Wednesday, June 23, 2010

संगीत में डूबा एक इंजीनियर

विनय बिहारी सिंह


हमारे संस्थान में एक आईटी इंजीनियर हैं प्रियव्रत मजूमदार। वे रवींद्र संगीत के गहरे प्रेमी हैं। वाद्य यंत्रों में सिंथेसाइजर और हारमोनियम पर खुद को साध चुके हैं। हर रोज दो घंटे शास्त्रीय संगीत का रियाज करते हैं। एक दिन उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर के लिखे भक्ति गीत की दो पंक्तिंयां सुनाईं तो मुझे सुख मिला।
ये पंक्तियां हैं- चिर सखा हे, छेड़ो ना मोरे। संसार गहने, निर्भय, निर्भर निर्जन स्वजने.....
यह ईश्वर से प्रार्थना है कि वे अकेले न छोड़ें। यह संसार भरोसे लायक नहीं है। प्रियव्रत के स्वर में जो दर्द था, जो आकुलता थी, वह दिल को छूने वाली थी। वे ईश्वर के गहरे भक्त नहीं हैं। लेकिन रवींद्रनाथ टैगोर के ब्रह्म संगीत के भक्त जरूर हैं। मैंने पूछा- आपके गुरु कौन हैं? उन्होंने कहा- श्रीमती स्वागतलक्ष्मी दासगुप्ता।
मैंने पूछा- कंप्यूटर के हार्डवेयर और साफ्टवेयर में रमें रहने वाला आदमी संगीत को इतना समय कैसे दे पाता है? वे हंसे और कहा- मुझे बचपन से इसका शौक है। आठ साल का था तो मेरे शौक को देखते हुए घर वालों ने मुझे संगीत के स्कूल में दाखिल करा दिया। इस शौक के लिए समय कैसे निकालते हैं? प्रियव्रत ने कहा- समय? जो चीज आपके दिल में बसी हो उसके लिए समय निकालना नहीं है, वह हर समय आपके ऊपर हावी रहती है। संगीत और मैं एक हैं। कंप्यूटर भी मैं संगीत की लय में ही देखता हूं। साफ्टवेयर भी। संगीत मेरे जीवन का केंद्र है। मुझे इस इंजीनियर से बातें कर अच्छा लगा। मैंने कहा- ईश्वर भक्तों के लिए भी तो यही बात लागू होती है। वे बोले- बिल्कुल। अगर आप ईश्वर भक्ति में रमे हैं तो उसके अलावा आपको कुछ दिखाई नहीं देना चाहिए। आप तो उसी में मस्त रहेंगे। और कुछ दिखाई ही नहीं देगा। देखिए दो चीज होती ही नहीं। एक ही चीज है। वह एक चीज पकड़िए, काम बन जाएगा।
ईश्वर से प्रेम है तो फिर अन्य कोई चीज कैसे दिखाई देगी? प्रियव्रत संगीत में ही जीते हैं, संगीत में ही सांस लेते हैं। वे अपना काम करते हुए अत्यंत धीरे- धीरे गुनगुनाते रहते हैं। एक लय उनके भीतर चलती रहती है। कुछ लोग कहते हैं कि कंप्यूटर के कुछ काम अत्यंत उबाऊ हैं, लेकिन प्रियव्रत को इससे फर्क नहीं पड़ता। भीतर तो संगीत की अजस्र धारा बह रही है, क्या बोर होना है। भीतर मीठा स्रोत बह रहा है। बाहर कोई भी काम हो आसान हो जाता है। ठीक उसी तरह जैसे भीतर ईश्वर की धारा बह रही हो और आप संसार का काम उसी चेतना में किए जा रहे हैं। आपके ऊपर क्या फर्क पड़ेगा?
बस अपनी चेतना ईश्वर से जोड़ दीजिए। कनेक्ट कर दीजिए। ईश्वर ही तो सारी शक्तियों के स्रोत हैं। एको ब्रह्म दीतीयो नास्ति।

1 comment:

Anonymous said...

nice