Thursday, August 13, 2009

कई बार शत्रु हो जाता है हमारा मन

विनय बिहारी सिंह


अचानक आपका मन करता है कि नशा करें और यह किसकी करामात है? हमारे मन की। तो मन कई बार हमारा शत्रु हो जाता है। कोई अच्छा पकवान है और हम रोज से ज्यादा खा लेते हैं। यह किसकी करामात है? हमारे मन की। तो मन हमेशा हमारे भले के लिए काम नहीं करता। इसीलिए संतों ने कहा है कि संयम बरतना चाहिए। मन जो कहे, जिधर ललचाए, उसे अपने विवेक के तराजू पर पहले तौल लेना चाहिए। आपको सुगर की बीमारी है और आपके चारो ओर बैठे लोग मिठाई खा रहे हैं। अगर आप मन के कमजोर हैं तो तुरंत आपका मन कहेगा- खा लो यार एक मिठाई। इससे सुगर थोड़े ही बढ़ जाएगा। ऐसा मौका तो कभी कभी ही आता है। और आपने मिठाई खा ली। पता चला कि आपका सुगर बढ़ गया। कई लोगों को तो बदपरहेजी के कारण इंसुलीन की सुई तक लेनी पड़ती है। यही बात फास्ट फूड वगैरह पर भी लागू होती है। तो इसका उपाय क्या है? मन पर नियंत्रण। मन जो कहे, वह करना कमजोर आदमी की निशानी है। और सोच समझ कर कोई कदम उठाना समझदार आदमी की निशानी है। अगर हम हर वह काम करने को उतावले हो जाते हैं जो मन कहता है और विवेक को पीछे धकेल कर रखते हैं तो एक दिन हमें पछताना ही पड़ेगा क्योंकि हमने जो मन की गुलामी की है, उसके परिणाम आने लगेंगे और मन फिर भी अपनी मनमानी नहीं छोड़ेगा क्योंकि वह तो बेलगाम हो जाएगा। आप उसी की सुन रहे हैं तो वह बिगड़ैल हो जाएगा। बिगड़ैल व्यक्ति या जानवर या मन कभी संतुलित जीवन की बात सोच ही नहीं सकता। नतीजा यह है कि बिगड़ैल मन वाला व्यक्ति दुख, तकलीफ और तनाव से गुजरता है। संतों ने कहा है-कुछ भी करने से पहले तनिक ठहर कर सोचिए- क्या यह काम मेरे लिए हितकर है? अगर हां तो ठीक है। अगर आपके भीतर से यह आवाज आती है- पता नहीं यह ठीक है या नहीं। करने में हर्ज क्या है? बस आपको सावधान हो जाना चाहिए। किसी भी काम में जल्दीबाजी, शीघ्रता उचित नहीं है। तब आप पूछेंगे- फिर संतों ने शुभस्य शीघ्रम क्यों कहा है? यानी शुभ काम जल्द करना चाहिए। तो इसका जवाब है- शुभ काम ही सिर्फ जल्दी करना चाहिए। जैसे- पूजा- पाठ, जप- तप, किसी असहाय की मदद इत्यादि। लेकिन यहां बात हो रही है- मनमाना काम करने की। मनमाना काम हमें खाई में धकेल देते हैं। मन तो वह घोड़ा है जिसे काबू में न किया गया तो वह बहुत कुछ चाहता है। मन की इच्छाओं का अंत ही नहीं है। तब आप पूछेंगे कि क्या हम महत्वाकांक्षाएं न पालें। जी हां, अवश्य पालिए। लेकिन यहां बात मनमानेपन की हो रही है। महत्वाकांक्षाओं की नहीं। तो हुआ न हमारा मन हमारा शत्रु। इसीलिए आप कोई नशा करते हैं तो उसे छोड़ने पर देखिए आपका मन कैसे छटपटाता है। वह नशा छोड़ना चाहेगा ही नहीं। नशा ही नहीं कोई भी बुरी लत छोड़ने पर मन छटपटाता है। ऐसे में मन की सुनिए ही मत।

3 comments:

अर्शिया अली said...

जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई.
( Treasurer-S. T. )

अर्शिया अली said...

जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई.
( Treasurer-S. T. )

vinay bihari singh said...

arshia ji जन्माष्टमी पर आपकी बधाई बहुत आनंददायक लगी। ईश्वर करें आप जीवन में दिनों दिन आगे बढ़ें और आपकी महत्वाकांक्षाएं पूरी हों।