Thursday, November 4, 2010

नरकासुर का वध

विनय बिहारी सिंह


भगवान श्रीकृष्ण ने महादुष्ट और पापी नरकासुर का वध किया था। इसी के उपलक्ष्य में दीपावली के पहले नरक चतुर्दशी मनाई जाती है। संतों ने इसकी एक और व्याख्या की है। दीपावली के पहले अपने भीतर के नरकासुर का वध करना चाहिए। यानी अपने भीतर के दोषों या बुरी आदतों को खत्म करना चाहिए। तब दीपावली के दिन अपने भीतर का उजाला प्रकट होगा। तब हमारे भीतर ज्योति जलेगी। भगवान कृष्ण को महायोगी कहा जाता है। गीता में उन्हें योगेश्वर कहा गया है। गीता के अंतिम श्लोक में संजय ने धृतराष्ट्र से कहा है- राजन, जहां योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हों वहां विजयश्री निश्चित है। अर्जुन भक्त के प्रतीक हैं और श्रीकृष्ण तो भगवान हैं ही। जो अर्जुन पहले अध्याय में युद्ध नहीं करना चाहते। उनका मुंह सूख गया है। हाथ कांप रहे हैं और धनुष ठीक से पकड़ा नहीं जा रहा है। वही, अठारवें अध्याय में कहते हैं- हां, भगवन मेरी स्मृति लौट आई है। मैं युद्ध करूंगा। गीता जैसा ग्रंथ हमारे पास है, यह हमारा सौभाग्य है।

1 comment:

vishal said...

बहुत अच्छी जानकारी दी आपने विनय बिहारी जी! हमारा सौभाग्य है कि माँ भगवद्‍गीता जैसा ग्रंथ हमारे पास है। अध्यात्म पर आपकी अच्छी पकड़ है।