Monday, January 18, 2010

ध्यान में शांत होना जरूरी

विनय बिहारी सिंह

कई लोग कहते हैं कि उनका ध्यान ठीक से नहीं लगता। इसकी वजह है कि बाहर की चीजों में उनका मन अंटका रहता है। ध्यान के लिए जरूरी है कि बाहर की सारी चीजें भूल कर अंदर की यात्रा करें। लेकिन अगर आंख बंद है और दिमाग संसार में ही चक्कर काट रहा है तो ध्यान का कोई मतलब नहीं है। प्रसिद्ध पुस्तक आटोबायोग्राफी आफ अ योगी के लेखक औऱ उच्चकोटि के सन्यासी परमहंस योगानंद जी कहते थे कि आंख बंद करते ही आप समूची दुनिया को भूल जाइए। आप अब तक ईश्वर को याद नहीं कर रहे थे, इसका पश्चाताप कीजिए और इस गलती को सुधारते हुए ईश्वर को प्रेम कीजिए क्योंकि वह आपको प्रेम करता है। सिर्फ और सिर्फ ईश्वर पर ध्यान केंद्रित कीजिए। कुछ लोगों का कहना है कि आंख बंद करते ही अंधेरा दिखता है। तो इस अंधेरे में हम क्या देखें। तमाम संतों ने कहा है कि इस अंधेरे में ही प्रेम से देखने के बाद प्रकाश दिखाई देगा। लेकिन हमारे पास धैर्य नहीं है। हम तो चाहते हैं कि आज ही ध्यान शुरू किया और हफ्ते भर में कोई चमत्कार हो जाए। ऐसा नहीं होना चाहिए। वर्षों की साधना के बाद तो कुछ महसूस होता है। कई लोगों का कहना है कि उनके पास इतना धैर्य नहीं है। इससे अच्छा तो है कि टीवी देखी जाए। यानी हम अपने भीतर नहीं उतरेंगे। बाहर- बाहर ही रहेंगे। टीवी देखेंगे, अखबार पढ़ेंगे, गाने सुनेंगे, इंटरनेट पर रहेंगे या गप करेंगे लेकिन कुछ देर बैठ कर ध्यान नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें कुछ महसूस नहीं होता। विचित्र है। आदि शंकराचार्य ने कहा है कि मनुष्य को अकेले में सोचना चाहिए कि वह इस दुनिया में क्यों आया है? यह ब्रह्मांड कैसे बना? इसका मकसद क्या है? इस समूचे ब्रह्मांड को चलाने वाला कौन है? मनुष्य जन्म के पहले कहां था? फिर मरने के बाद कहां जाता है? वगैरह, वगैरह। एक ऋषि तुल्य सन्यासी ने कहा है कि जब तक आपका दिमाग घूमता रहेगा, आप ईश्वर से संपर्क नहीं कर सकते। उन्होंने कहा- पंखा चलता है तो उसके डैने नहीं दिखते। ज्योंही पंखा बंद होता है, उसके डैनों को आप गिन सकते हैं। इसी तरह घूमती चीज को आप ठीक से नहीं देख सकते। तब एक भक्त ने पूछा- पंखा बंद हो जाएगा तो हवा कहां से मिलेगी? प्रश्न करने वाला समझ नहीं पाया कि सन्यासी कह क्या रहे हैं। इसीलिए सन्यासी ने दूसरा उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अगर आपके कमरे में घूमने वाला बलब लगा दिया जाए तो उसकी मदद से आप क्या ठीक से पढ़ सकेंगे। रात हो गई है। आपको कोई किताब पढ़नी है। आपने कमरे का बल्ब जलाया। वह बल्ब जला तो जरूर लेकिन चारो तरफ घूम रहा है। तब आप उसकी रोशनी में कैसे पढ़ पाएंगे। आप तो डिस्टर्ब हो जाएंगे। पढ़ाई तो दूर की चीज है। आपको पढ़ने के लिए स्थिर दिमाग और स्थिर बल्ब का प्रकाश चाहिए। ठीक उसी तरह ध्यान के लिए आपको स्थिर दिमाग और एकाग्रचित्त मन चाहिए। तब वह भगवान में लगेगा। अन्यथा आप घंटे भर आंखें बंद करके रहिए। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आपका ध्यान कभी नहीं सुधरेगा। दिमाग का चपर- चपर बंद करना पड़ेगा। एकदम शांत और स्थिर। तब मनुष्य गहरे ध्यान में उतरता है। अगर मन भागता है तो उसे बार- बार खींच कर ध्यान में लगाइए। इसे ही अभ्यास योग कहते हैं। धीरे- धीरे मन आपके नियंत्रण में आ जाएगा। लेकिन मन को नियंत्रित करने के लिए धैर्य चाहिए। धीरज चाहिए। हड़बड़ करने या दुखी होने से काम नहीं चलेगा। मन को दृढ़ करके आप डटे रहिए। ध्यान की एकाग्रता में बार- बार जाइए। फिर मन हटता है, तो फिर उसे खींच कर भगवान के पास ले जाइए। अब तक आपका मन आवारा था। अब उसे नियंत्रित करना है। आवारा इसलिए कि जहां जरूरत नहीं है, यह मन वहां भी जाना चाहता है। इसे ही रोकना है।

2 comments:

Rajey Sha said...

ध्‍यान आखि‍र है क्‍या बला ??

vinay bihari singh said...

अपनी संपूर्ण चेतना को ईश्वर में लीन कर देने को ध्यान कहते हैं। यह करना इसलिए सुखद है क्योंकि हम ईश्वर के अंश हैं।