Thursday, February 25, 2010

भक्ति यानी पूर्ण समर्पण

विनय बिहारी सिंह'


भक्ति का अर्थ है पूर्ण समर्पण। एक भक्त से मुलाकात हुई। वे मां काली को ही अपना सर्वस्व मानते हैं। उनकी भक्ति अद्भुत है। काले रंग की चीज देखते ही वे कहते हैं- जय मां काली। वे कहते हैं जो भोजन उनके पेट में जाता है, वह वे नहीं, मां काली खाती हैं। जो कपड़ा वे पहनते हैं वह वे नहीं मां काली पहनती हैं। जो काम वे करते हैं वह मां काली की शक्ति से होता है। जब वे सोते हैं तो कहते हैं- आंख बंद करते ही अंधेरा हो जाता है। वहां भी मां काली हैं क्योंकि अंधेरा तो काला ही होता है। क्या गजब है। उनसे मिल कर जितनी देर बात कीजिए वहां से हटने का मन नहीं करता। वे कोई न कोई प्रसंग उठा देते हैं और उस प्रसंग के केंद्र में होती हैं मां काली। कभी कभी वे मां काली के भजन सुमधुर कंठ से गाते हैं। कुछ अच्छा खाने को मिलता है तो वे मां काली को धन्यवाद देते हैं। क्या गजब की भक्ति है। वे कहते हैं- एक सेकेंड भी मैं मां काली से अलग नहीं हो सकता। उन्होंने ही तो अपनी तरफ आकर्षित किया है। मां काली की गोद में सिर रख कर सोने का आनंद क्या होता है,, यह वही जान सकता है जो मां का भक्त है। दूसरे लोग उस आनंद की कल्पना भी नहीं कर सकते। मां हर प्राणी को प्यार करती हैं। मनुष्य चूंकि सबसे बुद्धिमान है इसलिए उससे उम्मीद है कि वह भी मां के प्यार का सार्थक उत्तर देगा। लेकिन कई लोग मां की तरफ देखते भी नहीं । मां उनकी तरफ देख रही हैं। उन्हें प्यार से बुला रही हैं। लेकिन वह व्यक्ति न देख रहा है न सुन रहा है। उसे तो सांसारिक चीजों के प्रति आकर्षण है। वह समझता है कि सांसारिक वस्तुओं के इकट्ठा कर लेने से वह सुखी हो जाएगा। लेकिन सच्चाई यह है कि उसकी भूख बढ़ती जाती है बढ़ती जाती है और मरते दम तक वह सांसारिक वस्तुओं के पीछे भागता रहता है। न इच्छाओं का कोई अंत है और न मनुष्य को कभी चैन है। मनुष्य एक ही सूरत में आनंद और पूर्णता मिल सकती है। वह जब ईश्वर से जुड़ जाए। ईश्वर से कनेक्ट हो जाए। लेकिन ज्यादातर लोग ईश्वर से कनेक्ट होने के लिए धैर्य नहीं रख पाते। वे थोड़ी देर भी शांत नहीं रह पाते। जबकि दिमाग की चंचलता ही हमारी सारी परेशानियों की जड़ है। दिन में या रात में जब कभी समय मिले थोड़ी देर ठहर कर शांत हो जाइए और सोचिए कि हम इस दुनिया में आए क्यों हैं। सिर्फ अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए। हाय हाय करने के लिए या इस संसार से सीख लेने के लिए कि कोई अपना नहीं है। अपने हैं तो सिर्फ ईश्वर ही। कम से कम उन्हें रोज नमस्कार तो कर लें। यह तभी तो होगा जब हम शांत होंगे।

1 comment:

Aaron Thomae said...

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