Tuesday, March 17, 2009

शिव महापुराण की महिमा


विनय बिहारी सिंह

वैसे तो शिव महापुराण की महिमा शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है। लेकिन यह एक कोशिश भर है। शिव इस जगत के स्वामी हैं इसलिए उन्हें महेश्वर या देवाधिदेव कहा गया है। शिव महापुराण ७ संहिताओं में विभक्त है। इन संहिताओं के नाम हैं- १. वागेश्वरी संहिता २. रुद्र संहिता ३. शतरुद्र संहिता ४. कोटिरुद्र संहिता ५. उमा संहिता ६. कैलाश संहिता ७. वायवीय संहिता। पहले सात अध्यायों में शिव महापुराण पढ़ने की महिमा का विस्तार से वर्णन है। यानी जो यह पुराण पूरी श्रद्धा से पढ़ता है, उसे क्या क्या लाभ मिलते हैं। यह पवित्र ग्रंथ कैसे पढ़ते हैं। कैसा माहौल होना चाहिए। किस जगह बैठ कर पढ़ना चाहिए। वगैरह- वगैरह। अनेक महात्मा हैं जो हमेशा अपने पास यह महापुराण रखते हैं। आमतौर पर वे रात के सन्नाटे में अत्यंत एकांत व पवित्र स्थान पर इसका पाठ करते हैं। मेरी भेंट एक ऐसे ही महात्मा से हो चुकी है। उन्होंने कहा था- मैं जब भी इस महापुराण को पढ़ता हूं, एक दिव्य आनंद का अनुभव होता है। आश्चर्य यह है कि इसे मैं हजारों बार पढ़ चुका हूं, लेकिन हर बार यह पहले से ज्यादा रुचिकर और आनंददायी लगता है। इसीलिए इसका जितनी बार पाठ किया जाए, कम है। खास बात यह है कि शिव महापुराण के श्लोकों को व्याख्या सहित पढ़ने पर आपका पूरा शरीर एक दिव्य तरंग से ओतप्रोत हो जाता है। अगर इसे लगातार हर रोज पढ़ा जाए तो उसका कितना लाभ मिलेगा, कहने की जरूरत नहीं है। एक संत ने कहा था- वैसे तो शिव जी साकार मृगछाला पहने जटा- जूट बढ़ाए, सिर पर गंगा और चंद्रमा को धारण किए हुए, गले में सांप की माला और त्रिशूल व डमरू के साथ नंदी बैल को लिए रहते हैं। लेकिन जब उनकी भक्ति में हम डूब जाते हैं तो वे एक दिव्य प्रकाश में परिवर्तित हो जाते हैं। तुलसीदास ने रामचरितमानस में कहा है- वैसे तो शिव जी विचित्र परिधान पहने रहते हैं लेकिन वे हैं- परम कल्याणकारी। यानी भगवान शिव की अराधना करने वाले का परम कल्याण होता है। जो उनकी श्रद्धा से पूजा करते हैं, उन्हें किसी बात का भय नहीं रहता।