Tuesday, May 17, 2011

राजा जनक और उनके गुरु ऋषि अष्टावक्र के बीच का संवाद

विनय बिहारी सिंह


अष्टावक्र गीता राजा जनक और उनके गुरु ऋषि अष्टावक्र के बीच का संवाद है। ठीक जैसे भगवत गीता में अर्जुन और भगवान कृष्ण का संवाद है। अष्टावक्र गीता में राजा जनक अपने गुरु से पूछते हैं कि मुक्ति कैसे प्राप्त होती है। इसके उत्तर में गुरु कहते हैं- पुत्र, अगर तुम मुक्ति चाहते हो तो इंद्रियों में आसक्ति को जहर समझो और सहनशील बनो। ईमानदारी, मुक्ति की प्रबल चाह, दृढ़ता, सच्चाई आवश्यक है। तुम अग्रि, पृथ्वी, वायु, जल और आकाश नहीं हो। मुक्ति के लिए यह जानकारी आवश्यक है कि तुम शुद्ध आत्मा हो। सद् चित्त आनंद। इस सृष्टि का साक्षी।
यदि तुम इस चेतना में रहोगे। यानी शरीर की चेतना से अलग तब जाकर तुम प्रसन्न, शांत और सारे बंधनों से मुक्त होते जाओगे। तुम ब्राह्मण या कोई अन्य जाति नहीं हो। तुम वह भी नहीं हो जिसे आंखें देखती हैं। तुम आसक्ति रहित हो। तुम आकारविहीन हो। सिर्फ सभी वस्तुओं और घटनाओं का साक्षी। इसलिए प्रसन्नचित्त बनो। सच और झूठ, सुख और दुख केवल मन की स्थितियां हैं। इनसे तुम्हारा कोई संबंध नहीं है। तुम न तो कर्ता हो और न ही फल पाने वाले। इसलिए तुम स्वतंत्र हो। बंधन का कारण यह है कि मनुष्य स्वयं को द्रष्टा नहीं, कर्ता समझने लगता है। चूंकि मनुष्य को अग्यान रूपी काला सांप डंस लेता है, इसलिए उसे इस ग्यान रूपी दवा का सेवन करना चाहिए- मैं कर्ता नहीं हूं। ईश्वर ही कर्ता है। तब जाकर मुक्ति का द्वार खुल जाएगा। तुम अग्यान का जंगल ग्यान की आग से जला कर राख कर दो। तुम मुक्ति के रास्ते पर तेजी से बढ़ोगे। इससे तुम चिंता मुक्त हो जाओगे। तुम शुद्ध सच्चिदानंद हो। शुद्ध आत्मा। यदि कोई खुद को मुक्त समझेगा तो मुक्त होगा और यदि खुद को बंधन में मानेगा तो बंधा हुआ है। इसलिए मनुष्य की समझ ही महत्वपूर्ण है।
तुम पूर्ण हो, स्वतंत्र हो और तुम्हारी चेतना अनंत है। वह देह, मन या दिमाग तक सीमित नहीं है। जब यह ग्यान हो जाएगा कि ईश्वर ही कर्ता है। मनुष्य अपने कर्मों की कठपुतली भर है। जब वह ईश्वर से जुड़ जाएगा तो उसके बुरे कर्म जल कर राख हो जाएंगे। वह मुक्त हो जाएगा और ईश्वरानंद में डूबा रहेगा। लेकिन इसके लिए कामनाओं का त्याग और ईश्वर में पू्र्ण विश्वास जरूरी है। इसके बाद ध्यान, धारणा और समाधि के प्रयास। इस तरह मनुष्य मुक्त हो जाएगा। निश्चल हो कर ध्यान में बैठो। मन को ईश्वर को सौंप दो। तब न कुछ सोचना है और न कुछ करना। सिर्फ अपनी चेतना को ईश्वर में डुबा देना है।

2 comments:

वन्दना said...

अति उत्तम व्याख्या…………आभार्।

Arunesh c dave said...

वाह अष्टावक्र नाम से ब्लाम मै लिखता हूं और जनकारी आपको मुझसे ज्यादा है चलिये आप का लेख पढ़ पढ़ मै भी पंडित हो जाउंगा