Tuesday, August 17, 2010

शक्ति की देवी मां दुर्गा

विनय बिहारी सिंह

आफिस से घर लौटते हुए मैं जिस रास्ते जाता हूं उसमें एक जगह विभिन्न त्यौहारों के लिए मूर्तियां बनाई जाती हैं। इन दिनों वहां दुर्गापूजा के लिए मूर्तियां बन रही हैं। दरअसल यह प्रक्रिया तीन महीने पहले ही शुरू हो गई थी। अब मूर्तियां पूरी तरह बन कर तैयार हो गई हैं। बस रंगाई बाकी है। लेकिन ये मूर्तियां बहुत ही सजीव लगती हैं। महिषासुर की मांसपेशियां लगती हैं मानो फौलाद की हैं। लेकिन मां भगवती का शेर उसकी छाती को फाड़ने वाला है। मां भगवती का सांप महिषासुर पर हमला कर रहा है। इसके अलावा मां स्वयं महिषासुर पर अपने सारे अस्त्र चला रही हैं। मां के दस हाथ हैं। यह मैं आते- जाते रोज देखता हूं। और हर बार बहुत अच्छा लगता है। मूर्तियों के स्टूडियों में कलाकार काम कर रहे होते हैं। चूंकि यह सड़क से भी देखा जा सकता है, इसलिए इनके बनने की प्रक्रिया देखी जा सकती है। मैंने सोचा मां दुर्गा के पास प्रत्यक्ष रूप से कोई सांप तो नहीं होता। तब सांप आया कहां से। फिर याद आया- मां दुर्गा तो भगवान शिव की पत्नी कही जाती हैं। अर्द्धांगिनी। भगवान शिव के गले में सांप है (हालांकि यह प्रतीकात्मक है) । हो सकता है, वही सांप यहां आ गया हो। आखिर महिषासुर को मारने के लिए सभी देवताओं ने अपने अस्त्र मां दुर्गा को दिए थे। भगवान शिव ने अपना त्रिशूल दिया। मां तो शिव जी की अर्द्धांगिनी हैं। हो सकता है वे सांप को भी साथ लिए आई हों। मैं जितनी बार इन मूर्तियों को देखता हूं, मन जगन्माता की लीलाओं पर चला जाता है। महिषासुर कहीं और नहीं है। वह हमारे भीतर बैठा है। चाहे हम पुरुष हों या स्त्री। महिषासुर हमारा अंधेरा पक्ष है। हमारा नकारात्मक प्रवितृयां यानी भय, क्रोध, हिंसा, ईर्ष्या, द्वेष, लोभ इत्यादि। अगर हमारे भीतर मां भगवती रहेंगी तो हमारे भीतर का महिषासुर मारा जाएगा। लेकिन अगर हम महिषासुर को ही पुष्ट करते रहेंगे, तो वह बलवान होता जाएगा और अंत में हमे ही खा जाएगा। इसीलिए दुर्गापूजा की जाती है। इस पूजा में मां से प्रार्थना की जाती है- मां, मेरी रक्षा करो। मेरे भीतर के अंधेरे को खत्म करो। मुझे पवित्र करो ताकि तुम्हारा दर्शन मैं हमेशा कर सकूं और अपना जीवन निर्भय व सुखी हो कर गुजार सकूं।

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