Wednesday, July 7, 2010

एक व्यक्ति के मुंह से सुनी बात


विनय बिहारी सिंह


पिछले दिनों एक ट्रेन यात्रा के दौरान एक अपरिचित से व्यक्ति ने रोचक घटना सुनाई। आप इस पर विश्वास करें या नहीं यह आप पर निर्भर है। मैंने उनकी बात जैसे सुनी ठीक उसी तरह आपको सुना रहा हूं। घटना इस प्रकार है- वे ट्रेन से वाराणसी से कोलकाता आ रहे थे। जब ट्रेन से कोलकाता उतरे तो देखा कि उनके पास जो ३ हजार रुपए थे, वे गायब हैं। गिर गए या किसी ने निकाल लिया वे नहीं जानते। ये रुपए उन्होंने बैग में एक लिफाफे में रखे थे। बैग का साथ उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। बाथरूम भी जाते तो बैग लिए जाते। हां, कुछ खाने- पीने का सामान निकालने के लिए उन्होंने जरूर वह बैग खोला और बिस्कुट इत्यादि ढूंढ़ने के लिए उन्होंने बैग का सामान दाएं- बाएं किया। वाराणसी में जहां भी गए, वहां- वहां बैग खोला और कुछ कागज- पत्र इत्यादि निकाले या रखे। बस। उनका शक था कि सामान निकालने या रखने के दौरान रुपए का लिफाफा अनजाने में कहीं गिर गया होगा। लेकिन अब वे कोलकाता स्टेशन से जाएं कैसे? वहां से उनका घर करीब २० किलोमीटर दूर है। पाकेट में एक पैसा नहीं है। खुचरा पैसे तक नहीं हैं। अब क्या होगा? वे घर की तरफ पैदल चल निकले। सुबह का वक्त था। सोचा रात होने के पहले तो वे पैदल पहुंच ही जाएंगे। रास्ते में चलते जा रहे थे और गायब हुए रुपयों के बारे में सोचते जा रहे थे। तभी उन्हें रास्ते में एक लिफाफा पड़ा हुआ मिला। हालांकि उनका लिफाफा खाकी रंग का था और यह लिफाफा सफेद था। उन्होंने उत्सुकता से उसे खोला और देखा तो दंग रह गए। उसमें तीन हजार रुपए थे। पांच- पांच सौ के नोट। उन्हें शक हुआ कि कहीं ये नोट जाली तो नहीं हैं। उन्होंने बैंक के लोगों से इसकी जांच कराई, नोट बिल्कुल असली थे। तब से वे दंग हैं। उनका कहना है कि ईश्वर बहुत दयालु हैं। मैंने उनसे कहा- जिस व्यक्ति के ये रुपए गिरे होंगे, वह भी तो वैसे ही दुखी हुआ होगा, जिस तरह आप हुए थे, तो उन्होंने कहा- हां, यह तो सच है। मुझे ये रुपए थाने में या कहीं जमा करने का विचार आया। लेकिन फिर सोचा जहां जमा करूंगा, वहां के लोग अगर बेईमान निकले तो उससे अच्छा है मैं ही क्यों न रख लूं। उनका तर्क मेरी समझ में नहीं आया। आपने जो कर्म किया उसका फल आप भोगेंगे। जो भी यह रुपया लेगा, उसका फल वह भोगेगा। रुपए तो खर्च हो जाएंगे लेकिन आपका कर्म संचित रह जाएगा। उसे आपके अलावा कोई दूसरा नहीं भोग सकता। यही तो वाल्मीकि के बारे में जो कथा है वह कहती है। साधु ने डकैत वाल्मीकि से कहा- मुझे तुम पेड़ में बांध दो, लेकिन घर जाकर अपने बीवी बच्चों से पूछो- क्या वे लोग तुम्हारे पाप में भागीदार बनेंगे? वाल्मीकि घर गए जब उन्होंने अपने बीवी, बच्चों और माता- पिता से यह प्रश्न किया तो सबने एक ही जवाब दिया- नहीं। हम तुम्हारे पाप में भागीदार नहीं हैं। तुम्हारा कर्म तुम जानो। हर आदमी अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी है। तब वाल्मीकि की आंख खुली। उन्होंने डकैती करनी छोड़ दी और ऋषि बन गए।

2 comments:

वन्दना said...

कर्मों का फ़ल तो खुद ही भोगना पडता है।

माधव said...

interesting