Monday, June 7, 2010

ताहि बोओ तुम फूल


विनय बिहारी सिंह


बचपन में मैंने छठी कक्षा में एक दोहा पढ़ा था- जा तोके कांटा बोए, ताहि बोओ तुम फूल।।
यानी जो तुम्हारे रास्ते में कांटा बिछाए उसके लिए तुम फूल बिछाओ। जो तुम्हारे लिए बुरा करे, उसके लिए तुम अच्छा करो। सामान्य तौर पर अगर हमारे लिए कोई कुछ बुरा करता है तो उसके प्रति मन में कड़वाहट रहती है। उसे देखने से ही मन खराब हो जाता है। आप कहेंगे कि जिसने यह दोहा लिखा है, उसी के लिए ऐसा करना संभव है, आम आदमी के लिए तो यह संभव नहीं है। लेकिन ठहरिए। मान लीजिए किसी ने आपके साथ दुर्व्यवहार किया। आपको उस समय बुरा लगा। लेकिन ऋषि- मुनियों ने कहा है कि क्षमा करने वाला महान व्यक्ति होता है। ईश्वर प्रेमियों को पहला पाठ पढ़ाया जाता है कि वे क्षमा करना सीखें। हां, यह कठिन काम है। लेकिन अगर आप अभ्यास करेंगे तो आपके आनंद की सीमा नहीं रहेगी। कोई घटना गांठ बांध कर नहीं रखनी चाहिए। गांठों को खोल दीजिए। फिर देखिए आप कितनी राहत महसूस करते हैं। क्षमा एक ऐसा शस्त्र है जिससे आपके चारो ओर रक्षा कवच बन जाता है। हमारे सारे शास्त्र यही शिक्षा देते हैं। अब आप कहेंगे कि जैसे को तैसा क्यों नहीं करें? लेकिन एक बार क्षमा करके देखिए। प्रयोग के तौर पर ही। किसी छोटे से अपराध को क्षमा करके देखिए। तब पता लगेगा कि सुख क्या है। हमारे दिमाग में कई तरह की गांठे हैं। उन्हें हम्हीं खोल सकते हैं। दूसरा वहां पहुंच नहीं सकता। हमें अपना उद्धार स्वयं करना है तब भगवान हमारी मदद करेंगे। पहले हमें ही अपने दिमाग का कमरा साफ कर चमकाना होगा। तब भगवान उसमें स्थायी रूप से रहने लगेंगे। ।

3 comments:

माधव said...

nice

Shekhar Kumawat said...

waqy me ne aap ki post ko dhayan purwak pada or ab man ye kahta he ki me kosis kar ke dekhata hun ki kitna sarthak ho pata hun par dimag kahta he har jagah kar pana kuch mushkil hoga magar jayada se jayada bar ye kar paunga

aap ka shukriya

Udan Tashtari said...

बहुत आभार!