Wednesday, December 8, 2010

आदि शंकराचार्य



विनय बिहारी सिंह


आदि शंकराचार्य अवतार थे। बत्तीस साल की कम उम्र में उन्होंने देह त्याग कर दिया और अपने परम प्रिय भगवान में जा मिले। लेकिन इसके पहले ही उन्होंने- भज गोविन्दम्, विवेक चूडामणि, भवान्यष्टकम्
और अन्य अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। इसी अवधि में उन्होंने अपने देश भारत के चारों कोनों पर चार आश्रम स्थापित किए। सन्यासियों की दशनामी परंपरा उन्हीं की दी हुई है। सिर्फ सात साल की उम्र में उन्होंने भगत्प्राप्ति के लिए घर छोड़ दिया। वे केरल के एक छोटे से गांव कालड़ी के रहने वाले थे। सन्यास की दीक्षा लेने के बाद जब वे धार्मिक कामों में अत्यंत व्यस्त थे तभी उनकी मां का देहांत हो गया। उन्होंने उनका अपने हाथों से अंतिम संस्कार किया। आदि शंकराचार्य के एक शिष्य थे कमलपाद। उनका नाम कमलपाद कैसे पड़ा, इसके पीछे एक अत्यंत रोचक कथा है। शंकराचार्य किसी नदी के किनारे अस्थाई रूप से रह रहे थे। कमलपाद (उनका पूर्व नाम स्मरण नहीं है) किसी काम से उस पार गए। लेकिन उनका मन गुरु में ही लगा रहा। इधर शंकराचार्य ने किसी काम से कमलपाद को पुकारा। कमलपाद तो नदी के उस पार थे। उन्हें गुरु की पुकार वहां भी सुनाई पड़ गई। वजह यह थी कि वे तो गुरु में ही खोए हुए थे। वे दौड़ कर नदी किनारे आए। वहां उन्होंने देखा- कोई भी नाव नहीं है। उनसे और इंतजार नहीं हो पाया। वे पानी पर ही चलने लगे। लेकिन आश्चर्य- वे जहां भी पानी में पांव रखते एक कमल के फूल पर उनका पांव पड़ता। इस तरह अनेक कमल के फूलों पर पांव रखते हुए उन्होंने नदी पार की और गुरु के पास पहुंचे। गुरु ने पूछा- कहां थे? कमलपाद ने सारा किस्सा सुनाया। गुरु हंसे। वे बोले- आज से तुम्हारा नाम कमलपाद होगा। तुम जहां पांव रखते हो कमल के फूल तुम्हारे चरण छूते हैं। कमलपाद गुरु के चरणों में गिर पड़े। वे जानते थे- यह सब गुरु शंकराचार्य की ही कृपा थी। शंकराचार्य जी को शिष्य के साथ कौतुक करने की नहीं सूझी थी। वे तो शिष्य को यह बताना चाहते थे कि जो ईश्वर पर पूर्ण विश्वास करता है और अपने समूचे हृदय से हमेशा उनकी अराधना करता रहता है, उसके लिए वे कोई भी चमत्कार कर सकते हैं। शंकराचार्य का एक शिष्य जरा सुस्त था। उनके सारे शिष्य पढ़ने के लिए आ चुके थे। बस सुस्त शिष्य नहीं आ पाया था। कक्षा में बैठे शिष्यों ने कहा- गुरुवर, आप उसकी प्रतीक्षा न करें। पढ़ाना शुरू करें। शंकराचार्य जी पढ़ाना शुरू कर दिया। विषय था-यजुर्वेद। तभी सुस्त शिष्य आया। शंकराचार्य ने उससे कहा- तुम्हें यजुर्वेद के पहले दस श्लोक याद हैं? सुस्त शिष्य ने हां में सिर हिलाया। वहां बैठे सारे शिष्य चकित हो गए। शंकराचार्य ने कहा- सुनाओ। सुस्त शिष्य ने धाराप्रवाह, स्पष्ट उच्चारण और अर्थ के साथ श्लोक सुना दिए। सभी शिष्यों का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया। तब शंकराचार्य ने कहा- देखो, किसी की उपेक्षा कभी मत करो। वह आज से सुस्त नहीं रहेगा। फिर सबने साथ गुरु के उपदेशों को सुना। यह चमत्कार आदि शंकराचार्य ही कर सकते थे। कहा जाता है- आदि शंकराचार्य, भगवान शंकर के ही अवतार थे।

7 comments:

वन्दना said...

आज तो बहुत बढिया और ज्ञानवर्धक जानकारी दी……………आभार्।

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (9/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

vinay bihari singh said...

बहुत बहुत धन्यवाद वंदना जी।

vinay bihari singh said...

बहुत बहुत धन्यवाद वंदना जी।

Dr.J.P.Tiwari said...

Bahut hi achchhi jaankariyon se ot-prot em pathneey aur mananeey post jiski aawashyakt aur praasangikta lagataar bani huyee hai. Apne poorwajon aur chinyakon ke baare me kuchh visjesh gyan batti is post ke liye aapka aabhar......

ana said...

ज्ञानवर्धक जानकारी........ बहुत बहुत धन्यवाद

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत अच्छी जानकारी मिली ..आभार