Friday, December 2, 2011

इंद्रियां धोखा देती हैं

विनय बिहारी सिंह


श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि मन जिस इंद्रिय के साथ रहता है, वह उसका गुलाम हो जाता है। इंद्रियां जैसा नाच नचाती हैं, मन नाचता है। इंद्रियां कई बार हमारे शत्रु की तरह काम करती हैं। आम तौर पर हम शरीर का बहुत ध्यान रखते हैं। खूब अच्छी तरह नहाना- धोना, भोजन करना, आराम करना। इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन शरीर का जरूरत से ज्यादा ख्याल रखना बीमारी है। स्वामी श्री युक्तेश्वर जी कहते थे- कुत्ते को रोटी दे दो और निश्चिंत हो जाओ। यानी शरीर का पोषण कर दो और फिर ईश्वर की तरफ मुड़ जाओ। हां, यह ठीक है कि हमें ठीक से खाना चाहिए, स्वच्छता का ख्याल रखना चाहिए। रोग-व्याधि न हो इसके लिए तत्पर रहना चाहिए। लेकिन हमेशा शरीर और उसकी आवश्यकताओं पर ही केंद्रित नहीं रहना चाहिए। यह शरीर अनेक लोगों को धोखा दे चुका है। इंद्रियां अपनी मनचाही चीजें चाहती हैं। अगर आप इंद्रियों की सुनते हैं तो वे और मांग करती हैं। आप इंद्रियों को जितना संतुष्ट करेंगे, वे और ज्यादा की मांग करेंगी। अगर आप इंकार कर देंगे तो वे आपको परेशान करेंगी। इस दुष्चक्र से मुक्ति का एक ही उपाय है कि आत्मसंयम बरता जाए। जितनी जरूरत है, शरीर को उतना ही दिया जाए। इंद्रियां जब जिद्दी हो जाती हैं तो हमारी शत्रु हो जाती हैं।
कई लोग घनघोर भोजन प्रेमी होते हैं। वे दिन- रात भोजन के बारे में ही सोचते रहते हैं। उनके लिए संसार में स्वादिष्ट भोजन के अलावा कुछ और आकर्षण की वस्तु है ही नहीं। उनके लिए भोजन ही ईश्वर तुल्य है। एक दिन साधारण भोजन मिला नहीं कि उनका मूड खराब हो जाता है। ऐसे व्यक्ति भोजन की बात करते समय खूब रस लेते हैं। उनसे आप भोजन के बारे में घंटों बातें कर सकते हैं। लेकिन इससे लाभ? कुछ नहीं। यदि वे भोजन के बदले ईश्वर चर्चा करते तो स्थाई सुख पाते। पर नहीं ईश्वर की तरफ उनका मन जाता ही नहीं।

2 comments:

पुरुषोत्तम पाण्डेय said...

आपने बहुत ज्ञान की बात लिखी है पर सांसारिक व्यक्ति माया के प्रभाव में सब भूला रहता है.

वन्दना said...

बिल्कुल सही कहा है…………