Saturday, July 17, 2010

सूरदास का विरह


विनय बिहारी सिंह


आज सूरदास की फिर याद आई। उनकी रचना दिल को छूती है। आप भी पढ़ें-


प्रभु मोरे औगुन चित न धरौ ।
सम दरसी है नाम तुम्हारौ , सोई पार करौ ॥




इक लोहा पूजा मैं राखत , इक घर बधिक परौ ॥
सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ ॥




इक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ ॥
जब मिलिगे तब एक बरन ह्वै, गंगा नाम परौ ॥




तन माया जिव ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरौ॥
कै इनकौ निर्धार कीजिये, कै प्रन जात टरौ ॥


सूरदास जी ईश्वर से कहते हैं- हे मेरे प्रभु, मेरे दुर्गुणों पर ध्यान मत दीजिए। तुम्हारा नाम समदर्शी है। तुम सबको एक समान देखते हो। मुझे मुक्त करो। इस संसार रूपी अंधकार से निकालो। एक लोहा तो पूजा में रखा जाता है। घंटी के रूप में, पूजा के पात्रों के रूप में और भगवान की मूर्ति के रूप में, और एक लोहा (धारदार हथियार) वधिक या कसाई के घर में रखा जाता है जिससे वह जानवरों की हत्या कर उनका मांस बेचता है। लेकिन इन दोनों में से किसी को अगर पारस पत्थर से छुआ दिया जाए तो वह सोना बन जाता है। पारस पत्थर यह नहीं देखता कि यह वधिक या कसाई के घर का हत्या करने वाला हथियार है। ज्योंही यह हत्या करने वाला हथियार पारस पत्थर से छुआ दिया जाता है, वह सोना बन जाता है। पारस पत्थर अच्छे या बुरे लोहे का भेद नहीं जानता। वह एक जैसा व्यवहार करता है। सूरदास कहते हैं कि भगवान आप भी तो पारस पत्थर से भी बड़े हैं। आपका स्पर्श मुझे दिव्य बना देगा। मेरा स्पर्श कीजिए। मेरे पास आइए। मुझे छुइए। मेरा आलिंगन कीजिए प्रभु। वे फिर कहते हैं- एक नदी है और एक नाला है। नाला तो गंदगी और बदबू लिए रहता है। लेकिन ज्योंही वह गंगा में मिलता है, उसका नाम गंगा हो जाता है। आप भी तो पवित्र अनंत सागर हैं नाथ, मुझे ग्रहण कीजिए। इस शरीर को माया और आत्मा को ब्रह्म कहा जाता है। सूरदास की बिगड़ी है, इसे बना दीजिए हे बिगड़ी बनाने वाले मेरे प्रभु। मेरे प्राण छटपटा रहे हैं, मुझे मुक्ति दीजिए।
सूरदास का यह विरह उनके हृदय की गहराई से निकला है। इसका पाठ हमें पवित्र कर देता है।

1 comment:

वन्दना said...

सच विरह मे निकली वेदना को वो बहुत जल्दी सुनते हैं।