Wednesday, September 7, 2011

मीराबाई के भजन

विनय बिहारी सिंह



आज मीरा के भजन बार- बार मुग्ध कर रहे हैं। भगवान के प्रति इतनी विह्वलता और इतना गहरा प्रेम आनंद से सराबोर करने वाला है। मीराबाई सन १५०४ में जोधपुर (राजस्थान) के ग्राम कुड्की में जन्मी थीं। सन १५६० में उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया। यानी कुल ६६ साल की उम्र तक उन्होंने शरीर को धारण किया। । विवाह के कुछ ही समय बाद उनके पति का देहांत हो गया। वे तो पहले से ही भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त थीं। दिन- रात भगवान में ही डूबी रहती थीं। संसार से विरक्त थीं। अनेक वर्षों तक वे वृंदावन में रहीं। वे भक्ति की पर्याय थीं। नीचे दिए गए उनके भजनों को पढ़ कर यह समझना कठिन नहीं है कि उनका अंतःकरण भगवान कृष्ण के प्रेम में संपूर्ण रूप से ओतप्रोत था। वे अनंत काल तक भक्तों के लिए प्रेरणा स्रोत रहेंगी। आइए उनके भजन पढ़ते हैं---

१--
तुम बिन मेरी कौन खबर ले। गोवर्धन गिरिधारी रे॥
मोर मुकुट पीतांबर सोभे। कुंडल की छबी न्यारी रे॥
भरी सभा मों द्रौपदी ठारी। राखो लाज हमारी रे॥
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर। चरन कमल बलहारी रे॥


२--
हरी मेरे जीवन प्रान अधार।
और आसरो नाहीं तुम बिन तीनूं लोक मंझार।।
आप बिना मोहि कछु न सुहावै निरख्यौ सब संसार।
मीरा कहै मैं दासि रावरी दीज्यो मती बिसार।।


३--

राम नाम-रस पीजै मनुआं राम-नाम-रस पीजै।
तज कुसंग सत्संग बैठ नित हरि-चर्चा सुनि लीजै।।
काम क्रोध मद लोभ मोहकूं बहा चित्तसें दीजै।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर ताहिके रंग में भीजे।।

अंत में यह भजन-
४--

नहिं एसो जनम बारंबार।।
का जानूं कछु पुन्य प्रगटे मानुसा-अवतार।
बढत छिन-छिन घटत पल-पल जात न लागे बार।।
बिरछके ज्यूं पात टूटे लगें नहीं पुनि डार।
भौसागर अति जोर कहिये अनंत ऊंडी धार।।
रामनाम का बांध बेडा उतर परले पार।
ज्ञान चोसर मंडा चोहटे सुरत पासा सार।।
साधु संत महंत ग्यानी करत चलत पुकार।
दासि मीरा लाल गिरधर जीवणा दिन च्यार।।

2 comments:

शारदा अरोरा said...

sundar bhajan , Meera to hain hi prem aur bhakti kee anoothee misal ...

वन्दना said...

आनन्द आ गया।