Thursday, March 31, 2011

निःस्वार्थ प्रेम



विनय बिहारी सिंह

किसका प्रेम निःस्वार्थ होता है? कोई भी कहेगा- मां का। मां अपने बच्चे को खुश देख कर ही खुश रहती है। उसे और कुछ नहीं चाहिए। इसी तरह एक और संबंध है। ईश्वर और भक्त का। लेकिन यहां ध्यान देना आवश्यक है कि भक्त भगवान से इसलिए प्यार करता हो क्योंकि वही उसके माता, पिता, मित्र और हितैषी हैं। इसलिए नहीं कि वह भगवान से धन, पद और यह या वह मांगता रहता है। ऋषियों ने कहा है कि भगवान को वह भक्त सबसे ज्यादा प्रिय होता है जो उनसे और कुछ न मांगे, सिर्फ वह कहे- भगवान मैं तुमको चाहता हूं। ऐसा भक्त जानता है कि वह इस दुनिया में इसलिए आया है ताकि भगवान को प्राप्त कर सके। या कम से कम इसके लिए हृदय से प्रयत्न कर सके। भगवान कहते हैं कि जो भक्त मुझे पाने के लिए प्रयत्न करता है, उसकी हर कोशिश मैं नोट करता जाता हूं। ऋषियों का कहना है कि भगवान को प्राप्त नहीं करना है, वे तो आपके भीतर हैं, बाहर हैं सर्वत्र हैं। बस आपको इसे महसूस करना है। इसी को दूसरे शब्दों में भगवान को पाना कहते हैं। तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है- राम राम कहि जे जमुहांहीं। तिनहि न पाप पुंज समुहाहीं।। जो हृदय से राम, राम कहते रहते हैं, उनके पास बुरे विचार फटकते तक नहीं। लेकिन राम की यह पुकार गहरे अंतर्मन से होनी चाहिए। जैसे कि आप भगवान के अलावा कुछ और न चाहते हों। रामकृष्ण परमहंस कहते थे- स्त्री, पुरुष, धन, चाहत के लिए तो सब रोते हैं, भगवान के लिए कौन रोता है? भगवान तो उसी को मिलते हैं जो उनके लिए अंतर्मन से रोता हो।

2 comments:

मीनाक्षी said...

ईश्वर माता पिता होकर भी दर्द क्यों देता है... उसी दर्द को लोग अभिशाप का नाम क्यों दे डालता है...

वन्दना said...

सच कह रहे है आप भगवान उसे ही मिलते हैं जो उसके लिये अन्तर्मन से रोता है और वो कोई विरला ही होता है। आजकल वो भक्त दुर्लभ होते जा रहे हैं।