Monday, December 27, 2010

भगवान की अद्भुत लीला का प्रसंग




विनय बिहारी सिंह


कल ब्रह्मचारी गोकुलानंद जी ने दिल को छू लेने वाली एक कथा सुनाई। एक बार एक भक्त ने भगवान को प्रकट होकर वर देने के लिए मजबूर कर दिया। कैसे? वह भाव विह्वल होकर करुणा के साथ कहता रहता था- हे मेरे नाथ, क्या दर्शन नहीं दोगे? आखिर मैंने क्या गलती की है? मैं अपने मन से तो जन्मा नहीं। आपकी मर्जी से ही जन्म लिया। अब आप दर्शन दीजिए। उसकी पुकार में इतनी गहराई और करुणा थी कि भगवान को उसके सामने प्रकट होना पड़ा। भगवान ने कहा- वर मांगो। भक्त ने कहा- मेरी एक ही इच्छा है। मैं अपने घर पर अपने हाथों से आपको भोजन कराऊं। बस। भगवान ने कहा- ठीक है। कल मैं दिन का भोजन तुम्हारे ही घर करूंगा। तुम मुझे अपने हाथों से खिलाना। भक्त तो खुशी से उछल पड़ा। वह घर गया और अपने घर की खूब सफाई की। घर चमकने लगा। अगले दिन उसने तरह- तरह के पकवान बनवाए और भगवान का इंतजार करने लगा। दोपहरी बीतने लगी। तभी भक्त को बैठे- बैठे नींद आ गई। अचानक उसने शोर गुल सुना। देखा- एक कुत्ता रसोई में घुस कर मालपुए खा रहा है। भक्त ने उसे जोर से डंडा मारा। वह कुत्ता चिल्लाते हुए भागा।
भक्त इंतजार करता रहा। भगवान नहीं आए। अगले दिन फिर वह मंदिर में बैठा और करुण पुकार कर भगवान से दर्शन देने की प्रार्थना करने लगा। उस दिन भगवान रात को उसके स्वप्न में आए। भक्त ने उनसे पूछा- भगवान आप मेरे घर क्यों नहीं आए? भगवान ने कहा- मैं तो आया था, लेकिन तुमने मुझे डंडे से इतनी जोर से मारा कि मैं रोता हुआ चला गया। भक्त ने कहा- तो आपको मैं कैसे पहचानता? भगवान बोले। मैं तो कुत्ते के रूप में ही तुम्हारे दरवाजे पर बहुत देर तक खड़ा रहा। तुम्हारे दरवाजे की तरफ देखता रहा। कोई भी मुझे उस रूप में देख कर समझ सकता था कि मैं कुछ चाहता हूं। लेकिन तुम तो अपने घर के भीतर बैठे थे। अगर बाहर रहते तो तुम्हें साफ पता चलता कि मैं उस रूप में क्या चाहता हूं। अपनी आंखें खोल कर रहो।
बाद में उसके पड़ोस के लोगो ने बताया कि यह कुत्ता विलक्षण था। वह तो भों- भों की आवाज में घर मालिक को देर से बुला रहा था। हम लोगों ने ऐसा कुत्ता आज तक नहीं देखा है। साफ पता चल रहा था कि वह कुछ खाने को मांग रहा है। तुम अगर आधी रोटी भी दे देते तो वह खा कर चला जाता। घंटे भर बाद ही वह तुम्हारे घर में गया। तभी तुमने उसे मार भगाया। भक्त को इस बात पर बहुत अफसोस हुआ।
भक्त को संतों की यह वाणी याद आई - ना जाने किस भेष में मिल जाएं भगवान।


6 comments:

वन्दना said...

भगवान की लीला अपरम्पार होती है तभी तो कहा गया है। और सबमे भगवान को देखने का भी संदेश देती है ये कथा।

परमजीत सिँह बाली said...

bahut sundar post|

वन्दना said...

आपकी अति उत्तम रचना कल के साप्ताहिक चर्चा मंच पर सुशोभित हो रही है । कल (3-1-20211) के चर्चा मंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.uchcharan.com

खबरों की दुनियाँ said...

अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । "खबरों की दुनियाँ"

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

Er. सत्यम शिवम said...

बहुत ही सुंदर............
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाए...
*काव्य- कल्पना*:- दर्पण से परिचय
*गद्य-सर्जना*:-जीवन की परिभाषा…..( आत्मदर्शन)