उपेक्षित, दलित व्यक्ति को भी कबीर धनवान नहीं, बल्कि आत्मवानबनाते हैं और वह स्वयं को धनवानों से भी अधिक धनवान तथा महिमावान समझता है। सामाजिक गैर-बराबरी, जाति-पांति की विषमता से लडने की आंतरिक, वास्तविक क्षमताओं से कबीर व्यक्ति को जोडते हैं। उसमें आत्मा, आत्म-शक्ति जगाते हैं।
जीवन के प्रति अगाध विश्वासों से कबीर हमें भर देते हैं, ताकि अपसंस्कृति एवं अमानवीयताके विपरीत व्यक्ति अध्यात्म सत्ता से जुडे और आत्मीय-मानवीय विश्व का सु-नागरिक सिद्ध हो।
सच है-परमात्मा ही पूर्ण है। योग-ध्यान-आत्मा द्वारा उससे संयुक्त होकर ही शांति, आनंद और आत्म-तुष्टि का अनुभव किया जा सकता है। यही कारण है कि कबीर उस पूर्ण, परमात्मा से जुडने के मार्ग दिखाते हैं। परमात्मा के पूर्ण होने की वैदिक अवधारणा के आधार पर वे कहते हैं :
पूरे सोंपरिचय भया,सब दु:ख मेल्यादूरी।
निर्मल कीन्हींआत्मा, ताथैंसदा हुजूरी॥
सब प्रकार की हिंसा, हत्या, दु:ख-क्लेश से मुक्त होने और परमात्मा के हर समय, हर कहीं खुले दर्शन करने का एक ही मार्ग है-आत्मा की निर्मलता। निर्मल आत्मा से परमात्मा तक पहुंचाने का मार्ग दिखाने वाले मसीहा हैं कबीर।
कबीर विद्वेषियोंने उन पर कई आक्षेप किए हैं। उन्हें वेद-विरोधी व नारी निंदक तक कहा गया है, जबकि ये दोनों बातें व्यर्थ भ्रमित करने वाली हैं। वेद का अर्थ ज्ञान है, आत्मिक-आध्यात्मिक ज्ञान है, जो वेदनात्मकताएवं संवेदनात्मकताका आधार है। कबीर ज्ञानमार्गीमाने जाते हैं। उनका मार्ग भक्ति व कर्म से अधिक एवं मुखर ज्ञान का मार्ग है। कबीर यदि ज्ञान (वेद) से भी विरोध रखने वाले माने जाएंगे, तब उनके चिंतन का और कौन सा आधार है? कबीर की एक साखी संतों में प्रसिद्ध है।
वे कहते हैं :
वेद हमारा भेद है, हम वेदन के माहिं।
जिन वेदन में हम रहें, वेदौंजानतनाहिं॥
कह सकते हैं कि कबीर ने वंचितों का वेद रचा। नारी और शूद्र्र को वेद पाठ से वंचित कर दिए जाने पर कबीर ने स्वयं अपना वेद रचा, जो कि वंचकों के वेद से भिन्न है और इस अपने वेद में वे लोग स्वयं भी स्थित हैं। उनकी पीडाएं, आकांक्षाएं, आह्लाद-विषाद भी इसमें समाहित हैं।
इसी भांति नारी-निंदक मानी जाने वाली साखियोंको विद्वानों ने ठीक से अब तक समझने का प्रयास नहीं किया। जो कुछ पूर्व विद्वानों ने मान लिया, उसी को बडे-बडे विश्वविद्यालयों के स्व-नामधन्य विभागाध्यक्ष तक दोहराते जा रहे हैं। कबीर ग्रंथावली में कामी नर को अंग के अंतर्गत संकलित हैं उक्त साखियां,जो स्पष्ट ही कामी नर को संबोधित हैं, नारी को नहीं। पुरुष सत्तात्मकसमाज के मूल्य-पक्षधर नारी संबंधी कबीर के विचारों को अनदेखा क्यों कर रहे हैं? यही नहीं, वे तो कंचन एवं कामिनी के प्रति कहे गए कबीर के शब्दों को सारी नारी जाति पर आरोपित कर रहे हैं।
कामिनी नारी यदि लपटों-भरी आग है, तो कामी नर को उससे बचने की हिदायत कबीर दे रहे हैं, नहीं तो-अन्यत्र साखियोंमें कबीर वीर व सती नारी के प्रति खुले कंठ से पक्षधरता व्यक्त करते हैं। वे इस बात पर भी व्यंग्य करते हैं कि जहां समाज सती नारी को पूरी देह ढकने के लिए उपयुक्त वस्त्र प्रदान नहीं करता, वहीं वेश्या खासा पहनती है। ऐसे में यह प्रमाणित
हो जाता है कि सती, साधु, सत्य और ज्ञान के पक्षधर संत कबीर ने ज्ञान को परमात्मा के रूप में स्थापित किया है।
डॉ. बलदेव वंशी