Monday, January 30, 2012

श्रद्धावान लभते ज्ञानम

विनय बिहारी सिंह



भगवत् गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- श्रद्धवान लभते ज्ञानम....। जिस साधक में गहरी श्रद्धा है, भगवान को वही जान सकेगा। जो दिन रात संशय में रहता है, उसका मन स्थिर नहीं हो पाता। भगवान को जानने के लिए मन और शरीर की स्थिरता जरूरी है। इसीलिए पातंजलि योग सूत्र में प्रारंभ में ही कहा गया है- योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है। यानी जब तक चित्त की वृत्तियां शांत नहीं होंगी, योग संभव नहीं है। ज्यादातर लोगों का चित्त चंचल रहता है। गीता में भगवान ने कहा है कि जब तक इंद्रियां शांत नहीं होंगी, चित्त शांत नहीं होगा। इसीलिए ऋषियों ने कहा है कि भक्त को चाहिए कि अपनी इंद्रियां, मन और बुद्धि भगवान को समर्पित कर दे। फिर उसे कोई चिंता नहीं। उसके रक्षक भगवान हो गए। भक्त जितनी देर ध्यान में बैठेगा, भगवान के बारे में ही सोचेगा। जैसे समुद्र में मिलने के बाद नदी अपना अस्तित्व खो देती है, ठीक उसी तरह भक्त जब भगवान में मिलता है तो वह ईश्वरमय हो जाता है।

Friday, January 27, 2012

वामाखेपा का चित्र

विनय बिहारी सिंह




आज दफ्तर आते हुए बस में एक मनोहारी चित्र देखा। बस के सामने यह चित्र लगा था। इसमें विख्यात संत वामाखेपा मां तारा (मां काली का ही एक रूप) की निकली हुई जीभ के पास फूल और मिठाई लेकर खड़े हैं। उनका बायां हाथ मां के कंधे पर है। सच है। वामाखेपा मां तारा के ध्यान में दिन- रात मग्न रहते थे। जब तक वे मां को नहीं खिलाते थे, स्वयं नहीं खाते थे। जब तक उनसे बातें नहीं करते थे, उन्हें कुछ अच्छा नहीं लगता था। चित्र में जिस आदर और आत्मीय भाव से वे मां तारा को प्रसाद खिलाने के लिए तत्पर दिख रहे हैं, वह अद्भुत है। भक्ति हो तो ऐसी। कल रामकृष्ण वचनामृत के कुछ अंश मैं अपने पिता जी को पढ़ कर सुना रहा था। वे इसे बड़े चाव से सुनते हैं। खुद तो पढ़ नहीं सकते। आंखों ने काम करना बंद कर दिया है। एक प्रसंग में रामकृष्ण परमहंस कहते हैं- छत पर चढ़ना है तो आप पक्की सीढ़ी से भी चढ़ सकते हैं। बांस की सीढ़ी से भी चढ़ सकते हैं। रस्सी से भी चढ़ सकते हैं। यानी आप चाहे साधना का कोई मार्ग चुनें, वह भगवान के पास ही जाता है। चाहे भक्ति मार्ग हो, ज्ञान मार्ग हो या कर्मयोग मार्ग हो- बस उसे पूरे मन-प्राण से पकड़ना चाहिए। पूरा जोर लगा कर। आप साधना में सिद्ध हो जाएंगे। रामकृष्ण परमहंस ने कहा है- निवृत्ति मार्ग ही अच्छा है। प्रवृत्ति मार्ग ठीक नहीं। यानी मन स्थिर और इच्छारहित हो। पवित्र हो। तब काम बन जाता है।

Monday, January 23, 2012

मेरे प्रभु

विनय बिहारी सिंह



अपनी छाती से
एक बार लगा लो
हे प्रभु
महसूस करना चाहता हूं
मैं आपकी उपस्थिति

जानता हूं
आप हैं इंद्रियातीत
और मैं इंद्रियोन्मुखी
तो राख हो जाएं
मेरी इंद्रियां

पर मुझे प्रेम करो
मेरे प्रभु
मुझे लगा लो
अपनी शांतिदायक, आह्लादकारी
सूक्ष्म छाती से।।

Saturday, January 21, 2012

जगन्माता हर जगह

विनय बिहारी सिंह




प्राचीन काल के विख्यात काली भक्त रामप्रसाद ने कहा है कि जगन्माता हर जगह हैं। लेकिन जो अंधे हैं, वे देख नहीं पाते। अंधे से उनका तात्पर्य उनसे है जो भक्त नहीं हैं। वे कहते थे- कौन कहता है कि ईश्वर नहीं हैं। वे इस सृष्टि के कण कण में विद्यमान हैं। एक पत्ता तक नहीं हिलता उनकी मर्जी के बिना। और कई लोग कहते हैं कि कहां है भगवान? अरे भाई, तुम्हारी आंखों पर पर्दा लगा हुआ है। तुम अंधे हो गए हो। हटाओ प्रपंच का पर्दा। यह पर्दा तभी हटेगा जब जगन्माता की भक्ति में गहरे डूब जाओगे। जगन्माता बड़ी कृपालु हैं। वे अपने भक्त की पीड़ा सहन नहीं कर पातीं। वे भक्त की मदद करने को आतुर रहती हैं। मां तो तभी बच्चे तो दूध पिलाती है जब वह रोता है। भक्त की मदद जगन्माता तो हमेशा करती रहती हैं। लेकिन जब भक्त पुकारता है तो मां को अच्छा लगता है। कौन सी ऐसी मां होगी जिसे अपने बच्चे का पुकारना अच्छा नहीं लगता होगा? ठीक इसी तरह जगन्माता को भी हमारी पुकार अच्छी लगती है। वे चाहती हैं कि हम उनको पुकारें। लेकिन हम हैं कि जगत प्रपंच में पड़े रहते हैं। जगन्माता सचमुच हर जगह मौजूद हैं। वे अत्यंत कृपालु हैं।

Friday, January 20, 2012

मन अंधा

विनय बिहारी सिंह




संतों ने कहा है कि मन अंधा होता है। वह ज्यादातर इंद्रियों के वश में होता है। इंद्रियां कहती हैं कि अमुक चीज चाहिए, मन उन्हीं इंद्रियों का कहा सुनने लगता है। विवेक का उससे कोई लेना देना नहीं है। इसलिए संतों ने कहा है कि मन जो कुछ कहता है, जो कुछ मांगता है, उस पर एक बार सोचिए। देखिए कि इससे आपको क्या फायदा होगा। कहीं मन सिर्फ सनकीपन के चलते तो किसी चीज में नहीं अंटका है? अगर ऐसा है तो आपके लिए यह खतरनाक है। गीता में भगवान ने कहा है- मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु। यदि वह विवेक से काम करता है तो स्वयं का मित्र है और यदि इंद्रियों के वश में है तो वह स्वयं अपना शत्रु है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि मन को नियंत्रण में रखना बहुत जरूरी है। यह बेलगाम घोड़े की तरह है और बेमतलब जहां तहां दौड़ता रहता है। अनावश्यक दौड़ लगाता है। जिस चीज के बारे में सोचने से कोई फायदा नहीं मन वहां भी दौड़ लगाता रहता है। इसका अर्थ है- मन बेलगाम है। उस पर लगाम लगाना जरूरी है। मन जो कुछ कहेगा उसे हम क्यों मानें? भक्त यह सोचता है कि मैं मन नहीं हूं। मैं इंद्रिय नहीं हूं। मैं तो सच्चिदानंद आत्मा हूं। मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयो। मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है। तो क्यों नहीं इसे नियंत्रण में रखा जाए। हां, यह आसान काम नहीं है। क्योंकि मन अब तक बिना नियंत्रण के दौड़ता रहा है। उसे आप अचानक नियंत्रित करेंगे तो वह विद्रोह करेगा और आपको दबोच लेना चाहेगा। लेकिन यदि धैर्य के साथ धीरे- धीरे उसे काबू में रखा जाएगा तो वह हमारी सुनने लगेगा। तब हम मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने लगेंगे।

Wednesday, January 18, 2012

छंद में रहना चाहिए वरना द्वंद्व में रहना पडे़गा

विनय बिहारी सिंह



आज एक साधु ने कहा- ईश्वर छंद हैं, बाकी सब कुछ द्वंद्व है। सुन कर बहुत अच्छा लगा। साधु का कहना था- छंद का अर्थ है ईश्वर के प्रेम में पड़ जाना। उन्हीं के लिए जीना। उनका ही चिंतन करना। संसार का काम करिए लेकिन भगवान को दिल में रखिए। रामकृष्ण परमहंस ने कहा है- जैसे कोई स्त्री अपने प्रेमी के लिए तड़पती रहती है, जैसे मां किसी कारण से दूर गए अपने बच्चे को देखने के लिए तड़पती रहती है, उसी तरह ईश्वर के लिए तड़पना चाहिए। यही है- छंद। जैसे कोई नौकरानी किसी के घर काम करती है और घर के मालिक के बच्चे को दुलारती है और कहती है- यह मेरा सोना है... मेरा लाडला है। लेकिन मन में वह जानती है कि उसका अपना बेटा तो घर पर है। उसका दिल और दिमाग अपने बेटे में रहता है। ठीक उसी तरह संसार का काम करना चाहिए और दिल व दिमाग भगवान में लगाए रहना चाहिए। यही छंद से भरा जीवन है। यदि जीवन में छंद का अभाव हो गया तो जीवन द्वंद्व बन जाएगा। ये दो शब्द- छंद और द्वंद्व सचमुच कितने महत्वपूर्ण जान पड़ते हैं। या तो छंद में रहिए या द्वंद्व में। दुनिया में कोई भी द्वंद्व में नहीं रहना चाहता। तनाव में नहीं रहना चाहता। सभी प्रेम और शांति से रहना चाहते हैं। साधु ने कहा- ईश्वर से मिलन कीजिए। वहीं है अनंत प्रेम और अनंत शांति।

Tuesday, January 17, 2012

रात को जप

विनय बिहारी सिंह




सभी संतों ने कहा है कि जप या प्रार्थना के लिए रात का समय सबसे अच्छा होता है। लोग सो रहे होते हैं और वातावरण में शांति व्याप्त रहती है। ऐसे समय में एकाग्रता बढ़ जाती है। रात को गहरी एकाग्रता के साथ भगवान से प्रार्थना का प्रभाव बहुत ज्यादा होता है। किस प्रार्थना का प्रभाव ज्यादा होता है? संतों ने कहा है- सिर्फ एक ही प्रार्थना करना चाहिए- प्रभु, मुझे दर्शन दीजिए। आशीर्वाद दीजिए। बस। इसी से हमारा काम बन जाएगा। एक प्रसिद्ध लघु कथा है- एक व्यक्ति रोज चर्च जाता था और गहरे ध्यान में बैठ जाता था। एक दिन चर्च के एक इंचार्ज ने उनसे प्रेम से पूछा- आप आंखें बंद करके करते क्या हैं? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया- मैं भगवान से बातें करता हूं। तब चर्च के इंचार्ज ने उनसे पूछा- तो भगवान आपसे क्या कहते हैं? उस आदमी ने उत्तर दिया- वे मेरी बातें ध्यान से सुनते हैं। इस संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो बिना किसी स्वार्थ के आपकी बातें सुने। परमहंस योगानंद जी कहते हैं- जब हर आदमी आपको त्याग देता है तो सिर्फ भगवान ही आपके साथ रहते हैं और आपको प्रेम करते हैं।