Tuesday, December 21, 2010

मां काली के एक भक्त से भेंट


विनय बिहारी सिंह


कल मां काली के एक भक्त से भेंट हुई। मैंने कहा- ठंड थोड़ी सी बढ़ी है। वे बोले- मां जैसे रखें, वही ठीक है। मैंने पूछा- आजकल आप रात में जाग कर जप इत्यादि कर रहे हैं कि नहीं? वे हंसे और बोले- मैं कहां कुछ करता हूं। करने वाली तो वही हैं। ऐसा आकर्षण है उनमें कि अपने आप मनुष्य जप करने बैठ जाता है। जैसे जैसे आप जप में आगे बढ़ते जाते हैं आपको दिव्य आनंद की अनुभूति होती जाती है। जप जीभ भले कर रही हो लेकिन मेरा हृदय मां के चरणों में अर्पित रहता है। अब मां जाएंगी कहां? मैं कहता हूं कि मां मैं वह सब कुछ सौंप रहा हूं जो मेरे पास है। अपना हृदय, अपना मन और बुद्धि। सारी संपत्ति। लेकिन तुम दर्शन दो। मुझे प्रेम करो। क्योंकि मैं तुम्हारा बेटा हूं। तुम बेटे की पुकार को अनसुना नहीं कर सकती। मैंने पूछा- तो क्या मां आपका जवाब देती हैं? वे बोले- हमेशा नहीं देतीं। लेकिन तो भी मैं जानता हूं कि वे मेरी भक्ति को चुपचाप महसूस कर रही हैं। भले ही छुपी हुई हैं। मैंने पूछा- वे छुप क्यों जाती हैं? उन्हें तो दिखता है कि उनके भक्त उनके लिए तड़प रहे हैं? वे बोले- मां, लीलामयी हैं। सभी लोग अपने बच्चों के साथ खेलते हैं। तो जगन्माता नहीं खेलेंगी। वे इसलिए छुपती हैं कि हम उन्हें खोजें। हमारी आंखों में उनके लिए आंसू आएं। तब वे दौड़ कर हमें अपनी गोद में उठा लेती हैं और हम आनंद में हो जाते हैं। बस तभी अचानक वे गायब हो जाती हैं। लेकिन उनकी नजर हमारे ऊपर हमेशा रहती है। कौन मां होगी जो अपने बच्चे का ख्याल नहीं करेगी? जगन्माता का छुपना भी भक्त के कल्याण के लिए ही है।
उनसे बातें करके बहुत अच्छा लगा।

2 comments:

वन्दना said...

ye padhkar bhi bahut achcha laga sach kaha maa kab door hain humse.

वन्दना said...

आपकी अति उत्तम रचना कल के साप्ताहिक चर्चा मंच पर सुशोभित हो रही है । कल (27-12-20210) के चर्चा मंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.uchcharan.com