Monday, May 17, 2010

एक सन्यासी और नए भक्त का संवाद

विनय बिहारी सिंह

कल एक सन्यासी और नए भक्त के बीच बहुत ही रोचक बातचीत हुई।
भक्त- दस मिनट तक तो ध्यान ठीक लगता है, लेकिन इसके बाद मन भटकने लगता है।
सन्यासी- क्यों? भगवान तो प्रेम के भंडार हैं। उनसे मन हट कर संसार की तरफ जाना तो भगवान से दूर जाना है।
भक्त- हां, लेकिन क्या करूं। मन एक जगह ठहरता नहीं।
सन्यासी- जन्म जन्मांतर से तो मन संसार में रहा है। अचानक भगवान में तो लगेगा नहीं। इसके लिए अभ्यास जरूरी है।
भक्त- मन कैसे लगेगा?
सन्यासी- अभ्यास से। मन बार- बार ईश्वर के ध्यान से भागेगा। आप उसे बार- बार भगवान में लगाएंगे। इसमें परेशान नहीं होना है। धैर्य और लगन से भगवान पर ध्यान रखने से आपको सफलता मिल ही जाएगी।
भक्त- कितना समय लगेगा?
सन्यासी- जैसी गहरी आपकी भक्ति होगी, उसी के हिसाब से आप आगे बढ़ेंगे। कब सफलता मिलेगी, यह सोचना भी ठीक नहीं है। साधना में धैर्य बहुत जरूरी है। समय का ख्याल मत कीजिए। लगे रहिए। भगवान को अपने जीवन का केंद्र बना लीजिए।
भक्त- मैं यह जानता हूं कि भगवान ही हमारे मालिक हैं। लेकिन फिर भी उन पर ध्यान नहीं लग रहा है।
सन्यासी- मन कहां लगता है? वहां लगता है, जहां अच्छा महसूस हो। प्रिय लगे। एक बार दिल और दिमाग यह जान ले कि भगवान से प्रिय कोई नहीं है, बस ध्यान लगने लगेगा। आप भगवान से संबंध बनाइए। तब और ज्यादा ध्यान लगेगा। जिससे जितना प्रगाढ़ संबंध बनता है, उस पर ध्यान उतना लगता है। दिन रात भगवान के बारे में सोचिए। कभी उनके चेहरे के बारे में। कभी उनकी शक्ति के बारे में। कभी उनकी लीलाओं के बारे में। उनके बारे में धार्मिक ग्रंथों में जो कथाएं लिखी हैं वह भी भक्ति के साथ पढ़िए। लेकिन यह शुरूआती प्रयोग है। ज्यादा भौतिक वस्तुओं पर ध्यान देंगे तो सूक्ष्म में नहीं उतर पाएंगे। भगवान के भौतिक रूपों में कुछ ही दिन रहिए। फिर आप निराकार में चले जाएंगे। भगवान सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वग्याता हैं। वे किसी रूप, नाम या स्थान से बंधे नहीं हैं। वे सबकी आत्मा के रूप में हर मनुष्य या हर जीव में हैं। लेकिन शुरू में भगवान को पकड़ने के लिए उनके स्थूल रूप पर ही ध्यान करना चाहिए। पहले कोई रूप और नाम चुन लीजिए- जैसे राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा या काली या गणेश जी। कोई एक नाम और रूप। उसी को लेकर रहिए। उसी में रमें रहिए। बाद में वही रूप निराकार और सर्वव्यापी हो जाएगा।
आप लगे रहिए। एक प्रेमी की तरह। ईश्वर से प्रेम करना यानी अपनी मुक्ति।

3 comments:

khabarchi said...

बढ़िया ...
इसे भी देख लेwww.jugaali.blogspot.com

रंजना said...

aah...satya kaha...prernadayi katha...

Dr Satyajit Sahu said...

उत्तम आलेख