Thursday, July 22, 2010

वापसी की रथयात्रा

विनय बिहारी सिंह


कल यानी २१ जुलाई को भगवान कृष्ण, बलराम और उनकी बहन सुभद्रा की वापसी की रथयात्रा थी। इसे पश्चिम बंगाल में उल्टी रथयात्रा कहते हैं। पिछले १३ जुलाई को रथयात्रा थी। इसमें कृष्ण, बलराम और सुभद्रा अपनी मौसी के घर गए और वहां सात दिन रह कर वापस अपने घर कल लौटे। तेरह तारीख को तो पुरी (उड़ीसा) में लाखों लोग रथ यात्रा में शामिल होते हैं। मान्यता है कि भगवान का रथ खींचने से जन्म- मरण से मुक्ति मिल जाती है। लेकिन यह प्रतीकात्मक मान्यता है। इसका अर्थ है कि मनुष्य अगर मनुष्य अपने इंद्रिय, मन और बुद्धि से परे जाकर भगवान की शरण में जाए तो वह जन्म- मरण से छुटकारा पा लेता है। यह बात गीता में भी कही गई है। एक साधु ने बताया कि भगवान कृष्ण अपने भाई और बहन के साथ मौसी के घर सात दिन क्यों रहते हैं? मौसी का घर यानी सहस्रार चक्र। सहस्रार चक्र में बहुत देर तक रहेंगे तो दुनिया की देखभाल कौन करेगा। इसलिए भगवान सात दिन ही रह कर वापस चले आते हैं। बिना भगवान के यह दुनिया कैसे चलेगी? अगर भगवान सहस्रार चक्र में आनंद से स्थाई रूप से रहेंगे तो संसार में हम लोगों को कौन देखेगा। इसलिए सात दिन बाद वे वापस लौट आते हैं। यही है रथयात्रा का महत्व। परमहंस योगानंद ने कहा है कि जब आप ध्यान कीजिए तो ईश्वर में पूरी तरह डूब जाइए। फिर ईश्वर के अलावा आपको कुछ दिखना ही नहीं चाहिए। इसके बाद अगर आप काम करते हैं तो काम में ऐसे डूबिए कि उसमें कोई कमी न रह जाए। लेकिन जैसे ही काम से मुक्त होइए, भगवान को याद कीजिए। वह तो हर क्षण हमारे साथ है। हम्हीं उसे कुछ देर के लिए भुला देते हैं। वह हमारे हृदय के भीतर है और बाहर भी। वह तो सर्वत्र है। हम अगर उसकी शरण में नहीं जाते हैं तो फिर जीना व्यर्थ है। संसार की कोई भी वस्तु हमें सुख नहीं दे सकती। संसार का कोई भी व्यक्ति हमें आनंद नहीं दे सकता। संसार से हमें कोई आनंद मिल ही नहीं सकता क्योंकि आनंद तो भगवान में है। वह कहीं और कैसे मिल सकता है। संसार में सुख का आभास भर मिलता है। असली सुख नहीं।