Saturday, May 21, 2011

हनुमान मूर्ति लाल रंग में

विनय बिहारी सिंह



मेरे कार्यालय आने के रास्ते में एक प्रसिद्ध हनुमान मंदिर पड़ता है। मंदिर तो लाल रंग से रंगा ही गया है, पवित्र हनुमान जी की मूर्ति भी लाल रंग में है। इस पर कई जगह खोजबीन की। किसी ने कहा कि हनुमान जी का जन्म मंगल को हुआ था। चूंकि मंगल ग्रह का रंग लाल है, इसलिए हनुमान मूर्ति लाल रंग की है। किसी ने कहा- कई जगहों पर तो हनुमान जी की मूर्ति सफेद संगमरमर की है। रामचरितमानस में तुलसीदास ने हनुमान जी का रंग स्वर्ण जैसा बताया है। तुलसीदास ने हनुमान जी का रंग स्वर्ण लिखा है तो वह निश्चय ही सही होगा क्योंकि उन्हें हनुमान जी ने दर्शन दिए थे। हनुमान जी ने तुलसीदास को एक बार नहीं कई बार दर्शन दिए थे। हनुमान चालीसा का पाठ इसीलिए प्रभावकारी माना जाता है। इसे तुलसीदास ने लिखा है। तभी मुझे एक जगह एक बहुत ही मनोहारी व्याख्या सुनने को मिली। मुझे लगा कि अब और खोजबीन की जरूरत ही नहीं।
इस कथा के अनुसार एक बार मां सीता मांग में सिंदूर लगा रही थीं। वहीं हनुमान जी बैठे थे। उन्होंने सीता जी से पूछा- मां, आप सिंदूर क्यों लगाती हैं? सीता जी ने कहा- यह पति के प्रेम का प्रतीक है। भगवान राम के प्रेम का प्रतीक है। हनुमान जी का रोम- रोम पुलकित हो गया। वे खुशी से झूम उठे। उन्होंने कहा- मां, क्या आप मुझे अपने सिंदूर में से थोड़ा सा सिंदूर देंगी? हनुमान जी ने जिस चीज की मांग की वह कोई भी सुहागिन स्त्री नहीं दे सकती थी। यह बात भगवान राम को पता चली। वे हंस पड़े। उन्होंने सीता जी से कहा- कोई बात नहीं। हनुमान हमारे अनन्य भक्त हैं। भक्त हमेशा सर्वोपरि होता है। उसे अपने सिंदूर में से थोड़ा सा सिंदूर दे दो। मां सीता ने फिर भी आश्चर्य व्यक्त किया। भगवान राम ने कहा- तुम तो जगन्माता हो। तुम्हारा बाल बांका नहीं हो सकता। तुम हनुमान को सिंदूर दे दो। मां सीता ने हनुमान जी कोसिंदूर दे दिया। हनुमान जी ने ढेर सारा सिंदूर लिया और मां सीता के सिंदूर को उसमें मिला दिया। फिर अपने सारे शरीर में उस सिंदूर का लेप कर लिया। उसी रूप में वे राम और सीता के पास पहुंचे। उन्होंने कहा- जब माता सीता आपके प्रेम के प्रतीक के रूप में सिंदूर लगा सकती हैं तो हनुमान अपने पूरे शरीर में सिंदूर क्यों नहीं लगा सकता? भगवान राम जानते थे कि हनुमान क्यों सीता जी से सिंदूर मांग रहे हैं। वे हनुमान जी को देख कर मुस्करा रहे थे। वे जानते थे हनुमान जी भक्ति शब्द के पर्यायवाची हैं। जब तक ब्रह्मांड रहेगा, हनुमान जी रहेंगे।
मुझे यह कथा बहुत अच्छी लगी। इसीलिए आपको भी बता दिया।

3 comments:

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (23-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

कविता रावत said...

badiya bhaktipurn jaankari ke liye aabhar!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

शायद आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर भी हो!
सूचनार्थ