Wednesday, December 21, 2011

समुद्र की तरह की स्थिरता

विनय बिहारी सिंह




भगवत गीता के अध्याय दो में भगवान ने कहा है- जैसे समुद्र में बहुत सी नदियां मिलती हैं तो भी समुद्र अचल रहता है, ठीक उसी तरह धीर पुरुष भी सांसारिक परिस्थितियों में अचल रहता है। चाहे हिला देने वाली स्थिति ही क्यों नहीं आए। चाहे कितनी भी बड़ी समस्या ही क्यों न आ जाए वह व्यक्ति तनाव में नहीं आता। यह संसार भगवान का है। इस दुनिया में हमारे आने से पहले भी यह दुनिया थी और मरने के बाद भी रहेगी। सांसारिक नाटक चलते रहेंगे। धीर पुरुष, समझदार पुरुष, जानते हैं कि ईश्वर ही सत्य हैं। बाकी सब अनित्य है। जो अनित्य है उसका साथ क्यों दिया जाए? परमहंस योगानंद जी ने कहा है कि न जाने कितने लोगों ने एक दूसरे को कहा होगा- मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं। उन्होंने एक दूसरे के लिए बड़े- बड़े वादे किए। लेकिन आज वे कहां हैं? वे वादे कहां गए। वह प्यार कहां है? एक ही प्यार स्थाई है। वह है भगवान का प्यार। वह इस जीवन में तो साथ रहेगा ही, मरने के बाद भी रहेगा। क्योंकि भगवान तो शास्वत हैं। वे सदा थे, हैं और रहेंगे। हमारी आत्मा उनका अंश है, इसलिए हम भी उनके अंश हैं- ईश्वर अंश जीव अविनाशी।। इसलिए ईश्वर की तरफ हमारा आकर्षण स्वाभाविक है। हम अपने उत्स की तरफ आकर्षित होते हैं। भगवान की तरफ आकर्षित होते हैं तो इसीलिए आनंद मिलता है। यह सोच कर कितना अच्छा लगता है कि ईश्वर ही हमारे स्रोत हैं।

2 comments:

वन्दना said...

आनन्ददायी अनुभूति।

Pragya Sharma said...

Uttam vichar hai apka .