Thursday, May 6, 2010

अर्जुन का विषाद

विनय बिहारी सिंह

गीता का पहला अध्याय पढ़ते हुए आज एक बार फिर बहुत अच्छा लगा। अर्जुन भगवान कृष्ण से अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा करने के लिए कहते हैं। भगवान रथ को वहां ले जाते हैं। अर्जुन कहता है- मैं युद्ध नहीं करूंगा। अगर मुझे तीनों लोकों का साम्राज्य भी मिल जाए तो मैं यह युद्ध नहीं करूंगा। पृथ्वी पर राज्य करने की तो बात ही छोड़ दीजिए। मैं अपने ही लोगों को कैसे मारूं? और फिर २८ वें श्लोक से लेकर ४६ वें श्लोक तक अर्जुन भगवान के सामने तर्क पर तर्क देता जाता है। भगवान चुप हैं। वे सिर्फ अर्जुन को सुन रहे हैं। चाहते तो बीच में बोल सकते थे। लेकिन नहीं वे अर्जुन को सुन रहे हैं औऱ अर्जुन कह रहा है कि उसका मुंह सूख रहा है, त्वचा में जलन हो रही है, हाथ कांप रहे हैं। वह युद्ध करने की मनःस्थिति में नहीं है। अंतिम श्लोक में संजय, धृतराष्ट्र को बताते हैं कि अर्जुन अपना धनुष रख कर रथ के पीछ बैठ गया। अब दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण, अर्जुन से कहते हैं- तुम्हें असमय में यह कायरता क्यों आ गई अर्जुन? तुम बुद्धिमानों जैसे वचन भी बोलते हो और युद्ध भी नहीं करना चाहते। पहला अध्याय पढ़ते हुए मुझे अठारहवें अध्याय की याद आई। इसमें अर्जुन से भगवान पूछते हैं- तुमने मेरी बातें सुनीं। क्या तुम्हारा संशय मिटा? तो अर्जुन कहते हैं- हां, भगवान मेरा मोह नष्ट हो गया। मुझे स्मृति आ गई यानी मुझे अपने अमरत्व की बात याद आ गई। लेकिन इसके लिए भगवान को अपना विश्वरूप दर्शन कराना पड़ा। कर्मयोग, ग्यानयोग और भक्तियोग के अलावा विभूतियोग और अन्य कई योगों की व्याख्या करनी पड़ी। तब अर्जुन कहते हैं- मेरा मोह नष्ट हो गया भगवन। और जब भगवान अपना दुर्लभ दर्शन कराते हैं तो अर्जुन वहां भी डर जाते हैं। वे कहते हैं- आपको देख कर अन्य लोग तो भयभीत हो ही रहे हैं, मैं भी भयभीत हूं। आप अपना वही रूप दिखाइए- सिर पर मुकुट, अपने चारो हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल का फूल। मैं आपका वही मोहिनी रूप देखना चाहता हूं। और भगवान अर्जुन के मनचाहे रूप में प्रकट होते हैं। यही उनका स्वाभाविक रूप है। भगवान कहते हैं- मेरा जो रूप तुमने देखा, वह अन्य लोगों के लिए दुर्लभ है। लेकिन यह दुर्लभ रूप मेरे भक्तों के लिए उपलब्ध है। यानी भगवान कहते हैं कि उनके भक्तों के लिए उनका कोई भी रूप दुर्लभ नहीं है। भक्त सबसे उच्च स्तर पर हैं। भगवान ने गीता में जगह जगह कहा है- मैं अपने भक्तों का योग, क्षेम खुद वहन करता हूं। उनकी रक्षा खुद करता हूं। उन्हें चिंता नहीं करनी चाहिए।

1 comment:

वन्दना said...

भक्त तो भगवान के प्राण हैं…………………उन पर तो वो बिना कहे ही कृपा करते हैं…………………॥यही तो उनकी भगवत्ता है………………………भक्तोंके लिये तो कुछ भी दुर्लभ नही है क्युंकि जिसे जगत का अधिष्ठाता मिल जाये उसके लिये तो कुछ भी दुर्लभ नही मगर भक्त भी तो भगवान से कम नही हैं वो भी कोई भी कामना नही रखते यहाँ तक कि मुक्ति की भी नही, भगवान को पाने की भी नही , उनके धाम की भी नही और ऐसे भक्त भगवान को अत्यंत प्रिय होते हैं और उनके लिये वो सोच मे पड जाते हैं कि इस भक्त को मैं क्य दूँ ? इस के ॠण से उॠण कैसे होऊँ?