Friday, April 30, 2010

वे सत्तर साल से निराहार हैं

विनय बिहारी सिंह

हम सब अपनी मनपसंद चीजें खाने के प्रति कितने आग्रही होते हैं। हम लोग आज क्या खाना है, इस पर सोच विचार करते हैं और कोई स्वादिष्ट डिश तैयार हो गई तो सब कुछ भूल कर उसका स्वाद लेने लगते हैं। हममें से कई लोग कोई प्रिय चीज देख कर खाने के लिए मचल जाते हैं। कुछ लोग तो खाने के लिए ही जीते हैं। भोजन के प्रति यह आग्रह कोई अपराध नहीं है। यह तो मनुष्य का स्वभाव है। लेकिन किसी का लक्ष्य इंद्रियों पर विजय पाना भी हो सकता है। प्रह्लाद जानी ने साबित कर दिया है कि भोजन और नाश्ता या चाय- काफी और स्वादिष्ट पकवान व्यर्थ हैं। सिर्फ सांस लेकर भी मजे में रह सकते हैं वे

बयासी साल के प्रह्लाद जानी ७० साल से निराहार रह रहे हैं। उन्हें भूख- प्यास नहीं लगती। लेकिन उनका शरीर कमजोर नहीं है। वे आराम से जीवन बिता रहे हैं। रहने वाले वे अहमदाबाद (गुजरात) के हैं। पिछले छह दिनों से रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन के विशेषग्यों की एक टीम उनकी निगरानी में लगी है। डाक्टरों का एक दल भी प्रह्लाद जी के शरीर की जांच पड़ताल में लगा है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी डीआरडीओ का दल यह नुस्खा तलाशना चाहता है जिससे भूख- प्यास नहीं लगती। किस अस्पताल में प्रह्लाद जानी भर्ती हैं? स्टर्लिंग अस्पताल में। यही अस्पताल इस अध्ययन का खर्च भी दे रहा है। प्रह्लाद जानी अस्पताल की सातवीं मंजिल पर रखे गए हैं। उन पर शोध करने वाले चाहते हैं कि यह नुस्खा मिल जाए तो इसे प्राकृतिक आपदाओं के समय अपनाया जाए। यह जांच पंद्रह दिनों तक चलेगी। चौबीसो घंटे दो कैमरे प्रह्लाद जानी के कमरे में लगे रहेंगे। एक मोबाइल कैमरा बाहर- भीतर की निगरानी रखेगा। यानी प्रह्लाद जानी की हर गतिविधि पर अस्पताल नजर रखेगा। कमरे में सूरज की रोशनी को भी आने से रोक दिया गया है। कमरे से लगा बाथरूम बंद कर दिया गया है। क्योंकि प्रह्लाद जी कुछ खाते- पीते नहीं हैं तो उन्हें शौच इत्यादि की जरूरत नहीं पड़ती। खुद प्रह्लाद जी ने ही बाथरूम बंद कर देने की अपील की। कहते हैं कि प्रह्लाद जी ने सात साल की उम्र में ही घर छोड़ दिया था। इसके बाद वे माउंट आबू, विभिन्न जंगलों और नर्मदा परिक्रमा करते हुए जहां- तहां रहे। उन्हें न भूख लगती है न प्यास। इसकी वजह वे अपने तालू से निकलने वाले सत को मानते हैं।
इस संदर्भ में परमहंस योगानंद जी की आटोबायोग्राफी आफ अ योगी की याद आ रही है। उसमें एक प्रसंग है गिरिबाला का। गिरिबाला भी वर्षों से खाना- पीना छोड़ चुकी थीं। उन्होंने इसके बावजूद लंबी उम्र पाई। यह आजादी के पहले की बात है। बर्दवान के राजा ने उन्हें महीनों कमरे में बंद कर कड़ी निगरानी रखी। जांच के बाद यह बात सिद्ध हो गई कि गिरिबाला सचमुच न कुछ खाती हैं और न पीती हैं। नतीजा यह था कि उन्हें शौच इत्यादि करने की जरूरत भी महसूस नहीं होती थी। परमहंस योगानंद जी गिरिबाला से मिलने गए और उनसे लंबी बातचीत की। एक खास योग के जरिए कोई साधक अपने खाने- पीने को रोक सकता है। ऐसा तो हम सबने पढ़ा और सुना ही है। प्रह्लाद जानी का जनसत्ता के ३० अप्रैल के अंक में फोटो भी छपा है। ८२ साल के इस वयोवृद्ध की दाढ़ी- मूछें घनी हैं। आखों में चमक है।

1 comment:

परमजीत सिँह बाली said...

रोचक जानकारी है।आभार।