Wednesday, July 6, 2011

भगवान की बांह सूरदास ने कैसे पकड़ी?

विनय बिहारी सिंह



आज एक भक्त ने कहा- सूरदास ने भगवान का हाथ पकड़ लिया, इसका विश्लेषण बहुत ही रोचक है। चलिए एक सन्यासी के पास चलें और उन्हीं के मुंह से सुनें। हम सब सन्यासी के पास गए। उन्होंने कहा- ईश्वर तो सर्वव्यापी हैं। इस सृष्टि के कण- कण में विराजमान हैं। लेकिन वे भक्त के लिए शरीर में उपस्थित हो जाते हैं। लेकिन उनका शरीर हमारे शरीर की तरह नहीं होता। यह शरीर प्रकाश के फोटानों से बना होता है। आप इसे जितना देखेंगे, उतना ही मुग्ध होंगे। सूरदास की भक्ति और साधना इतनी गहरी हो गई थी कि उनका शरीर भी भगवानमय हो गया था। वे इसमें सक्षम थे कि भगवान से जब चाहे मुलाकात कर सकते थे। उनकी बांह पकड़ सकते थे। भक्तों के लिए भगवान कहीं दूर की चीज नहीं होते। वे उसके हृदय में विराजमान रहते हैं। ज्योंही भक्त ने पुकारा कि भगवान दर्शन दें, बस भगवान प्रकट होते हैं। लेकिन कभी कभी भगवान भक्त के साथ लुका- छिपी भी खेलते हैं। भक्त पुकार रहा है, लेकिन भगवान के दर्शन नहीं हो रहे। दरअसल भगवान उसके सामने ही रहते हैं, लेकिन लुका- छिपी खेलने के लिए वे भक्त की आंखों के ऊपर एक पर्दा डाल देते हैं। लेकिन जब देखते हैं कि भक्त उनके लिए तड़प रहा है तो वे उस पर्दे को हटा देते हैं। इसमें भगवान को मजा आता है। आखिर वे किसके साथ खेलेंगे। अपनी संतान के साथ ही तो। सूरदास जानते थे कि भगवान ऐसा करते हैं। इसमें सूरदास को भी आनंद मिलता था। और किसको आनंद नहीं मिलेगा? भगवान तो स्वयं सच्चिदानंद हैं। फिर भक्त क्यों नहीं उनके साथ आनंद मनाएगा?

2 comments:

वन्दना said...

बिल्कुल सही बात्…………ना वो दूर है ना अदृश्य बस देर है तो हमारी तरफ़ से ही।

ramu said...

jab lokik chkshuose tulsi ko vrindavan me dhanushdhari RAM ke
darshanh hosakte hain to SUR banh kyo
nahi pakadsakte kaha kahun chhabi
ajki bhale bane nath tulasi mastak tb name