Thursday, October 7, 2010

जब सती माता ने स्वयं को
अग्नि में भस्म कर दिया


विनय बिहारी सिंह

एक बार सभी प्रजापतियों ने यग्य का आयोजन किया। इसमें भगवान शिव के श्वसुर दक्ष प्रजापति हिस्सा लेने पहुंचे। उन्हें देख कर सभी लोग उठ खड़े हुए क्योंकि वे अत्यंत तेजस्वी थे। देवाधिदेव भगवान शिव उनके सामने ही बैठे थे। वे अपने ध्यान में मग्न थे। इसलिए उठ कर खड़े नहीं हुए। यह देख कर दक्ष प्रजापति बहुत ही नाराज हुए। उनको लगा कि भगवान शिव बड़े अहंकारी हैं। उन्होंने कहा कि मैंने व्यर्थ ही अपनी पुत्री की शादी शिवजी से कर दी। इसके बाद दक्ष प्रजापति ने एक यग्य का आयोजन किया। इसमें सारे देवताओं को बुलाया लेकिन भगवान शिव को उन्होंने नहीं बुलाया। लेकिन माता सती को जब यह खबर मिली कि उनके पिता यग्य कर रहे हैं तो उन्होंने भगवान शिव से इसकी इजाजत मांगी। शिव जी पहले तो बिना बुलाए उन्हें न जाने की सलाह दी, लेकिन जब वे जाने की बात पर अडिग रहीं तो उन्होंने उन्हें जाने दिया। पिता के घऱ सती ने जा कर देखा कि सभी देवताओं को तो यग्य में भोग दिया जा रहा है लेकिन उनके पति को नहीं तो उन्हें दुख हुआ। उन्होंने स्वयं को अग्नि हवाले कर दिया। इसके बाद की कथा है कि भगवान शिव ने जब सती के भस्म होने खबर सुनी तो वे तत्काल वहां पहुंचे और सती के निर्जीव शरीर को फिर तैयार किया और उसे कंधे पर उठा कर क्रोध में चल पडे़। भगवान विष्णु ने उनके क्रोध को देखा तो चिंतित हो गए औऱ शिव जी का क्रोध शांत करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से सती के अंग काट काट कर अलग करने लगे। ये अंग जहां- जहां भी गिरे हैं, वहां हिंदुओं का एक तीर्थ है। जैसे- नैना देवी (जहां आंख गिरी), ज्वाला देवी (जहां जीभ गिरी) इत्यादि। लेकिन सती का भस्म होना एक प्रतीक है। दरअसल सती माता ने योग से अपने शरीर को त्याग दिया। वे किसी अग्नि में नहीं जलीं, बल्कि योगाग्नि में जलीं। और उनके निर्जीव शरीर को भगवान शिव ने उठा लिया।

1 comment:

मोहिन्दर कुमार said...

सुन्दर आध्यातमिक कथा वर्णन