Tuesday, March 15, 2011

राजा हरिश्चंद्र की याद में


विनय बिहारी सिंह

राजा हरिश्चंद्र की कथा अत्यंत रोचक लेकिन गहरी सीख देने वाली है। ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र से दान में पूरा राजपाट मांग लिया। राजा ने उन्हें अपना संपूर्ण राज्य दे दिया। फिर ऋषि ने उनसे अपना दक्षिणा मांगा। अब उनके पास था ही क्या कि वे देते, पूरा राजपाट तो दे दिया था। इसलिए वे काशी गए और पत्नी तारा और पुत्र रोहतास को एक ब्राह्मण के हाथों बेच दिया। फिर भी दक्षिणा के लिए पूरा धन नहीं जुटा। तब राजा ने खुद को श्मशान के डोम राजा के हाथों बेच दिया। राजा की पत्नी और बेटा ब्राह्मण की नौकरी करने लगे और राजा हरिश्चंद्र श्मशान में जलाए जाने के लिए लाई जाने वाली लाशों पर टैक्स वसूलने की नौकरी करने लगे। ब्राह्मण ने राजा की पत्नी और बेटे को फूल चुनने का काम दिया। फूल चुनते हुए रोहतास को सांप ने डंस लिया और उसका देहांत हो गया। राजा हरिश्चंद्र की पत्नी रोते- बिलखते हुए श्मशान पहुंची। वहां उसके पति ने लाश जलाने का टैक्स पत्नी से मांगा। पत्नी के पास था ही क्या। लेकिन राजा श्मशान के नियम से बंधे थे। उन्हें अपने ही पुत्र के अंतिम संस्कार के लिए अपनी पत्नी से टैक्स मांगा। असहाय पत्नी ने अपनी पहनी हुई साड़ी फाड़ी और शोक में वहीं मृत हो कर गिर पड़ी। राजा ने अपनी पत्नी और बेटे के लिए चिता की तैयारी शुरू की तभी आकाश से दिव्य आवाज आई- आप धन्य हैं हरिश्चंद्र। आपकी जय हो। सभी देवताओं ने राजा हरिश्चंद्र पर फूलों की वर्षा की। रानी तारा और पुत्र रोहतास जीवित हो गए। राजा, रानी और उनके पुत्र के लिए पुष्पक विमान आया। रानी और पुत्र तो बैकुंठ में चले गए लेकिन राजा ने कहा- मेरे बदले आप बैकुंठ में मेरे अयोध्या के लोगों को भेज दीजिए। भगवान ने अयोध्या के सभी
लोगों को बैकुंठ भेज दिया। अंत में उन्होंने राजा हरिश्चंद्र को भी आदर के साथ बैकुंठ भेज दिया। यह कथा उन लोगों के लिए सीख है जो अधिकार के पदों पर बैठे हैं। एक राजा का चरित्र कैसा होना चाहिए, यह इस प्रसिद्ध कथा का मूल संदेश है।

5 comments:

सुशील बाकलीवाल said...

अत्यन्त प्रेरणास्पद. आभार...

टिप्पणीपुराण और विवाह व्यवहार में- भाव, अभाव व प्रभाव की समानता.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

अच्छा राजा सभी को बैकुंठ ले जाता है बुरा सभी को नर्क।

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा पढ़कर..

किलर झपाटा said...

आदरणीय दादाजी,
इसी तरह के चरित्रों की वजह से राजा आजकल लुप्तप्राय हो गये हैं, चाहे वे मानव राजा हों या फिर जंगल के राजा। हा हा। एम आय राँग ?
बुरा ना मानिये होली है।

dhanaji said...

अच्छा लगा पढ़कर