Monday, January 9, 2012

चलती चक्की

विनय बिहारी सिंह




कबीरदास ने कहा है- चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोय.... दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।। माया द्वैत है। यानी चक्की के दो पाट। इससे कोई भी बच नहीं पाया। फिर कबीरदास ने स्मरण दिलाया है कि जो लोग चक्की की धुरी पर रहते हैं, वे बच जाते हैं। जैसे चक्की की धुरी पर अनाज का जो दाना चला गया, वह पिसता नहीं है। बाकी अनाज पिस जाते हैं। कबीरदास ने चक्की की धुरी को ईश्वर का प्रतीक कहा है। यानी जो ईश्वर को पकड़े रहते हैं वे इस भवसागर से पार चले जाते हैं। बाकी लोग पिस जाते हैं। मनुष्य की हजार- हजार कामनाएं हैं। यह होता तो कितना अच्छा होता, वह होता तो कितना अच्छा होता। लेकिन जब वह चीज मिल जाती है तो पता चलता है कि तृप्ति नहीं हुई। इच्छाएं किसी और चीज के लिए बलवती हो गईं। इस तरह इच्छाएं अपने जाल में मनुष्य को फंसाए रखती हैं। इंद्रिया अपने जाल में फंसाए रखती हैं। मनुष्य उनकी संतुष्टि के लिए छटपटाता रहता है। गलत आदतें ऊपर से परेशान करती हैं। किसी को सिगरेट ने पीड़ित कर रखा है तो किसी को चाय- काफी ने तो किसी को शराब ने। किसी को कुछ तो किसी को कुछ परेशान कर रहा है। समस्याएं ही समस्याएं। गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन से इसीलिए कहा है- अर्जुन, संसार रूपी दुखों के दलदल से बाहर निकलो। यानी संसार का यह समस्याओं और तनावों का चक्कर चलता रहेगा। इससे मुक्त होने का रास्ता भगवान ने ही बताया है। भगवान कृष्ण ने कहा है- मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हारा सारा भार ले लूंगा। गीता का अठारहवां अध्याय इसीलिए बार- बार पढ़ना चाहिए। भगवान ने वादा किया है, प्रण किया है कि वे अपने भक्तों की रक्षा करेंगे। ऐसा सरल उपाय होने पर भी हम अगर न करें तो इसमें किसका दोष है?

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