Wednesday, July 29, 2009

नर्मदा परिक्रमा में एक अद्भुत संत से भेंट

विनय बिहारी सिंह

एक धर्मपरायण व्यक्ति नर्मदा परिक्रमा कर रहे थे। मान्यता है कि नर्मदा परिक्रमा से जीवन में सुख- शांति आती है क्योंकि भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। मां नर्मदा को भगवान शिव की पुत्री कहा गया है। इस पवित्र नदी (अगर प्रदूषण बढ़ रहा है तो यह हम मनुष्यों का दोष है) के किनारे- किनारे असंख्य शिव मंदिर हैं जिनमें न जाने कब से अद्भुत और जाग्रत शिवलिंग स्थापित किए गए हैं। तो एक व्यक्ति नर्मदा परिक्रमा कर रहे थे। जब वे एक घनघोर जंगल से गुजर रहे थे तो रात हो गई। चूंकि रास्ता अनजान था, इसलिए उन्हें पता नहीं था कि अगला शिव मंदिर कितनी दूर है ताकि वे रात्रि विश्राम कर सकें। अचानक उन्हें घंटे की आवाज सुनाई पड़ी। वे आवाज वाली दिशा में चल पड़े। पांच- सात मिनट में ही वे मंदिर में पहुंच गए। देखा चारो तरफ कोई बस्ती नहीं, जिधर देखिए घना जंगल है, इसमें पत्थर का एक मंदिर किसी पुण्यार्थी ने बना दिया है। लेकिन घंटा किसने बजाया। मंदिर का दरवाजा खुला हुआ था। शिवलिंग पर तरह- तरह के वनफूल चढ़ाए हुए थे। उन्होंने मंदिर में झांका। देखा एक सात फुट लंबे, बलिष्ठ से साधु नंग- धड़ंग वहां बैठे हैं। नर्मदा परिक्रमा करने वाले सज्जन संकोच के साथ आगे बढ़े। साधु ने आंखें खोलीं और पूछा- नर्मदा परिक्रमा कर रहे हो बेटा? वे बोले- हां बाबा। क्या मैं रात को यहां रह सकता हूं। मैं आसपास कोई ठहरने की जगह नहीं जानता। साधु बोले- बिल्कुल ठहर सकते हो। कुछ खाओगे? वे बोले- नहीं महात्मा जी। नर्मदा परिक्रमा करते वक्त एक बार ही खाना होता है। दिन में खा चुका हूं। इसलिए अब कल ही भोजन करूंगा। घोर अंधेरी रात थी। मंदिर में एक छोटा सा दिया टिमटिमा रहा था। मंदिर के बरामदे में परिक्रमाकारी कंबल बिछा कर सो गए। लेकिन उन्हें नींद नहीं आ रही थी। घनघोर अंधेरी रात। आकाश के तारे साफ दिखाई दे रहे हैं। चारो तरफ घना जंगल और हवा चलने की सांय- सांय आवाज। वे सोचने लगे- मंदिर में दिया जलाने के लिए तेल कहां से आता होगा? आसपास तो कोई गांव या बाजार भी नहीं है। ये साधु कौन हैं? नंग- धडंग क्यों रहते हैं? अगर मैं सो जाऊं और अचानक इस जंगल से कोई शेर आकर हमला कर दे तो? तभी साधु बोले- मैं नंग धड़ंग इसलिए रहता हूं क्योंकि मुझे कपड़े की जरूरत नहीं है। और दिया जलता है मां नर्मदा की कृपा से। कई कोस दूर से भक्त इस मंदिर में आते हैं और दिया जलाने का प्रबंध कर जाते हैं। इस जंगल में वस्त्र का क्या काम? तुम डरो नहीं कोई शेर- वेर नहीं आने वाला यहां। भगवान शिव शरणागत की रक्षा करते हैं। सो जाओ। परिक्रमाकारी के मन से अचानक डर खत्म हो गया। वे कब सो गए, उन्हें पता नहीं चला। सुबह उठे तो देखा साधु वैसे ही मंदिर में बैठे हुए हैं। तो क्या वे सोते ही नहीं हैं? उनके मन में उत्सुकता भरा प्रश्न उठा। लेकिन वे उठे और नीचे एक छोटी सी पहाड़ी नदी के पास जाकर प्रातः कृत्य संपन्न किया। फिर स्नान और मंदिर में पूजा की। इसके बाद उन्होंने साधु बाबा से जाने की इजाजत मांगी। साधु ने कहा- रुको। फिर न जाने कहां से एक चांदी की बड़ी सी प्लेट में पूरी, चार लड्डू और आलू की सब्जी दी। वे तो हैरान रह गए। पूरियां गर्म थीं। मानों अभी कड़ाही से निकाली गई हों। लेकिन मंदिर में रसोई का कोई प्रबंध ही नहीं था। जब उन्होंने जलपान कर लिया तो साधु बाबा ने कहा- इस प्लेट को नीचे नदी में फेंक आओ। वे हैरान। पूछा- इतनी अच्छी प्लेट फेंक दूं? साधु ने हंसते हुए कहा- हां। यह प्लेट बहते हुए मां नर्मदा की गोद में चली जाएगी। वहीं से यह पकवान और प्लेट आई थी। उन्हीं के पास चली जाएगी। जिस नर्मदा की परिक्रमा कर रहे हो। उस पर भरोसा न करके तुम रात को डर रहे थे। ऐसा कभी मत करना। जब भक्ति करो तो पूरे मन से। विश्वास करो तो पूरे मन से। वरना घर बैठो और जो मन में आए करो। लेकिन अगर व्रत लिया है कि नर्मदा परिक्रमा करोगे तो सहारा भगवान शिव और मां नर्मदा ही हैं। श्रद्धा करना सीखो, निष्ठा नहीं है तो नास्तिक बन जाओ। लेकिन बीच वाली स्थिति में मत रहो। इससे तुम्हारा ही नुकसान होगा। जाओ भगवान शिव को प्रणाम करो और उनसे कहो कि वे तुम्हारा रास्ता निष्कंटक कर दें। मगर दिल से प्रार्थना करना। अधूरेपन से नहीं।

2 comments:

vinay said...

adbhut mere ko aise logo ki talash rehti hai.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

जीवन संस्मरण...दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम को देखिये और इसमें लिखिए...