Wednesday, May 6, 2009

ईश्वर तो दिखाई नहीं देते, कैसे मानें कि वे हैं

विनय बिहारी सिंह

अक्सर कई लोग सवाल करते हैं कि कहां है ईश्वर? वे तो दिखाई नहीं देते। फिर हम कैसे मानें कि ईश्वर का अस्तित्व है? शुरू के दिनों में स्वामी विवेकानंद ने भी अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से कहा था- ईश्वर- फीश्वर कुछ नहीं है। मुझे तो ईश्वर का अनुभव ही नहीं होता। तब रामकृष्ण परमहंस खूब हंसे थे। वे जानते थे- यही विवेकानंद एक दिन दुनिया भर में घूम घूम कर ईश्वर से प्रेम करने को कहेंगे। वही हुआ। एक बार किसी ने एक संत से पूछा- कैसे मानें कि ईश्वर हैं? संत ने जवाब दिया- आप कौन हैं? उस आदमी ने जवाब दिया- मैं एक दफ्तर में क्लर्क हूं। संत ने कहा- नहीं। मैं आपका पद या नाम या हैसियत के बारे में नहीं पूछ रहा हूं। आप खुद को क्या समझते हैं? उस आदमी ने जवाब दिया- मैं मनुष्य हूं। संत मुस्कराए। उन्होंने कहा- आप एक जीव हैं। इस ब्रह्मांड में आप ही की तरह अरबों- खरबों जीव रहते हैं। उन्हें कौन नियंत्रित करता है? और यह जो चांद- तारे और ब्रह्मांड की सूक्ष्म और प्रकट गतिविधियां हैं, उन्हें कौन नियंत्रित करता है? उस आदमी ने जवाब दिया- जरूर कोई बहुत बड़ी शक्ति है, जो नियंत्रित करती है। संत ने कहा- उसी बड़ी शक्ति को हम ईश्वर कहते हैं। उस आदमी ने प्रश्न पूछा- क्या हम ईश्वर को देख सकते हैं? संत ने कहा- जरूर। उस आदमी ने पूछा- कैसे? संत ने कहा- जब आपके भीतर उसे देखने की प्रबल इच्छा पैदा होगी और दिन- रात आप उससे प्रार्थना करेंगे कि- दर्शन दीजिए भगवन, दर्शन दीजिए। आपके बिना कुछ अच्छा नहीं लगता। जब ईश्वर को यह विश्वास हो जाएगा कि आप उसके अलावा और कुछ नहीं चाहते तो वे दर्शन देंगे। लेकिन होता यह है कि हम ईश्वर के बदले घर, कार, धन और ख्याति चाहते हैं। ईश्वर को सबसे अंत में चाहते हैं। तब तो बात नहीं बनेगी। परमहंस योगानंद जी कहते थे- भक्त को बिल्कुल बच्चे की तरह रोना पड़ेगा तब जगन्माता दर्शन देंगी। जब तक उन्हें यह नहीं पता चलेगा कि अमुक भक्त उनके अलावा कुछ नहीं चाहते, तब वे अपने आप दर्शन देंगे। उस आदमी ने पूछा- ईश्वर छुपे हुए क्यों रहते हैं? संत ने कहा- वे चाहते हैं कि उनके बच्चे यानी हम उन्हें खोजें। इसीलिए वे छुपाछुपी का खेल खेलते हैं। सच्चाई यह है कि वही हमारे सबकुछ हैं। वही हमारे माता, पिता, बंधु और मालिक हैं। लेकिन रहते हैं छुप कर। आप उन्हें दिल से पुकारिए, वे आज नहीं तो कल जरूर दर्शन देंगे। लेकिन अगर आपके मन में तनिक भी शंका है कि प्रार्थना तो कर रहा हूं, पता नहीं ईश्वर दर्शन देंगे कि नहीं तो आपको वे दर्शन नहीं देंगे। उन्हें तो बस निश्छल, दृढ़ और गहरी श्रद्धा चाहिए। जहां किसी भक्त ने उन्हें गहरा प्रेम दिया, वे तुरंत उस भक्त के पास आ जाते हैं। वे कहते हैं- भक्त हमारे, हम भक्तन के। लेकिन गहरा प्रेम कैसे हो? गहरा प्रेम तभी होगा जब आप ईश्वर के प्रेम को समझेंगे। कैसे? आप आप उनसे आठ आना प्रेम करेंगे तो वे आपसे १६ आना प्रेम करेंगे। आप उनसे एक पैसा प्रेम करेंगे तो वे आपसे उसके दो गुना प्रेम करेंगे। यही ईश्वर का नियम है। क्यों न हम ईश्वर से प्रेम करें और उसके प्रेम की अतल गहराई में डूबते जाएं?