Tuesday, May 21, 2013

30 सेकेंड में होगा मोबाइल चार्ज'

Courtesy- बीबीसी हिन्दी 
 अमरीका में रहने वाली भारतीय छात्रा ईशा खरे ने छोटे से आकार का एक ऐसा उपकरण बनाया है जो  मोबाइल फोन की बैटरी के अंदर फिट हो सकता है.
ईशा का दावा है कि इससे मोबाइल फोन 20-30 सेकेंड में पूरा चार्ज हो जाएगा और इसे कार की  बैटरी के लिए भी उपयोग में लाया जा सकेगा.
इसके लिए 18 वर्षीय ईशा खरे को 'इंटेल फाउंडेशन यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड' से नवाज़ा गया है और 50,000 डॉलर की स्कॉलरशिप भी दी गई है.
दुनिया की जानी-मानी कम्प्यूटर उपकरण बनाने वाली कंपनी, ‘इन्टेल’, हर साल विश्व के अलग-अलग स्कूलों से क़रीब 70 लाख बच्चों की प्रतियोगिता आयोजित करवाता है.
इनाम की घोषणा के बाद ईशा ने पत्रकारों से कहा, “मैंने तो इस उपकरण पर काम करना इसलिए शुरू किया क्योंकि मेरे मोबाइल फोन की बैटरी बहुत जल्दी ख़त्म हो जाती थी, लेकिन अब इस जीत पर यकीन करना भी मुश्किल हो रहा है.”
विजेताओं को अरिज़ोना के फीनिक्स शहर में एक कार्यक्रम में सम्मानित किया गया.

अब हारवर्ड की ओर

इन्टेल की प्रतियोगिता में बच्चे विज्ञान, तकनीक और गणित की दुनिया में शोध कर नए उपकरण इजाद करते हैं.
इस साल के प्रतियोगियों ने क्वांटम थ्योरी और पर्यावरण संरक्षण के तरीकों से लेकर बीमारियों के इलाज और तकनीकी उपकरण बनाने तक के प्रोजेक्ट्स पेश किए.
अपने प्रयोग में ईशा ने इस उपकरण से एक ‘एलईडी’ यानि ‘लाइट एमिटिंग डायोड’ चलाकर दिखाया. ईशा ने बताया कि उन्होंने नैनोटेकनॉलॉजी की मदद से बहुत सारी ऊर्जा अपने इस उपकरण में केन्द्रित करने की तकनीक विकसित की है जिससे चार्जिंग जैसा काम भी सेकेंड्स में हो सकता है.
फिलहाल कैलिफोर्निया के एक स्कूल में पढ़ रहीं ईशा इसी वर्ष हारवर्ड विश्वविद्यालय में नैनोकेमिस्ट्री की पढ़ाई करने जाएंगी.
लाखों छात्रों में से छांटे गए 1600 छात्रों में से चुने जाते हैं तीन विजेता जो 75,000 (पहला इनाम) और 50-50,000 डॉलर (दूसरा और तीसरा इनाम) में ले जाते हैं.
ईशा को दूसरा इनाम मिला तो पहला इनाम गया रोमानिया के 19 वर्षीय आयोनेट बुडिस्टीनो को, जिन्होंने एक सस्ती स्वचालित कार का मॉडल बनाया.

Friday, May 17, 2013

जैसे भक्त को भगवान मिल गए हों


मित्रों,  पिछले सोमवार को मैंने हुगली नदी में आए ज्वार को देखा। ज्वार उन्हीं नदियों में आता है जो  समुद्र के करीब हो और लगभग जु़ड़ी हुई हो।   हुगली समुद्र से जुड़ी हुई है। इसे ही उत्तर भारत में गंगा नदी कहते हैं। हुगली के किनारे लोग पूजा- पाठ, मुंडन और कथा आदि के अलावा पितरों को तर्पण आदि करते हैं। मैं  कोलकाता के पास बैरकपुर के धोबी घाट पर इंजन वाली नाव का इंतजार कर रहा था ताकि मैं उस पार श्रीरामपुर में अपने परमगुरु स्वामी श्री युक्तेश्वर जी (मेरे गुरु  परमहंस  योगानंद जी के गुरु) द्वारा स्थापित आश्रम में प्रणाम करने जा सकूं। आप जानते ही हैं कि परमहंस योगानंद जी की पुस्तक- आटोबायोग्राफी आफ अ योगी- विश्व की ३३ भाषाओं में अनूदित है और आज भी सर्वाधिक रोचक पुस्तकों में से एक है। हिंदी में इसका अनुवाद- योगी कथामृत- के नाम से हुआ है।
 जब मैं बैरकपुर के धोबीघाट पहुंचा तो मुझे बताया गया कि ज्वार आ रहा है, इसलिए इंजन वाली नाव का आना- जाना फिलहाल बंद कर दिया गया है। मुझे भी ज्वार देखने की उत्सुकता थी। लगभग २० मिनट बाद ज्वार आया। जीवन में पहली बार मैंने किसी नदी में ज्वार देखा। वैसे रामकृष्ण परमहंस पर लिखी उनके शिष्य श्री म की पुस्तक रामकृष्ण वचनामृत में बान (बांग्ला में ज्वार को बान कहते हैं) का जिक्र है। इसका हिंदी में अनुवाद किया है- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने।
तो ज्वार आया। भारी लहरों के साथ। लहरें छपाक से किनारे से टकरातीं। मानों नदी
के किनारे को मथ दिया। जैसे भक्त का मन भगवान के लिए मथ जाता है। जिसे गुरुदेव परमहंस योगानंद ने- चर्निंग द इथर कहा है। करीब पांच- सात मिनट के बाद ही ज्वार शांत हो गया। इंजन वाली नाव किनारे आ कर खड़ी हो गई। हम लोग पांच- सात मिनट में ही उस पार पहुंच गए और उस पवित्र स्थल और परमगुरुओं को प्रणाम किया जिसका वर्णन- आटोबायोग्राफी आफ अ योगी में भी है। लौटे तो हुगली नदी शांत थी। जैसे भक्त को भगवान मिल गए हों। वह पूर्ण तृप्त हो गया हो।

Friday, May 3, 2013

ईश्वर सर्वत्र व्याप्त हैं


मित्रों, हमारे जीवन में यूं तो अक्सर कोई न कोई घटना होती रहती है। अच्छी  भी और सामान्य भी। एक दिन असाधारण ढंग से भयानक बिजली कड़की। लगा कहीं बिजली गिरी। और मेरा कंप्यूटर इंटरनेट से डिसकनेक्ट हो गया। मैंने तकनीशियन को बुलाया। उसने बताया कि मेरा लैन कार्ड जल गया है। चूंकि कंप्यूटर एक आदत में शामिल हो गया है, इसलिए मैं लैन कार्ड तुरंत खरीद लाया और उसे लगाया। इंटरनेट फिर से कनेक्ट हो गया। जब मैं लैन कार्ड खरीद रहा था तो दुकानदार ने बताया कि जब भी बिजली कड़के तो आप इंटरनेट का तार सीपीयू से निकाल दिया कीजिए। मैंने पूछा कि क्या बिजली का प्लग निकाल देने से काम नहीं चलेगा? उसने कहा- नहीं सर। आसमान में कड़कती बिजली, तब भी आपके सीपीयू में घुस जाएगी और आपका मदर बोर्ड तक जला डालेगी। इसलिए आप इंटरनेट का ही प्लग निकाल दीजिए। झंझट खत्म हो जाएगा। मैं सोचने लगा कि क्या गजब है। आसमान में चमकती बिजली से हम किस तरह करीब से जुड़े हैं। उधर बिजली चमकी नहीं कि इंटरनेट से हमारा कनेक्शन खत्म। क्योंकि बिजली हमारे सीपीयू में घुस गई। ऋषियों ने कहा ही है-   यत पिंडे, तत ब्रह्मांडे।।  ईश्वर आखिर सर्वत्र व्याप्त हैं। वही कंप्यूटर हैं और वही हमारा दिमाग भी हैं। वही इस ब्रह्मांड के रचयिता भी हैं और वही हमारी आत्मा भी हैं।     

Monday, April 22, 2013

योगी कथामृत

परमहंस योगानंद जी की पुस्तक - आटोबायोग्राफी आफ अ योगी (हिंदी में अनूदित पुस्तक का नाम- योगी कथामृत ) सचमुच एक अद्भुत पुस्तक है। अपनी आत्मकथा के बहाने परमहंस जी ने विश्व के विशिष्ट साधु संतों के बारे में विस्तार से लिखा है। यह पुस्तक पढ़ते हुए आप उसमें इस तरह खो जाएंगे कि खाने- पीने और सोने की सुधि भी नहीं रहेगी। इसी पुस्तक में क्रिया योग के बारे में बताया गया है। जो लोग क्रिया योग के बारे में जानना चाहते हैं, उन्हें योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया का लेसन मेंबर बनना होता है। योगी कथामृत में परमहंस योगानंद ने इसके बारे में जितना बताया जा सकता है, बताया है। योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया की स्थापना स्वयं परमहंस योगानंद जी ने सन १९१७ में की थी। तब से इस आध्यात्मिक संगठन ने लाखों लोगों को क्रिया दीक्षा दी है। क्रिया योग के बारे में विस्तार से नहीं लिखा जा सकता न ही बताया जा सकता है। इसे दीक्षा के माध्यम से प्राप्त किया जाता है और गोपनीयता की शपथ दिलाई जाती है क्योंकि  प्राचीन काल से ही यह धार्मिक  निषेध चला आ रहा है जिसका पालन आवश्यक है। क्यों? इसका जवाब आपको तभी मिल जाएगा, जब आप दीक्षा लेंगे।

Friday, April 12, 2013

हम विकास कर रहे हैं या हमारे दिल छोटे हो रहे हैं?


 विनय बिहारी सिंह

 क्या रेलवे स्टेशन पर मर रहे किसी आदमी को बचाने वाला कोई नहीं है। हम किस समाज में रहते हैं? किस व्यवस्था के अंग हैं? यह कैसा लोकतंत्र है? कैसी संवेदनहीनता है? क्या इक्कीसवीं शताब्दी का यही प्राप्य है? ये कई सवाल मेरे जेहन में तब उभरे जब मैं एक आदमी को मरते हुए देख कर आया। हम विकास कर रहे हैं या हमारा विनाश हो रहा है? वहां रेलवे सुरक्षा बल के दो जवान खड़े थे। वे चुपचाप उस आदमी को मरते देख रहे थे। निर्विकार भाव से। रेल का भाड़ा बढ़ गया है। लेकिन सुविधाओं में क्या फर्क पड़ा? कहां हैं टेलीविजन पर बहस करने वाले देश की चिंता में कथित रूप से मरे जा रहे राजनीतिक नेता?

मैं १२ अप्रैल को दिन के एक बजे एक रिश्तेदार को कोलकाता स्थित सियालदह स्टेशन तक पहुंचाने गया था। जब उनकी ट्रेन १.२५ बजे रवाना हो गई तो मैं घर लौटने लगा। तभी देखा कि एक आदमी वही ट्रेन (सियालदह- बलिया एक्सप्रेस) पकड़ने आया था और अचानक उसकी तबियत खराब हो गई थी। वह बेहोश हो कर गिर पड़ा था। उसका कंबल, अन्य सामान वहीं पड़ा हुआ था। मुंह खुला था। किसी को ट्रेन पर चढ़ाने आए एक व्यक्ति ने अपने बोतल से मर रहे व्यक्ति के मुंह में पानी डाला। पानी अंदर चला गया लेकिन वह बेहोश ही रहा। उसकी आंखें अधखुली थीं। किसी ने एक व्यक्ति को भेजा- जाओ, स्टेशन मास्टर को यह खबर दे दो। वह आदमी स्टेशन मास्टर के पास गया। वहां से कोई नहीं आया। पास ही खड़े रेलवे सुरक्षा बल के दो जवान सिर्फ लोगों से कह रहे थे- गर्मी के कारण इस आदमी का यह हाल हुआ है। मर रहा आदमी मुंह को और ज्यादा खोल कर सांस लेना चाहता था लेकिन सांस नहीं ले पा रहा था। पता नहीं उसे क्या तकलीफ थी। पास ही नीलरतन मेडिकल कालेज व अस्पताल है, जो सरकारी है। स्टेशन से वहां ले जाने में मुश्किल से दस मिनट लगता। लेकिन किसी ने कोई पहल नहीं की। रेलवे स्टेशन पर मर रहे किसी व्यक्ति को बचाने के लिए रेलवे के पास कोई इंतजाम नहीं है। कोई रुचि नहीं है। कोई मर रहा है तो मरे। यह है हमारी व्यवस्था। हमारा तंत्र। इसे विकासशील देश कहते हैं। हमारे देश में अरबपतियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विकास का खूब ढिंढोरा पीटा जाता है। लेकिन आम आदमी जानवर की तरह सबके सामने मर जाता है। उसे कोई नहीं पूछता।


Friday, March 15, 2013

एक बहुत बढ़िया कथन


मैंने एक बहुत अच्छा कथन पढ़ा। किसी महापुरुष ने कहा है(नाम नहीं दिया गया है)कि यदि कोई ईश्वर पर विश्वास करता है उससे ईश्वर के बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। और जो ईश्वर पर विश्वास नहीं करता, उससे भी आपको कुछ कहने की जरूरत नहीं है क्योंकि आप उसे लाख समझाएंगे कि ईश्वर है, हम ईश्वर की ही संतानें हैं तो वह नहीं मानेगा। अपना तर्क देता रहेगा। इसलिए जो ईश्वर में विश्वास करता है, उससे और जो विश्वास नहीं करता, उससे कोई तर्क करना ही नहीं चाहिए।

उसे कुछ समझाना ही नहीं चाहिए।

Monday, March 11, 2013

क्यों कम हो चले हैं परहित की सोचने वाले?



मित्रों, आज कोलकाता के धर्मतल्ला इलाके में डेकर्स लेन स्थित एक प्रसिद्ध चाय की दुकान पर गया। वहां चाय पी तो पाया कि कप छोटे साइज के हो गए हैं। चाय का जायका भी थोड़ा मद्धिम हो गया है। यानी महंगाई खाने- पीने की चीजों का स्तर लगातार गिरा रही है। आप कहेंगे,यह कोई नई बात नहीं है। हां। लेकिन इस पर गौर करना जरूरी है। यह कोई निराशावाद नहीं है। स्थिति का मूल्यांकन है। जो स्वादिष्ट और बड़े साइज की मिठाइयां हम अपेक्षाकृत कम कीमत पर खा चुके हैं,वे आज दुर्लभ लग रही हैं। हर जगह स्तर में गिरावट आई है। तो हम विकास कर रहे हैं या पीछे जा रहे हैं? भारत समेत सारी दुनिया में तो अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन साथ ही अपराध और धोखाधड़ी, भरोसे पर चोट भी बढ़ रही है। परहित या परसेवा करने वाले लोग और संस्थाएं तो हैं लेकिन आज कितने लोग आम आदमी के लिए तालाब खुदवाते हैं, स्कूल या कालेज खुलवाते हैं। स्कूल, कालेज और यहां तक कि विश्वविद्यालय भी प्राइवेट खुलने लगे हैं। अस्पताल तो अब प्राइवेट ही खुल रहे हैं। आम आदमी के हित की बात सोचने वाले कहां गए? हां, कुछ साधु- संत और उनकी संस्थाएं आज भी आम आदमी के लिए ईमानदारी से लगातार काम कर रही हैं। ऐसी संस्थाओं में एक है योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया? और भी संस्थाएं हैं। भारत सेवाश्रम संघ और रामकृष्ण मिशन भी है। और भी संस्थाएं हैं। लेकिन योगदा सत्संग (संस्थापक- परमहंस योगानंद) ने क्रिया योग इच्छुक साधकों को दे कर जो जनकल्याण कर रहा है, वह प्रणम्य है। यह संस्था जन सेवा भी लगातार कर रही है। 

मैं निराश नहीं हूं। सेवा करने वाले साधु और संस्थाएं ही युवा पीढ़ी में प्रेरणा भरने के लिए काफी है। काश राजनीतिक पार्टियों में भी देश के आम आदमी को खुशहाल करने की धुन सवार हो पाती।  युवा पीढ़ी में सुगबुगाहट है। आज की युवा पीढ़ी ही तस्वीर बदलेगी। क्या पता कल को कुछ चमत्कार हो और राजनीतिक पार्टियां-    परहित सरिस धर्म नहिं भाई    का मर्म समझने लगें।