Friday, June 3, 2011

इस्कान के युवा सन्यासी से मुलाकात


विनय बिहारी सिंह




आज मेट्रो ट्रेन (भूगर्भ रेल) में इस्कान के एक युवा सन्यासी से मुलाकात हुई। मैं सीट पर बैठा था। इस युवा सन्यासी को देखा तो उन्हें अपनी सीट देनी चाही। लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। मैं अपनी सीट से खड़ा हो गया और उनसे बैठने का आग्रह किया। उन्होंने फिर शालीनता के साथ इंकार कर दिया और खड़े ही रहे। आमतौर पर ऐसा होता नहीं है। वे विदेशी थे। एकदम से गौरांग।अभी युवा अवस्था में उन्होंने प्रवेश ही किया था। अपने स्टेशन पर उतरने के पहले मैंने उनसे अंग्रेजी में पूछा- क्या इस्कान के सन्यासी हैं? वे बोले- हां। मायापुर में रहता हूं। मायापुर पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में है। वहां इस्कान का बहुत ही भव्य मंदिर है। मंदिर की भव्यता के कारण ही वह पर्यटन स्थलों में से एक है। मैंने पूछा- आपका नाम क्या है? वे बोले- केशव। मेरे दिमाग में तुरंत आया- भगवान कृष्ण का नाम। मैंने पूछा- आप पूरे दिन भगवान कृष्ण का नाम जप और कीर्तन और सेवा करते हैं? वे बोले- कोशिश करता हूं। मैंने पूछा- आप कितनी देर ध्यान करते हैं? उनका जवाब था- कोशिश तो करता हूं कि पूरे दिन ध्यान हो। कोशिश करता हूं कि ध्यान करते वक्त तो ईश्वर में लय हो ही, काम करते हुए भी ईश्वर की उपस्थिति का अहसास हो। वे यह नहीं कहते थे कि करता हूं। वे कहते थे- कोशिश करता हूं। उन्होंने सफेद धोती पहन रखी थी। कंधे पर एक छोटा सा बैग था। शरीर का ऊपरी भाग लगभग नंगा था। एक गमछानुमा सफेद वस्त्र भर था कंधे पर। पैर में खड़ाऊं था। खड़ाऊं पहन कर चलना आसान नहीं है। इसके लिए अभ्यास जरूरी है। उन्हें अभ्यास हो गया था। क्योंकि वे खड़ाऊं पहन कर तेजी से चल रहे थे। पैर की उंगलियां खड़ाऊं पर पकड़ बनाने के लिए सिकुड़ी हुई थीं। उनसे जितनी भी बातचीत हुई उससे जाहिर था कि वे अत्यंत शालीन व्यक्ति हैं और मुझसे बातचीत कर उन्हें अच्छा लग रहा है। मैंने उन्हें बताया- हम सब साधु- संतों का आदर करते हैं। इसलिए मैं आपको अपनी सीट दे रहा था। साधु इसलिए आदरणीय हैं कि वे लोकहित में अपना सारा जीवन ईश्वर को समर्पित कर देते हैं। वे मुस्कराए और सहमति में सिर हिलाया। फिर संकेत दिया कि वे सुविधाओं के उपभोग के लिए साधु नहीं बने हैं। बीस मिनट में वे अपने स्टेशन पहुंच जाएंगे। इतनी देर के लिए सीट का लोभ क्यों? मुझे लगा- मेट्रो ट्रेन में दस मिनट की यात्रा के लिए भी सीट को लेकर झगड़े होते हैं। और यह साधु शांत होकर खड़े हैं। सीट की उपेक्षा करते हुए। साधु अपने व्यवहार से ही सबको सिखाते हैं।

4 comments:

वन्दना said...

यही तो साधु की पहचान होती है हर हाल मे खुश रहते हैं।

Dr Satyajit Sahu said...

satsang on travel.........

Sunil Deepak said...

अच्छा सोचने और करने वाला मिले तो हमें भी कुछ बेहतर बनने की प्रेरणा मिलती है!

Kajal Kumar said...

सुंदर संस्मरण.