Monday, June 6, 2011

भगवान कृष्ण जब गोप और उनकी गाएं बन गए

विनय बिहारी सिंह




भगवान कृष्ण की कथा इतनी बहुआयामी है कि उसे जितनी बार सुनें, नए- नए अर्थ समझ में आते हैं। उनमें प्रतीक बहुत हैं। उपमाएं बहुत हैं। यह इसलिए ताकि पढ़े लिखे लोग तो समझें ही, अनपढ़ भी कथा सुन कर उसका गूढ़ार्थ समझ ले। श्रीमदभागवत में एक कथा है कि एक बार ब्रह्मा जी को शक हो गया कि वृंदावन के कृष्ण भगवान के अवतार हैं। देखिए, भ्रम हो ही गया ब्रह्मा जी को। क्यों? क्योंकि ब्रह्मा जी का उत्पत्ति स्थान तो विष्णु भगवान की नाभि है। यानी ब्रह्मा जी विष्णु भगवान की नाभि से पैदा हुए हैं। और कृष्ण भगवान, विष्णु के ही अवतार हैं। जिसने उन्हें पैदा किया है, उस सर्वशक्तिमान भगवान को कोई कैसे समझ सकता है? वे तो बस अनन्य और गहरी भक्ति से ही एक हद तक समझे जा सकते हैं। पूरा तो उन्हें कोई नहीं समझ सकता। हां, उनके भक्त उनके एक अंश को समझ पाते हैं। तो ब्रह्मा जी को शक हो गया। उन्होंने अपनी माया से सारे गोपों और उनकी गायों और बछड़ों को अपहृत कर लिया और उन्हें अपने ब्रह्म लोक लेकर चले गए। वहां उन्हें योग निद्रा में सुला दिया। इधर भगवान को पता चल गया कि ब्रह्मा जी ने उनके साथ क्या किया है। भगवान तो अंतर्यामी हैं। शाम हुई तो भगवान ने सोचा कि इन गोपों की माताएं तो उन्हीं से पूछेंगी कि कहां गए उनके बेटे और गाय बछड़े इत्यादि। तब भगवान कृष्ण ने स्वयं ही गोपों, गायों और बछड़ों का रूप धर लिया। कैसे? यहीं पर रहस्य छुपा है। भगवान ही तो सब हुए हैं। स्वयं भगवान, गोप और गोपिकाएं। गाय औऱ बछड़े। सारे सजीव और निर्जीव तत्व। पेड़, पौधे, आसमान, जमीन, पहाड़, समुद्र.......... सब कुछ तो भगवान ने ही बनाया है। वही तो सारी सृष्टि में हैं। यह रहस्य साधुओं के मुंह से सुन कर बड़ा अच्छा लगता है। सर्वं खल्विदं ब्रह्म। सब ब्रह्म ही है। कुछ दिनों बाद ब्रह्मा जी जब वृंदावन में कृष्ण का हाल चाल लेने आए तो उन्होंने पाया कि जिन गोपों और गायों आदि का उन्होंने अपहरण किया है, वे तो यहां दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने एक क्षण में अपने लोक में उन्हें देखा। वे वहां सो रहे थे। यहां पृथ्वी पर देखा तो खेल रहे हैं। गाएं चर रही हैं। बछड़े उछल कूद कर रहे हैं। तब ब्रह्मा जी की आंखें खुलीं। तब उन्हें लगा कि वृंदावन के कृष्ण सचमुच भगवान के अवतार ही हैं।

1 comment:

वन्दना said...

बिल्कुल सच कहा।