Monday, June 13, 2011

एक संत के अनुभव

विनय बिहारी सिंह




घटना उस समय की है जब मैं कक्षा ९ की परीक्षा दे कर छुट्टियां मना रहा था। मैं अपने पिता जी के कमरे में रहता था। उस कमरे में एक बिना दरवाजे की आलमारी थी। उस आलमारी के ऊपरी तख्ते पर अनेक धार्मिक पुस्तकें हुआ करती थीं। छुट्टियों में कुछ पढ़ने को था नहीं और उस समय रेडियो के अलावा मनोरंजन का कोई साधन नहीं था। रेडियो भी आप हरदम नहीं सुन सकते। इसलिए मेरी उत्सुकता उन धार्मिक किताबों में बढ़ने लगी। उस किताब का नाम मैं भूल चुका हूं। लेकिन इतना याद है कि उसमें कुछ महत्वपूर्ण संतों के विशेष अनुभव दिए गए थे। इस पुस्तक का उद्दे्श्य था कि लोग ध्यान, जप आदि करने में हतोत्साहित न हों। अनेक लोग कुछ दिन ईश्वर की भक्ति करते हैं और जब कोई चमत्कार नहीं होता तो सारी भक्ति खत्म हो जाती है। उस पुस्तक में बताया गया था कि चमत्कारों की उम्मीद न करें। चुपचाप धैर्य के साथ ईश्वर के प्रति भक्ति और प्रेम को बढ़ाते रहें। उसमें एक संत का अनुभव दिया गया था। वे रात को सोते नहीं थे। पूरी रात ध्यान और जप किया करते थे। जब लोग सुबह जागते थे तो वे नित्य क्रिया से निवृत्त हो कर, स्नान, पूजा आदि करते थे। फिर हल्का सा नाश्ता कर सो जाते थे सो जाते थे। शाम को वे उठते थे और फिर सूर्यास्त के पहले- पहले दो या तीन रोटी खा लेते थे। बस। फिर पूरी रात ध्यान, जप। यही उनका क्रम था। एक दिन उनके पास उनका कोई प्रशंसक आया। रात को वहीं ठहरा। साधु रात को तो सोते नहीं थे। उन्होंने रात दस बजे से अपनी साधना शुरू की। रात के एक बजे होंगे कि उस कमरे में अचानक आंखों को चौंधियाने वाला प्रकाश उत्पन्न हुआ। साधु उस प्रकाश का आनंद उठा रहे थे। अचानक उनका प्रशंसक उठा और बोल पड़ा- बाबा, यह प्रकाश क्या है? उसका यह कहना था कि प्रकाश गायब हो गया। साधु को बड़ा दुख हुआ। उस समय उन्होंने अपने प्रशंसक को बस इतना ही कहा- कुछ नहीं , कुछ नहीं, तुम सो जाओ। वह सो गया। सुबह उसके उठने पर साधु ने कहा- भाई। मेरी साधना के दौरान तुम अगर कुछ असाधारण चीजें देखो तो बोलो मत। चुपचाप पड़े रहो। ये दर्शन दुर्लभ होते हैं। तुम्हारे बोल पड़ने से आनंद भंग हो जाएगा।
यह प्रसंग मेरे मानस पटल पर इस तरह अंकित हो गया है कि कभी भूलता ही नहीं। बार- बार चाहता हूं कि वह पुस्तक मिले। लेकिन न वह कमरा है और न वे किताबें। बस स्मृति का ही सहारा है। ऐसी पुस्तक मिलना, ईश्वर की कृपा ही है। लेकिन ऐसा अनुभव जिसे मिलता है वह परम भाग्यशाली है।

1 comment:

वन्दना said...

आपने सही कहा ऐसे अनुभव होना आसान नही होता और ऐसी पुस्तकें मिलना भी उतना ही दुर्लभ है।