Saturday, November 21, 2009

प्रदूषण से कैसे नुकसान होता है हमारा

विनय बिहारी सिंह

कोलकाता महानगर इन दिनों गंभीर रूप से प्रदूषित है। हवा में जो प्रदूषण फैल रहा है उसे विग्यान की भाषा में पार्टीकुलेट मैटर या पीएम कहते हैं। यह पीएम ही शरीर में तमाम तरह की बीमारियां पैदा करता है और मनुष्य की असमय मौत हो जाती है। यह कैसे होता है? आमतौर पर गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले डीजल या पेट्रोल के धुएं से या पावर प्लांट से निकले धुएं वगैरह से। इस पीएम से मनुष्य को कैंसर भी हो सकता है। आखिर पीएम किस चीज का होता है? यह नाइट्रोजन आक्साइड या बेंजीन के खतरनाक कण होते हैं। इससे हड्डी की बीमारी तो होती ही है, हृदय, फेफड़ों, रक्त और मांसपेशियों का रोग भी हो सकता है। कोलकाता में हवा में नाइट्रोजन आक्साइड होना चाहिए ४० माइक्रोग्राम और इस समय वह है ६५ माइक्रोग्राम से भी ज्यादा। इसी तरह बेंजीन की मात्रा होनी चाहिए ५ माइक्रोग्राम लेकिन वह है ३५.६ माइक्रोग्राम। यह आटोमेटिक हाइड्रोकार्बन शरीर को बुरी तरह क्षतिग्रस्त करता है। डाक्टरों का कहना है कि पीएम भी दो तरह का होता है। पीएम १० और पीएम २.५०। तो पीएम १० फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है औऱ इससे प्रभावित व्यक्ति को कफ से परेशान करता है और गले में खराश रहती है। लेकिन पीएम २.५० और घातक है। यह फेफड़ों को बुरी तरह क्षतिग्रस्त करता है। एक डाक्टर का कहना है कि बेंजीन और नाइट्रोजन आक्साइड से हृदय की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं औऱ हृदय से निकलने वाली इलेक्ट्रिक करेंट कमजोर होने लगती है। ऐसे में व्यक्ति को हृदय रोग का शिकार हो जाता है। ये दोनों खतरनाक तत्व अगर आपके खून में प्रवेश करते हैं और आपको शरीर संबंधी तमाम परेशानियां शुरू हो जाती हैं। जो धूम्रपान नहीं करते उन्हें भी फेफड़ों का रोग धर दबोचता है। इससे बचने का उपाय क्या है? आप अगर महानगर में रहते हैं तो नौकरी या व्यवसाय छोड़ कर अचानक तो जा नहीं सकते। तो जरूरत है पर्यावरण के प्रति सचेत लोगों की जो बार- बार सरकार का ध्यान इधर खींचें। (आज के बाद ३ दिसम्बर को भेट होगी)

इटली की एक रोचक घटना

विनय बिहारी सिंह


यह घटना मुझे एक सन्यासी ने सुनाई। उनका नाम है स्वामी अमरानंद जी। वे दिन- रात ईश्वर में डूबे रहते हैं और अपने नाम के अनुरूप भगवान के अमर आनंद का रस पीते रहते हैं। उन्होंने बताया- इटली में एक घर में बच्चा पैदा हुआ। इस बच्चे की एक १० साल की बहन थी। बच्चा बहुत प्यारा था। कुछ दिनों बाद इस बच्चे की बहन ने अपने मां- बाप से आग्रह किया कि वह अपने भाई को पास जाकर प्यार करना चाहती है। मां- बाप पहले तो डरे कि कहीं सगे भाई- बहनों के बीच प्यार का बंटवारा होने से यह बच्ची नाराज न हो औऱ अपने भाई को कोई नुकसान न पहुंचा दे। बच्ची ने जब कहा कि वह तो अपने भाई को बहुत प्यार करती है। उसके बाल सुलभ आग्रह के आगे मां- बाप पिघल गए और उसे अपने भाई से मिलने दिया। बच्ची अपने नन्हें से भाई के पास गई औऱ दरवाजा बंद कर दिया। मां- बाप बहुत उत्सुक हुए। वे दरवाजे के फांक से अंदर झांकने लगे। बच्ची अपने भाई के कान के पास मुंह ले गई औऱ बोली- मेरे भाई। भगवान देखने में कैसे लगते हैं? तुम तो ताजा ताजा देख कर आ रहे हो। वे क्या कहते हैं? जरा बताओ। मैं तो बड़ी हो कर भूल गई हूं। बस धुंधली सी याद है। प्लीज भाई, बताओ न। यह कह कर बहन बच्चे को दुलारने लगी। मां- बाप उसकी बातें सुन कर स्तब्ध रह गए। (आज के बाद आपसे ३ दिसंबर को भेंट होगी। तब तक के लिए सबको नमस्कार- विनय बिहारी सिंह।

Friday, November 20, 2009

ईश्वर पर अपनी शर्तें मत थोपिए

विनय बिहारी सिंह

हममें से अनेक लोग पूजा- पाठ करते हैं या ध्यान करते हैं तो लगातार भगवान से अपनी मांग पूरी करने के लिए आग्रह करते रहते हैं। यह भी चाहते हैं कि भगवान एक खास ढंग से हमारी मांग पूरी करें। यानी सब कुछ हमारी मर्जी से हो। कई लोग तो मांग पूरी नहीं होने पर कहने लगते हैं कि भगवान है ही नहीं। वे कहते हैं- भगवान इत्यादि कुछ नहीं है। यह सब मन का भ्रम है। कुछ नहीं। यह संसार अपने आप चल रहा है। है न मजेदार बात। लेकिन हम कौन होते हैं भगवान पर अपनी शर्तें लागू करने वाले? यह संसार उसका है। हम उसके हैं। वह चाहे जैसे हमारी मांग पूरी करे या न करे, यह उसकी मर्जी। हम क्यों कहें कि भगवान हमारी मांग आप इस ढंग से पूरी कीजिए? हम बस यही कह सकते हैं कि भगवान, आप कृपा कर मेरा यह काम कर दीजिए। वे कैसे करेंगे, यह वे जानें। बस हो गया। आपका काम यहीं पूरा हो गया। एक महात्मा का कहना है कि अगर आपने अपने दिल से किसी काम के लिए लगातार प्रार्थना की है औऱ वह काम पूरा नहीं हुआ तो यह मान कर चलिए कि उस का उस समय न होना ही अच्छा था। लेकिन इतना तय है कि जब आप प्रार्थना करते हुए आकाश- पाताल एक कर देंगे तो निश्चय जानिए आपका काम होगा। अगर आप किसी का कल्याण चाहते हैं, या आपकी मांग पूरी होने से अगर किसी का नुकसान न हो तो ऐसी मांग भगवान अवश्य पूरी करते हैं।

Wednesday, November 18, 2009

हारिए न हिम्मत, बिसारिए न राम

विनय बिहारी सिंह

कहावत है कि हारिए न हिम्मत, बिसारिए न राम। परमहंस योगानंद ने कहा है- आपका जीवन कैसा बनता है, यह आपकी सोच पर निर्भर करता है। लोग अपने लक्ष्य को पाने के लिए ३० साल ३५ साल तक लगे रहते हैं। वे जितनी बार भी असफल होते हैं, उनमें पिछली बार से दुगुनी ताकत आ जाती है, उत्साह आ जाता है। असफल होने के बाद जो लोग निराश या दुखी होते हैं, वे संघर्ष का मजा नहीं ले सकते। जो आदमी मुसीबतों या तकलीफों में भी चट्टान की तरह डटा रहता है, वही बाद में सफलता का स्वाद चखता है। सहज कुछ भी पा कर आप उसका उतना मजा नहीं ले सकते जितना संघर्ष करने के बाद। इसका अर्थ यह नहीं है कि यहां दुख या तकलीफ को महिमामंडित किया जा रहा है। नहीं, बिल्कुल नहीं। लेकिन ऐसे भी लोग हैं जो जरा सी तकलीफ या कष्ट में बेचैन हो जाते हैं, हारने लगते हैं और उनको लगता है कि यह तो तकलीफों का पहाड़ टूट गया। लेकिन जैसे ही आप अपने से भी ज्यादा तकलीफ झेल रहे लोगों की तरफ देखते हैं तो आपको लगता है कि आपकी तकलीफ तो कुछ भी नहीं है। आप तो आराम से दो वक्त का भोजन कर रहे हैं। नाश्ता कर रहे हैं। ऐसे भी लोग हैं जो आपसे दुगुनी तकलीफ झेल कर भी ठीक से भोजन नहीं कर पाते। नाश्ता की तो बात ही छोड़ दी जाए। मनुष्य का जीवन विभिन्नताओं से भरा हुआ है। हर आदमी का तनाव अलग है औऱ उसे लगता है कि सबसे ज्यादा परेशान या दुखी वही है। बाकी लोग तो मजे में हैं। लेकिन कहावत है न- दूर के ढोल सुहावन। दूसरे को देख कर मन में यह सोचना कि अगला सुखी है, गलतफहमी भी हो सकती है। इसलिए जिसका यह संसार है, क्यों न उसी की याद की जाए। उसने चाहे जो सोच कर यह संसार बनाया, इतना तो तय है कि हम उसकी संतानें हैं। अपनी संतान की वह नहीं सुनेगा तो किसकी सुनेगा? हमने तो कहा नहीं था कि हमें इस नाम से इस रूप में अमुक जगह पैदा करो। भगवान ने खुद ही यह सब किया। हम इसके पहले कहां थे, यह याद भी नही है। तो जो सब जानता है, सर्वग्याता है, उसी की शरण में जाएं। यही तर्कसंगत और आसान भी है। सभी प्राचीन संतों औऱ ऋषि- मुनियों ने कहा है- जो इस ब्रह्मांड का मालिक है, उसी से सीधे संपर्क कीजिए। बस काम बन जाएगा।

Tuesday, November 17, 2009

आखिर बुढ़ापा स्थगित करने का उपाय ढूंढ़ ही निकाला

विनय बिहारी सिंह

इंग्लैंड के अल्बर्ट आइंटाइन कालेज आफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने आखिर बुढ़ापे को बहुत दिनों तक स्थगित रखने का उपाय ढूंढ़ ही निकाला। उन्होंने कहा है कि जब शरीर की कोशिकाएं मरने लगती हैं तो मनुष्य के शरीर में झुर्रियां पड़ना शुरू हो जाती है। जब शरीर की कोशिकाएं विभाजित होती हैं तो उनमें स्थित टेलोमियर्स नामक तत्व कम पड़ता जाता है। नतीजा यह है कि वह कोशिका विभाजित होते होते मर जाती है। इन शोधकर्ताओं ने डीएनए का परीक्षण बहुत गहराई से करने के बाद पाया है कि अगर टेलोमियर्स को हमेशा के लिए टोन अप रखा जाए तो बुढ़ापा टल जाएगा या नहीं आएगा। तो टेलोमियर्स को टोन कैसे किया जाए? शोधकर्ताओं का कहना है कि इसका भी उपाय है। शरीर में कुछ खास रसायनों के संतुलन से और कुछ रसायनों को शरीर में प्रवेश करा देने से काम बन जाएगा। तब आप ७० साल के व्यक्ति को भी भ्रम से ५० साल का व्यक्ति समझ लेंगे। शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अगर आदमी खुश रहे तो भी शरीर चमकदार चेहरे वाला रह सकता है। हम सभी च्यवन ऋषि के बारे में जानते हैं। उनका भी कायाकल्प अश्विनी कुमारों ने किया था। वर्षों तक घनघोर तप के कारण उनके शरीर के चारो ओर मिट्टी का घेरा हो गया था। सिर्फ उनकी आंखों वाले स्थान पर दो छेद थे। एक राजा की कन्या अपने पिता के साथ वहां घूमते हुए आई और उत्सुकतावश उसने च्यवन ऋषि की आंखों वाले छेद में एक लकड़ी से खोद दिया। ऋषि की आंखों से धाराधार खून गिरने लगा। उनकी समाधि टूटी। चारो तरफ की मिट्टी अचानक हट गई और ऋषि ने राजा को पुकारा। राजा ने घटना जान कर माफी मांगी। ऋषि ने कहा कि वे इस कन्या से विवाह करेंगे। तेजस्वी ऋषि का प्रताप राजा को मालूम था। उन्होंने अपनी पुत्री को ऋषि से शादी के लिए राजी कर लिया। वयोवृद्ध ऋषि के साथ उसका विवाह हुआ। तब ऋषि ने अश्विनी कुमारों का आह्वान किया। वे आए और ऋषि का कायाकल्प किया। अब ऋषि २० वर्ष के युवा की तरह दिखने लगे। यहां से उनका पारिवारिक जीवन शुरू हो गया। उन्हीं के नाम पर आयुर्वेद की दवा बनाने वाले च्यवनप्राश बनाते हैं। कहने का अर्थ यह कि यह शोध कोई नया नहीं है। हमारे ऋषि- मुनि बहुत पहले से कायाकल्प की कला जानते थे।

Monday, November 16, 2009

भाग्य का नाम गोपाल है

विनय बिहारी सिंह

बांग्ला में एक बहुत ही सुंदर कहावत है। यह कहावत किसी संत के कथन से निकली है। कहावत है- कपालेर नाम गोपाल। इसका अर्थ है- भाग्य का नाम गोपाल (ईश्वर) है। इस संत की पुस्तक की बहुत ही पुरानी फटी हुई पांडुलिपि पढ़ने को मिली। इसलिए उनका नाम और किताब का नाम वह भाई नहीं बता सके जिनकी आलमारी में यह पड़ी हुई थी। लेकिन है गजब की पुस्तक। संत ने कहा है- आप भाग्य को लेकर हमेशा रोते मत रहिए। या अपने भाग्य को कोसते मत रहिए। अपनी नौकरी, अपने परिवेश, अपने पति या पत्नी या दोस्त या पड़ोसी को लेकर कुढ़ते मत रहिए। तो क्या करें? संत ने लिखा है- जो भी चीज आपके पास है या आपको मिली हुई है। उसका एक कारण है। क्या कारण है? ईश्वर आपको कुछ सबक सिखाना चाहते हैं। आपने विगत में जो काम किए हैं, उसका रिएक्शन अभी या महीने, दो महीने, आठ महीने बाद जरूर मिलेगा। हमारे कर्म हमारा पीछा करते रहते हैं। इन्हीं कर्मों के कारण आपको प्यार या घृणा या कटु वाक्य या झगड़ा या मनमुटाव या तनाव है। इनसे सीखिए। ये खराब या अच्छी परिस्थितियां आपको सबक सिखाने के लिए आपको मिली हैं। सभी जानते हैं कि एक न एक दिन सबको मरना है। लेकिन लोग इस सच्चाई को याद नहीं रखते। बार- बार प्रपंच में फंसे रहना चाहते हैं। ५०, ६० ७० या १०० साल बाद मरना ही है हमको। तब फिर? इस पर कुछ लोग सवाल करते हैं कि अगर मरना है तो क्या आनंद लेना छोड़ दें? नहीं कौन कहता है कि आनंद लेना छोड़ दीजिए। लेकिन प्रश्न है कि आप आनंद किसको कहते हैं और असली आनंद कहां छुपा है? अगर आप शराब पीने और जुआ खेलने को आनंद कहते हैं, गप्प हांकने को आनंद कहते हैं तो माफ कीजिए यह आनंद नहीं है। एक भाई ने कहा कि गप्प हांकना भी स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। जी नहीं। यह हमारे लिए जहर है। मीठा जहर। ज्यादातर गप्प के बहाने पर निंदा ही होती है। कौन कैसा है, इसी पर चर्चा होती है। या अगर नहीं भी होती है तो समय बरबाद क्यों किया जाए? आप पूछेंगे कि क्या करें? कोई अच्छी किताब पढ़ सकते हैं। किसी रचनात्मक योजना पर सार्थक बातचीत कर सकते हैं। प्रेरणादायी पुस्तक पढ़ सकते हैं। किसी सफल व्यक्ति से उसके जीवन के सबक को सुन सकते हैं। ऐसे सफल व्यक्ति निश्चय ही आपके आसपास होंगे या नहीं तो उनकी पुस्तकें तो हैं ही। कुछ लोग तो खुद को समृद्ध करने के लिए आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं। तो भाग्य का नाम गोपाल है। यानी अगर आप अपना भाग्य ईश्वर को समर्पित कर देंगे तो वे आपका भाग्य बदल देंगे। इसका क्या अर्थ हुआ? अर्थ यह है कि भाग्य वाग्य कुछ नहीं होता। जो कुछ होता है वह ईश्वर ही है। आप ईश्वर की शरण में जाइए और भाग्य को भूल जाइए। वे तो बिगड़ी बनाने वाले हैं। उनका नाम ही है अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी यानी भगवान। भाग्य का नाम भगवान। यानी वे कभी भी आपके ऊपर कृपा कर सकते हैं। बस निरंतर उनका स्मरण कीजिए। उनसे प्यार कीजिए।

Friday, November 13, 2009

ईश्वर के सर्वव्यापी होने का लाभ

विनय बिहारी सिंह

जब राक्षस हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद से पूछा- तेरा भगवान कहां है? उसने प्रह्लाद को खंभे में बांध दिया था क्योंकि वह ईश्वर भक्त था। हिरण्यकश्यप कहता था कि वह अपने पिता का नाम जपे, उसकी पूजा करे। कृष्ण, कृष्ण रटना तो पागलपन है। उसने पूछा कहां है तेरा भगवान? और तलवार से उसकी हत्या करनी चाही। तो प्रह्लाद ने कहा- हममें तुममें खड्ग खंभ में घट घट व्यापत राम। यानी वह ईश्वर हममें है, तुममें है, तुम्हारी तलवार में है औऱ जिस खंभे से तुमने मुझे बांधा है, उसमें भी है। हिरण्यकश्यप अट्टाहास करने लगा। उसे वरदान मिला हुआ था कि उसे न कोई मनुष्य मार सकता है न जानवर, न देवता और न राक्षस। उसकी मृत्यु न दिन में हो सकती है न रात में और न दोपहर को। लेकिन भगवान के सामने किसी की कहां चलती है? वह तो सर्वशक्तिमान है। भगवान ने उसे मारने के लिए न दिन चुना और न रात। समय कौन सा चुना? शाम का। और खुद नृसिंह अवतार धारण किया। यानी आधा शरीर मनुष्य का और आधा सिंह का। इस तरह भगवान ने हिरण्यकश्यप का वध किया। तो यह कथा बताती है कि ईश्वर हर जगह है। बस ज्योंही आपका हृदय भगवान के लिए तड़पने लगा। आपका रोम- रोम भगवान को चाहने लगा। बस वे हाजिर हो जाते हैं। वे किसी न किसी रूप में आपकी मदद करते हैं, आपकी रक्षा करते हैं। कई बार यह महसूस कर कितना सुख मिलता है कि ईश्वर सर्वव्यापी है। यानी हर जगह मौजूद है- आम्नीप्रेजेंट। इसका लाभ यह है कि आप जब चाहें तभी ईश्वर से संपर्क कर सकते हैं। चाहे आप सुरंग में हों, हवाई यात्रा कर रहे हों, जमीन पर चल रहे वाहन में हों या कहीं भी हों। आप ईश्वर से कनेक्ट हो जाते हैं, ईश्वर से जुड़ जाते हैं। ईश्वर की धारा आपके भीतर बहने लगती है। इसके लिए ईश्वर के प्रति प्यार होना चाहिए। बिल्कुल स्वाभाविक प्यार। ऐसा नहीं कि हमें ईश्वर से जबर्दस्ती प्यार करना है। हम तो उसी के अंश हैं। हमारे भीतर ही वह बैठा है। और बाहर भी है । हमारे हृदय में है वह। जैसे ही हम ईश्वर को अपना हृदय देंगे, वे हमें अपने आगोश में बिठा लेंगे। वे तो हमारे लिए प्रतीक्षा में बैठे हैं।