Wednesday, May 5, 2010

आनंद ही ब्रह्म है

विनय बिहारी सिंह

एक बार एक ऋषि ने अपने पुत्र को यह बताने को कहा कि ईश्वर क्या हैं? तुम्हारी समझ क्या है? तुम ईश्वर को किस रूप में व्याख्यायित करोगे? पुत्र की शिक्षा पूर्ण हो चुकी थी। वह इसका उत्तर देने के लिए हिमालय में चला गया और वहां एक गुफा में बैठ कर ध्यान करने लगा। एक वर्ष बाद वह अपने पिता के पास लौटा और बोला- अन्न ही ब्रह्म है। क्योंकि अन्न ही हमारे शरीर को पुष्ट करता है। पिता इस उत्तर से दुखी हुए और कहा कि वापस जाओ। तुम्हारा उत्तर शरीर तक ही सीमित है। तुम शरीर हो? या यह शरीर तुम्हारा है? जाओ वापस जाओ। पुत्र फिर गुफा में लौटा और तपस्या करने लगा। एक साल बाद जब वह लौटा तो उसने पिता से कहा- पिता जी, सांस ही ब्रह्म है। बिना श्वांस के हम जीवित नहीं रह सकते। पिता फिर बहुत दुखी हुए। वे बोले- पुत्र, तुम देह या मन या बुद्धि नहीं हो। देह, मन या बुद्धि तुम्हारी हो सकती है। लेकिन यह तुम नहीं हो सकते। यह घर तुम्हारा हो सकता है। लेकिन तुम घर नहीं हो सकते। जाओ, वापस जाओ। शोध करो। पुत्र फिर वापस गुफा में लौट गया। गहन तपस्या की। फिर पिता के पास लौटा और बोला- पिता जी, आनंद ही ब्रह्म है। पिता बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा- हां बेटा। अब तुमने ठीक समझा। सच्चिदानंद ही ब्रह्म हैं। सत, चित्त, आनंद। हृदय व मन निर्मल हो तो ईश्वर की कृपा बरसती है। तब आनंद का साम्राज्य स्थापित होता है। क्योंकि जहां ईश्वर हैं, वहां आनंद होगा ही। सांसारिक आनंद तो मिथ्या है।

1 comment:

Prakash Chandalia said...

vinayji,
kamaal kar rahe hain aap. Blog duniya me aapka yogdaan avismarniy rahega. niyamit roop se aap apne blog par jo saamagri de rahe hain, vah sanatan hai. aapke samarpan ko pranaam
prakash
kolkata