Thursday, February 25, 2010

आपने यह कथा जरूर सुनी होगी

विनय बिहारी सिंह


कथा है कि एक बार पार्वती जी ने भगवान शिव से कहा कि पृथ्वी पर लोग, इतने दुखी रहते हैं और आप उनके लिए कुछ नहीं करते। कुछ तो कीजिए। भगवान शिव ने कहा कि मैं तो करना चाहता हूं लेकिन पीड़ित लोग ध्यान नहीं देते। आखिर मैंने उन्हें फ्री विल यानी स्वतंत्र इच्छा शक्ति दी है। अब अगर वे इस फ्री विल का सदुपयोग न करें तो मैं क्या कर सकता हूं। माता पार्वती ने कहा कि इसका प्रमाण क्या है। आप मेरे साथ पृथ्वी लोक में चलिए और मेरे सामने किसी की मदद कीजिए। भगवान तैयार हो गए। दोनों एक वृद्ध दंपति के रूप में पृथ्वी पर आए और देखा कि सामने से एक व्यक्ति चला आ रहा है। भगवान ने उसके रास्ते में सोने की मुहरों वाली एक थैली इस तरह रख दी कि कुछ मुहरें बाहर निकली दिख जाएं। वह आदमी चला आ रहा था अपनी धुन में मस्त। जब थैली के पास आने का समय आया तो उसके मन में आया कि देखें अंधे लोग किस तरह रास्ते में चलते होंगे। उसने आंखें बंद की और चलने लगा। इस तरह सोने की थैली वाली जगह आंख बंद किए हुए ही गुजर गया। भगवान ने मां पार्वती से कहा- देख लिया। अब मैं क्या करूं। यह तो एक उदाहरण है। लेकिन मैं हजार तरह से लोगों की मदद करता हूं। फिर भी लोग दिमाग उस तरफ नहीं ले जाते। वे छोटे- छोटे सुखों के लिए इस तरह हाय हाय करते हैं कि बड़े सुख उनके हाथ से फिसल जाते हैं। मां पार्वती ने पूछा- इसका कारण क्या है। भगवान ने कहा- लोग खुद को शरीर मान कर चलते हैं इसीलिए वे दुखी रहते हैं। एक बार वे यह मान लें कि वे शरीर नहीं हैं। शरीर उनका है। वे तो सच्चिदानंद आत्मा है। बस काम बन जाएगा। तब वे इंद्रियों के दास नहीं रहेंगे। तब वे तमाम इंद्रियों को सुख पहुंचाने के बदले आत्मा को सुख पहुंचाने की कोशिश करेंगे। अभी तो होड़ है कि आज यह खाएं तो कल वह खाएं। आज यह पहनें तो कल वह पहनें। आज यहां घूमने जाएं तो कल वहां घूमें। आज इससे मिलें तो कल उससे मिलें। मनुष्य का सारा जीवन इंद्रियों की संतुष्टि और हजार हजार इच्छाओं की पूर्ति में ही बीत जाता है। अंत में जब मरता है तो भी असंतुष्ट ही मरता है। मां पार्वती ने कहा- मुझे इन दुखी संतानों से प्यार है। लेकिन ये समझते क्यों नहीं। भगवान ने कहा- इतने वेद, पुराण और उपनिषद हैं। गीता है। रामचरितमानस है। ईश्वर प्राप्त ऋषि मुनि हैं। उनकी बातें सुन कर या इन धार्मिक ग्रंथों का सार तत्व जान कर मनुष्य दुखों से छुटकारा पा ही सकता है। मां पार्वती ने समर्थन में सिर हिलाया।