Wednesday, August 5, 2009

असत्य को सत्य और सत्य को असत्य मानने की गलती

विनय बिहारी सिंह

हमारे प्राचीन ऋषियों ने कहा है कि यह संसार स्वप्नवत है- जगत मिथ्या, ईश्वर सत्य। तो आप पूछ सकते हैं कि अगर जगत स्वप्न की तरह है तो क्या हम किसी पत्थर के खंभे से अपना सिर टकराएं और चोट नहीं लगेगी, क्योंकि खंभा भी स्वप्न ही है। तो इसका जवाब यह है कि आपका शरीर भी स्वप्नवत ही है। चोट तो उस स्वप्न शरीर को लगेगी ही। जब सबकुछ स्वप्नवत है तो फिर आपका शरीर भी वही है। अब आइए आगे बढ़ें। हम सिनेमाहालों में फिल्में देखते हैं। वे क्या हैं? वे दरअसल हैं तो स्थिर चित्र ही। स्थिर चित्रों की सिनेमा रील को हम प्रोजेक्टर के सामने से इतनी तेजी से गुजारते हैं कि सामने पर्दे पर ये चित्र चलते, बोलते, नाचते और गीत गाते दिखते हैं। इन स्थिर चित्रों के जरिए ही पूरी कहानी फिल्मा दी जाती है। यह कैसे होता है? इन स्थिर चित्रों की रील को हमारी आंखों के सामने एक सेंकेंड के एक बटा छठवें अंश के भीतर ही तेजी से चलती है और हमारी आंख दो चित्रों के बीच के गैप को पकड़ नहीं पाती और हम इन चित्रों को तरह- तरह के क्रिया कलाप करते देखते हैं। जबकि ये रीलें डिब्बे में बंद हो कर आती हैं और जब चलती हैं तो दर्शकों को हंसाती या रुलाती हैं। तो एक मिथ्या चीज को हम सत्य मान कर चलते हैं। आइए और आगे बढ़ते हैं। हम जिस पृथ्वी पर निवास करते हैं, वह हमेशा घूम रही है। पृथ्वी सूर्य के चारो ओर तो घूमती ही है, अपनी धुरी पर भी घूम रही है। फिर भी हम यह महसूस नहीं कर पाते। क्यों? क्योंकि पृथ्वी की गति को हम पकड़ नहीं पाते। सच यह है कि पृथ्वी लगातार घूम रही है और इसीलिए दिन औऱ रात हो रही है। हम जानते हैं कि यह दिन है और यह रात। लेकिन पृथ्वी का घूमना हम पकड़ नहीं पाते। यानी जो चीज असत्य है, उसे तो हम सच मानते हैं और जो सत्य है, उसे असत्य। आप किसी से कहें कि पृथ्वी घूम रही है तो वह कह ही सकता है कि यह झूठ है। कहां पृथ्वी घूम रही है। मैं तो एक ही जगह सुबह से शाम तक बैठता हूं। मेरा मुंह तो एक ही तरफ रहता है। मेरी मेज या कुर्सी किसी और दिशा मे तो घूमती नहीं। इसे आप क्या कहेंगे?

4 comments:

AlbelaKhatri.com said...

ishwar bhi satya hai
ishwar ki ye rachnaa bhi satya hi hai.............

Udan Tashtari said...

सार्थक चिन्तन.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

उलझा दिया ना। अब कब सुलझाएँगे?

रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!

समय said...

गजब है आपका चिंतन।

जगत की सत्य चीज़ों के उदाहरणों से आप जगत को मिथ्या साबित कर रहे हैं।

अगर पृथ्वी सत्य है इसका घूर्णन सत्य है, तो फिर यह मिथ्या कैसे हुआ।
और अगर यह भी मिथ्या है, तो इसके जरिए यह कैसे साबित हो सकता है कि जगत मिथ्या है।

एक मिथ्या चीज़ से दूसरी को मिथ्या घोषित करना, यह कैसा तर्क हुआ?

जब शंकराचार्य जगत को मिथ्या घोषित कर रहे थे, एक मिथ्या भूख उन्हें मिथ्या भोजन की मिथ्या थाली तक पहुंचाने की जुर्रत कर ही देती थी। और मिथ्या अवशिष्ट को निकालने के लिए उन्हें दिशामैदान हेतु मिथ्या खेतों तक मिथ्या रूप से चलकर जाना ही पडता था।

अन्यथा ना लीजिएगा। आप भी मिथ्या हैं, मैं भी मिथ्या हूं, आप भी एक मिथ्या ब्लॉग पर मिथ्या आलेख लिख रहे हैं, मैं भी एक मिथ्या टिप्पणी लिख रहा हूं।

मेरा आवेग भी मिथ्या, आपका चिंतन और अभी पैदा हो रही नाराजगी भी मिथ्या।

खूब सार्थक चिंतन?