Thursday, November 12, 2009

जर्मनी के गोलकीपर ने आत्महत्या क्यों की?

विनय बिहारी सिंह

जर्मनी के धुरंधर फुटबाल खिलाड़ी राबर्ट एनके ने कल आत्महत्या कर ली। उन्हें हमेशा डर लगता रहता था कि वे अपनी स्टार हैसियत खो न दें। कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए। यह एक मानसिक बीमारी है, जिसका इलाज सन २००२ से चल रहा था। लेकिन वे इससे उबर नहीं पा रहे थे। सबको उम्मीद थी कि वे अगले साल होने वाले वर्ल्ड कप में जर्मनी को एक खास जगह दिलाएंगे। आखिर वे स्टार खिलाड़ी थे। भौतिक दृष्टि से एक व्यक्ति के पास जो कुछ होना चाहिए उनके पास था। मेधावी और अत्यंत सुंदर पत्नी टेरेसा थी। चोटी की लोकप्रियता थी। पर्याप्त धन था। खूबसूरत मकान था और सुख के सारे संसाधन थे। फिर भी राबर्ट ने ३५ साल की उम्र में आत्महत्या कर ली क्योंकि उसे बराबर यही लगता था कि लोगों को उसकी बीमारी का पता चलेगा तो उसकी लोकप्रियता मिट्टी में मिल जाएगी। उसने एक बेटी गोद ली हुई थी। यह बेटी भी बहुत प्यारी थी। राबर्ट को डर लगा रहता था कि अगर बेटी के असली मां- बाप को उसकी बीमारी का पता चल जाएगा तो वे अपनी बेटी को वापस बुला लेंगे। कई बार उसे यह भी लगता था कि उसके पास जो इतने ऐशो- आराम की चीजें हैं, वे सब एक दिन नहीं रहेंगी। यानी असुरक्षा और भयंकर डर का शिकार था वह। उसकी पत्नी टेरेसा ने कहा है कि सबकुछ खो जाने का सवाल ही नहीं है। अनेक खिलाड़ी बीमार हुए हैं और उससे उबर कर काफी लोकप्रिय हुए हैं। और हमारा धन क्यों खत्म हो जाएगा? हम काफी सोच- समझ कर खर्च करते हैं औऱ हमेशा बचत के बारे में सोचते रहते हैं। ऐसे में डरते रहने की कोई वजह नहीं थी। इलाज भी चल रहा था। लेकिन कोई भी दवा कारगर साबित नहीं हो पा रही थी। असुरक्षा और भय। यह राबर्ट ही नहीं दुनिया के अनेक लोगों को खा जाता है। या खा रहा है। अन्यथा लाइफ इंश्योरेंस वालों का धंधा नहीं चलता। फिर भी हमारे देश में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जिन्होंने कभी अपना बीमा नहीं कराया यानी लाइफ इंश्योरेंस नहीं कराई। उनकी नियमित आमदनी नहीं है। लेकिन वे भय में नहीं जीते। वे जानते हैं कि भय से आदमी जीते जी मर जाता है। हालांकि अपने देश में भी अभाव से तंग आकर लोग आत्महत्या करते हैं, लेकिन आत्महत्या करने वालों को कायर कहा जाता है। कोई भी आत्महत्या करने वाले की प्रशंसा नहीं करता। जो डर कर हार गया और जिसने जीवन की कठिनाइयों से संघर्ष नहीं किया, वह संतुलित मनुष्य कहलाने लायक नहीं है। वह कायर है। अनेक संतों ने कहा है- आत्महत्या करने वालों को मरने के बाद भी चैन नहीं मिलता । उनकी आत्मा कष्ट पाती है, भटकती है औऱ पीड़ा झेलती रहती है। लेकिन राबर्ट के डर ने यह साबित कर दिया कि सफलता सबको आत्मविश्वास से नहीं भरती। बीमार बीमार ही रहेगा, चाहे वह सोने- चांदी की खाट पर क्यों न सोए। चाहे वह समृद्धि की चरम सीमा पर ही क्यों न पहुंच जाए। इसका एक ही उपाय है- भगवान की शरण में जाना। अगर परेशान, कष्टों से घिरा हुआ व्यक्ति अपने दिल से ईश्वर के शरणागत होता है तो सच मानिए, उसका कल्याण हो जाता है। ऐसी अनेक घटनाएं मैंने देखी है। बस ईश्वर में पक्का विश्वास होना चाहिए।

1 comment:

अंशुमाली रस्तोगी said...

और जिन्हें, जैसाकि मैं ही, ईश्वर में विश्वास ही न हो वे क्या करें? ईश्वर खुद एक भ्रम है उस पर विश्वास कर हासिल ही क्या होगा।