Tuesday, May 25, 2010

ईश्वर के लिए विरह

मित्रों
आज मैं जर्मनी की एक बहन इंग्रिड हेंजलर की अनूदित कविता आपको पढ़वाना चाहता हूं जो
उनकी पुस्तक नास्टाल्जिया फार गॉड ( ईश्वर के लिए विरह ) से ली गई है। वे उच्च कोटि की साधक हैं और उत्कृष्ट कवयित्री, चित्रकार और लेखिका भी हैं। उन्होंने मुझे अपने इस ब्लाग पर यह कविता डिस्प्ले की अनुमति दी है। मैंने जितनी बार भी उनसे बातें की हैं, मुझे उनके साध्वी होने का आभास मिला है। वे ज्यादातर इटली के असीसी में रहती हैं जहां सेंट फ्रांसिस ने जीसस क्राइस्ट का साक्षात दर्शन किया था। परमहंस योगानंद जी ने

`सेंट फ्रांसिस से मुलाकात की थी।
इंग्रिड हेंजलर के फोटो के साथ उनकी यह कविता आपको अच्छी लगेगी-

गिरना

इंग्रिड हेंजलर


मैं गिर रही हूं, सदा गिर रही हूं
बहुत काले और ठंडे गह्वर में
कहां है प्रकाश, कहां है उसका चेहरा
जो दिखाता है मुझे प्रेम और आशा?

क्या तुम नहीं सुनते मेरा मौन रोदन?
इतनी बार मैंने पुकारा तुम्हें
मैंने तुम्हारे हृदय को खटखटाया और मारा हथौड़ा
लेकिन बंद है दरवाजा, घुस नहीं सकती मैं

आंसुओं से भरा है मेरा चेहरा
इतनी प्यासी है मेरी आत्मा
कब, ओह.... कब देखूंगी प्रकाश
कब होऊंगी मैं धन्य, उसके आने पर...?

4 comments:

kunwarji's said...

OH!YE TADAP.....

kunwar ji,

Rekhaa Prahalad said...

हताश निराश हों कर मैंने भी कई बार इसी तरह पुकारा है भगवान को, वो है की सुनते ही नहीं;(

वन्दना said...

yahi to virah ki charam avastha hai jahan sirf pukar hi pukar ho ..........ek tadap ho........vedna ho...........bahut hi sundar abhivyakti..........padhwane ke liye aabhar.

vishal said...

Sir kavita bahut achchhe hai. Nivedan karungaa ki inake sundar pravachan bhee post karen. "Ishwar se itana prem karo" Inheen ka feedback padha thaa aapake blog par kafee sukun deta hai inka likha padhana.