Friday, October 15, 2010

जो पिंड में है वही ब्रह्मांड में है

विनय बिहारी सिंह


महात्माओं ने कहा है- यत्पिंडे तत्ब्रह्मांडे। यानी जो पिंड में है, वही ब्रह्मांड में है। हम ब्रह्मांड से अलग नहीं हैं। ईश्वर से अलग नहीं हैं। हम तो स्वयं को ईश्वर से अलग मान बैठे हैं। जैसे तालाब का पानी या नदी का पानी मेरे गिलास का पानी नहीं है। लेकिन जब उसी तालाब या नदी का पानी ट्रीटमेंट प्लांट में स्वच्छ कर हमारे वाटर पाइप के जरिए हमारे घर में आता है तो उसे फिल्टर कर हम पीते हैं। ग्लास में रखते हैं और कहते हैं कि मेरे गिलास का पानी। यानी नदी का पानी एक खास प्रक्रिया से गुजर कर हमारा पानी हो गया। या हमारे गिलास का पानी हो गया। ठीक उसी तरह पूरे ब्रह्मांड में स्थित दिव्य ऊर्जा या ईश्वरीय ऊर्जा को हम तब तक अपना नहीं कह सकते जब तक कि एक खास विधि द्वारा उसे अपने भीतर न लाएं। यह कैसे संभव है? इसकी विधियां हैं। जिसे विभिन्न सन्यासी विभिन्न आश्रमों के माध्यम से बताते हैं। पातंजलि योग सूत्र में भी इसकी विधियां दी गई हैं। संतों ने कहा है कि हमारे मेरुदंड के चक्र और ब्रह्मांडीय चक्रों में बहुत साम्य है। जब हम अपने चक्रों को शक्तिमान करेंगे, उन्हें सक्रिय करेंगे तो समूचे ब्रह्मांड के साथ हमारा सकारात्मक तालमेल हो जाएगा और हम ईश्वर के करीब होते जाएंगे। विभिन्न मंत्रों के जाप इसमें सहायक बताए गए हैं। कुछ महात्माओं के मुताबिक- हरे राम, हरे राम, राम, राम हरे हरे। हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण हरे हरे।। मंत्र सर्वश्रेष्ठ है। इससे भक्त को ईश्वर रस में डूबने में सहायता मिलती है। जरूरी नहीं कि इस मंत्र का जाप मुंह से बोल कर ही किया जाए। मन ही मन जाप करना और ज्यादा श्रेष्ठ है। इसका आनंद वही जानता है जो इसमें डूबा हुआ है।

2 comments:

Raviratlami said...

चक्रों की बात बहुत लोग करते हैं. परंतु आज तक मुझे ऐसा व्यक्ति नजर नहीं आया जिसके चक्र खुले हों (या बंद हों?). संतों के भेष में रावण और राजनीतिबाज, मठाधीश ही नजर आए हैं. क्या आप कोई उदाहरण दे सकते हैं?

vinay bihari singh said...

जी हां, उदाहरण हैं- संत कबीरदास, तुलसीदास, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, परमहंस योगानंद, त्रैलंग स्वामी.....इत्यादि।