Saturday, October 31, 2009

उच्च रक्तचाप से पीड़ितों की संख्या बढ़ी

विनय बिहारी सिंह

उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेसर ) और ब्लड सुगर के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में। लेकिन भारत में तुलनात्मक दृष्टि से इन रोगों के मरीजों की संख्या तीन गुनी है। वजह है- अनियमित खानपान। इन दिनों चाऊमिन, बरगर और पित्जा से लेकर तरह- तरह के पकौड़ों का चलन है। इनमें पोषक तत्व कितने हैं, यह शोध का विषय है। लेकिन जानकारों का मानना है कि फास्ट फूड खाना सेहत को खराब करना है। वैसे भी सदियों से डाक्टर कहते आए हैं कि ज्यादा तला या फ्राई किया हुआ खाना पाचन प्रणाली को बिगाड़ता है। लेकिन आजकल फास्ट फूड ही चलन में आ गया है। फुटपाथों पर चाऊमिन की दुकानों पर भीड़ रहती है। छोटे शहरों में भी चाऊमिन की बहार है। इसमें पोषक तत्व न के बराबर रहता है। सिर्फ पेट भरता है। दूसरी वजह है- ब्रेड के साथ सॉस और जेली खाने आदत। आजकल अक्सर लोग ब्रेड पर ये चीजें लगाते हैं और चाव से खाते हैं। ऐसी चीजें लगातार और खूब खाने से ब्लड सुगर बढ़ता है जिसे हम हिंदी में रक्त शर्करा कहते हैं। कई लोग दिन भर चाय पीते रहते हैं। वे यह सुनना पसंद नहीं करते कि दिन भर में तीन- चार कप से ज्यादा चाय पीना स्वास्थ्य को चौपट करता है। इन दिनों जो भी डिब्बाबंद मीठा खाद्य पदार्थ आ रहा है, उसे लगातार नहीं खाना चाहिए, ऐसा डाक्टरों का मानना है। अपने देश में कुपोषण के शिकार बच्चे या बड़ों को भी कई बार ब्लड सुगर की बीमारी हो जाती है। इसके ठीक उलट विदेशों में मोटे लोगों को ब्लड सुगर से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ रही है। जैसे हमारे यहां कुपोषण के शिकार लोग ज्यादा हैं, ठीक उसी तरह विदेशों में अतिरिक्त पोषक तत्व खाने और मोटे हो जाने वाले लोगों की संख्या ज्यादा है। यूरोपीय देशों में कुपोषण से पीड़ित लोग कम और मोटे लोग ज्यादा हैं। कहीं के भी लोग हों, खानपान में सावधानी बरतना हर जगह जरूरी है। आज भी डायटीशियन कहते हैं- सुबह आठ बजे नाश्ता कीजिए। दोपहर बारह- एक बजे भोजन, शाम को हल्का सा नाश्ता जैसे कि बिस्कुट और चाय या टोस्ट और चाय। फिर रात को भोजन। भोजन में हरी सब्जियों की मात्रा ज्यादा रहे। सब्जी कम से कम तेल में पकी हो और पराठा या पूड़ी हफ्ते में एक बार ही ठीक है। और ज्यादा तो अच्छा यह है कि पूड़ी और पराठा छठे- छमासे ही खाया जाए। हां, जितना ज्यादा फल खा सकें वही अच्छा। यह बात मैं विशेषग्यों के मुंह से सुन कर लिख रहा हूं। मौसमी फल चाहे एक ही क्यों न हों, खाना ठीक है। महंगाई तो हमेशा रहेगी और बढ़ती भी रहेगी। लेकिन स्वास्थ्य को ठीक रखना भी जरूरी है। जो लोग चाय, सिगरेट, पान, गुटखा और अन्य नशीली चीजों के आदी हैं, उन्हें इन विषैले पदार्थों को जितनी जल्दी हो त्याग देना चाहिए। बीमार पड़ने से अच्छा है, पहले ही सावधानी बरत ली जाए। वरना दवाएं जिस तरह महंगी हो रही हैं, बीमार पड़ना एक भारी बोझ की तरह बन जाएगा। तो क्यों न सादा जीवन उच्च विचार वाला अपने पुरखों का जीवन जीएं और सुख से रहें।

Friday, October 30, 2009

एकाग्र कैसे हों

विनय बिहारी सिंह

अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि एकाग्र कैसे हों। टोटल कंसंट्रेशन कैसे आए? जब आप कोई मनपसंद चीज पढ़ते हैं तो उसमें पूरी तरह डूब जाते हैं। आपको कोई डिस्टर्ब करता है तो आपको अच्छा नहीं लगता। या कोई भी मनपसंद काम करते हैं तो उसमें लीन हो जाते हैं। यही एकाग्रता है। तब हमें सोचना है कि ईश्वर में एकाग्रता कैसे हो? कई लोग कहते हैं कि ईश्वर तो अनंत है, हम कहां ध्यान लगाएं। संतों ने कहा है और गीता में भी लिखा है कि अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी करके बैठ जाइए। आपकी टुड्डी सीधी हो। यानी आप सीधे सामने की ओर देख रहे हों। तब आंख बंद कीजिए और दोनों भृकुटियों के बीच ध्यान कीजिए। पहले पहल आपकी आंखों की पुतली नीचे हो जाएगी क्योंकि ऊपर देखने का अभ्यास नहीं है। लेकिन धीरे- धीरे लगातार अभ्यास से आपको आदत पड़ जाएगी। अगर यह संभव न हो तो बिना सिर झुकाए, ठीक जैसे ऊपर लिखा गया है, वैसे ही बैठ कर हृदय में ध्यान लगाएं। कल्पना कीजिए कि आपके हृदय के बीच एक अत्यंत सुंदर कमल खिला हुआ है। यह कमल ईश्वरीय है। आप इसके बीचोबीच अपने इष्टदेवता या देवी की कल्पना भी कर सकते हैं। शास्त्रों में लिखा है कि थोड़ी देर भी ऐसी एकाग्रता रखने का बड़ा अच्छा फल मिलता है। मन शांत रहता है और तनाव खत्म हो जाते हैं।
लेकिन यह अभ्यास करते हुए मन में सघन भक्ति जरूरी है।

Thursday, October 29, 2009

शून्यवाद क्या है

विनय बिहारी सिंह

आज पता नहीं क्यों शून्यवाद की याद आ रही है। बौद्ध धर्म में भी इससे मिलती- जुलती तत्व व्याख्या मिलती है। आइए सबसे पहले प्रत्यक्ष उदाहरण से समझें। आपकी मेज पर एक गिलास रखा है। वह खाली है। लेकिन वह क्या सचमुच खाली है? मान्यता है कि कभी कोई चीज खाली रह ही नहीं सकती। पानी या दूध या कोई द्रव अगर गिलास में होगा तो दिखेगा। लेकिन हवा तो नहीं दिखेगी? गिलास खाली नहीं है। उसमें हवा है। जब आप उसमें पानी डालेंगे तो वह हवा की जगह ले लेगा। यानी गिलास कभी खाली नहीं है। कुछ नहीं है तो उसमें हवा है। शून्यवाद कहता है कि जब आपके दिलोदिमाग में एक कीमती सूक्ष्म चीज हो तो वह शून्य की स्थिति है। वह एक चीज क्या हो सकती है जो कीमती भी हो, सूक्ष्म भी हो और स्थाई टिक सके? वह है- ईश्वर। भगवान। शून्य का अर्थ यहां कुछ नहीं बिल्कुल नहीं है। शून्य यानी कुछ सार्थक। यह शून्यवाद। तो ईश्वर से कैसे नाता जोड़ें? मेरे पास एक ई मेल आया है। उसमें प्रश्न है- लाख कोशिश करने पर भी मन नहीं लगता। ईश्वर पर मन टिके तो कैसे? इसका उत्तर है- मन वहीं टिकता है जहां आनंद मिलता है। सुख मिलता है या अच्छा लगता है। ईश्वर को अगर आप दूर की चीज मानेंगे तो ऐसे ही होगा। एक अपरिचय वाली सत्ता में ध्यान लग ही नहीं सकता। अपरिचय क्यों? क्योंकि कई लोग समझते हैं कि ईश्वर आसमान में है। या पता नहीं कहां है। वह हमारी सुनता भी है कि नहीं। चलो लोग पूजा कर रहे हैं, हम भी पूजा कर लेते हैं। क्या पता कल्याण हो जाए। लेकिन वहां भी शंका ही रहती है। प्रसाद, फूल और अगरबत्ती आदि प्रस्तुत कर रहे हैं, लेकिन मन में चल रहा है कि पता नहीं क्या होगा। ऐसी पूजा किसी काम की नहीं। इससे अच्छा है कि आप मंदिर जाएं ही नहीं। पूजा करें ही नहीं। अस्थिर दिमाग से किया गया कोई भी काम व्यर्थ होता है। उसका कोई फल नहीं होता। पहले तो आपको विश्वास होना चाहिए कि ईश्वर है। तब आपको कोई लाभ होगा। और यही बात वैग्यानिकों ने भी कही है। उन्होंने कहा है कि अगर आपको डाक्टर में विश्वास नहीं है तो फिर वह सही दवा भी देगा तो आपको उतना फायदा नहीं होगा, जितना होना चाहिए। जो भी सार्थक काम कीजिए पूरे मन से कीजिए। पूरी लगन से कीजिए। वरना छोड़ दीजिए। गीता में कहा है- संशयात्मा विनश्यति। संशय हो तो छोड़ दीजिए। ईश्वर को मत मानिए। प्रपंच में फंसे रहिए। लेकिन अगर आपका ईश्वर में विश्वास है तो पूरे मन, पूरी आत्मा के साथ उसे प्रेम कीजिए। ईश्वर हमारी सांसों में है। इससे ज्यादा प्रमाण क्या चाहिए। क्या आप जीवन में जब तक चाहे सांस ले सकते हैं। नहीं। जिस दिन मृत्यु को आना होगा आकर आपकी सांस बंद कर देगी। यह आपके हाथ में नहीं है। तो ईश्वर आपकी सांस में है। उसे जबसे प्यार करने लगेंगे, आपको सुख मिलने लगेगा। ईश्वर तो इंतजार कर रहा है।

Wednesday, October 28, 2009

प्रेम गली अति सांकरी

विनय बिहारी सिंह

हालांकि यह अद्भुत पंक्ति आपने कई बार पढ़ी होगी। लेकिन जितनी बार पढ़ते हैं, प्रेम का गहरा अर्थ और स्पष्ट होता जाता है। ईश्वर से प्रेम करना हो तो इसी अद्भुत स्थिति में आना पड़ेगा। ईश्वर व्यक्तिगत भी है और सार्वजनिक भी। जैसे जगन्माता मेरी या आपकी व्यक्तिगत माता भी हैं और पूरे जगत की भी माता हैं। क्या यह संभव है? जिन माताओं के छह बच्चे होते हैं। क्या वह उनमें से किसी को कम या ज्यादा प्यार करती है? नहीं। मां तो मां ही होती है। सबको एक जैसा प्यार। और बच्चे भी सिर्फ मां- मां रटते रहते हैं। अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो क्या अद्भुत स्थिति है। क्या आनंद है। आइए पहले उन पंक्तियों की बात करें-
हरि है तो मैं नहीं, मैं हूं तो हरि नाहिं।प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय।।
यानी आप शरीर, इंद्रिय, मन या बुद्धि नहीं हैं। आप तो सच्चिदानंद आत्मा हैं। जिस दिन इस बात का भान हो गया, बस काम बन गया। तब हरि औऱ आप एक में मिल जाएंगे। क्योंकि मैं यानी अहंकार। अहंकार के रहते हरि मिलने वाले नहीं हैं। अहंकार तो हमारे और ईश्वर के सामने लोहे की मोटी दीवार खड़ी कर देता है। लेकिन ज्योंही आप अपने अहं को जला कर राख कर देते हैं, वह दीवार अपने आप पिघल जाती है औऱ ईश्वर आपको अपनी गोद में ले लेते हैं। आप सच्चिदानंद में रहने लगते हैं। तब न कोई तनाव है, न कोई चिंता है और न ही कोई कष्ट। दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से दूर आप हर क्षण आनंद में रहते हैं। लेकिन यह अहं दूर कैसे होगा? जब आप समझ जाएंगे कि आप अहं नहीं हैं। सब कुछ तो ईश्वर है। आप तो सिर्फ उसकी कठपुतली हैं। एक बार उससे संपर्क हो जाए तो बस काम बन गया। चाहे ईश्वर को माता के रूप में पा लीजिए चाहे पिता के रूप में, चाहे मित्र के रूप में पा लीजिए चाहे भाई के रूप में। जिस रूप में अराधना करेंगे, उसी रूप में वे आ जाएंगे। लेकिन प्रेम उत्कट होना चाहिए। उत्कट यानी ईश्वर के सिवा कुछ दिखाई ही न दे। जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए या जैसे कोई प्रेमिका अपने प्रेमी के लिए, जैसे कंजूस धन के लिए, जैसे पानी में डूबता आदमी सांस लेने के लिए और जैसे कोई माता अपने पुत्र के लिए तड़पती है, उससे सौ गुना तड़पन ईश्वर के लिए होनी चाहिए। यह कैसे होगा? जब आपको यह महसूस हो जाएगा कि ईश्वर के सिवा औऱ कुछ भी आनंददायक नहीं है। और यही सच है। रामकृष्ण परमहंस ने कहा है- हमारा मनुष्य योनि में जन्म इसीलिए हुआ है कि हम ईश्वर को प्राप्त करें। लेकिन क्या अचंभा है कि हम ईश्वर को छोड़ देते हैं और उसके अलावा जितनी चीजें हैं, उन्हीं को पाने के लिए तड़पने लगते हैं। लेकिन अंत में मिलता क्या है? कुछ नहीं। इसलिए क्यों न ईश्वर से अपना संपर्क और गहरा बनाएं। वे तो अनंत हैं। आप उनसे संबंध बनाएंगे तो आप भी अनंत आनंद, अनंत सुख के अधिकारी हो जाएंगे।

Tuesday, October 27, 2009

आदि शंकराचार्य ने क्या कहा था?

विनय बिहारी सिंह़

आदि शंकराचार्य ने कहा था- जगत मिथ्या, ईश्वर सत्य। इसका कुछ लोगों ने गलत अर्थ समझ लिया। वे कहते हैं कि अगर जगत मिथ्या है तो जगत में सांस मत लो। जगत का खाओ- पीयो नहीं। जगत की कोई चीज व्यवहार में मत लाओ। शंकराचार्य का यह अर्थ नहीं था। उन्होंने कहा कि यह जगत माया से ओतप्रोत है। यह संसार स्वप्न की तरह है। आपने एक आदमी से हंस- हंस कर बात की। उसके यहां चाय पी। नाश्ता किया। शाम को पता चला कि उस आदमी की तो मृत्यु हो गई। वह आदमी कहां चला गया? कई लोगों को अनेक वर्ष बाद अपने कई सहपाठियों के चेहरे याद नहीं रहते। वे आमने- सामने खड़े हों तब भी एक दूसरे को नहीं पहचानते। बचपन में जिनकी माताओं की मृत्यु हो जाती है, वे तो अपनी मां का चेहरा भी याद नहीं कर पाते। मान लीजिए उनकी मां का फोटो नहीं है। फिर वे किस चेहरे को अपनी मां के रूप में याद करेंगे? महात्माओं ने कहा है- जगन्माता ही हमारी असली मां हैं। उनके किसी रूप को अपनी मां का रूप मानिए- चाहे मां काली, मां दुर्गा, मां पार्वती या मां सरस्वती। शंकराचार्य ने कहा कि यह जगत मिथ्या है। इस पर भरोसा करके चलोगे तो धोखा खाओगे। यानी जिस मां को हम अपने जीवन की धुरी समझते थे, वह अचानक दुनिया छोड़ कर चली जाती है। पिता भी चले जाते हैं। तो इस दुनिया पर भरोसा मत करो। सबकी सेवा करो। सबसे प्रेम से रहो। यह तो ठीक है। लेकिन भरोसा सिर्फ ईश्वर पर ही करो। इसमें विरोधाभास कहां है? ठीक ही तो कहा शंकराचार्य ने। उन्होंने ही कहा था कि हमारी इच्छाएं ही हमें नियंत्रित करती हैं। वरना हम तो स्वतंत्र हैं। इन इच्छाओं के चंगुल से निकल कर ईश्वर के साम्राज्य में निर्द्वंद्व विचरने के उपाय भी उन्होंने बताए। ईश्वर भक्ति ही वह उपाय है। ईश्वर के अलावा सब कुछ मिथ्या है। यह सच ही तो है। यह हमारा शरीर भी मिथ्या ही है। यह हमारा साथ कब तक देगा? जब यह बूढ़ा या बीमार हो जाएगा, जर्जर हो जाएगा तो इसे छोड़ना पड़ेगा। मृत्यु होगी। फिर नया जन्म और नया शरीर। नए रिश्ते- नाते। शंकाराचार्य ने कहा- पुनरपि जन्मम, पुनरपि मरणम। जननी जठरे, पुनरपि शयनम।। शंकराचार्य ने हमें रास्ता दिखाया। संसार की नश्वरता और ईश्वर की अमरता के बारे में उन्होंने विस्तार से बताया। हम सब उनके ऋणी हैं।

Monday, October 26, 2009

जिसकी जैसी नजर


विनय बिहारी सिंह


एक बार युधिष्ठिर और दुर्योधन को उनको गुरु ने अलग- अलग काम दिया। युधिष्ठिर को कहा गया कि वे शाम तक सबसे बुरे आदमी को खोज कर लाएं। दुर्योधन को कहा गया कि वे शाम तक सबसे अच्छे आदमी को खोज कर लाएं। दोनों अपनी- अपनी खोज में निकल पड़े। शाम हुई तो दोनों गुरु के पास पहुंचे। सबसे पहले दुर्योधन से पूछा गया- कहां है तुम्हारा सबसे अच्छा आदमी? दुर्योधन ने कहा- मुझे तो कोई सबसे अच्छा आदमी दिखा ही नहीं। सबमें कुछ न कुछ बुराई है। इसलिए मैं खाली हाथ लौटा हूं। तब युधिष्ठिर को बुलाया गया और पूछा गया- कहां है सबसे बुरा आदमी? युधिष्ठिर ने कहा- गुरुवर, मुझे तो कोई बुरा आदमी दिखा ही नहीं। मैंने जिस पर नजर डाली, अच्छा आदमी दिखा । इसीलिए मैं खाली हाथ लौटा। उनके गुरु ने कहा- यह तुम्हारे ग्यान के लिए है। जिसकी जैसी नजर होती है, उसे वैसा ही दिखता है। जिसके मन में बुराई रहेगी, वह सबको उसी नजर से देखेगा। जिसके मन में वासना होगी, वह सबको वासना की नजर से ही देखेगा। जिसके मन में पवित्रता रहेगी, वह सबको पवित्र नजर से ही देखेगा। अगर हम ठान लें कि जिस ईश्वर ने हमें पैदा किया, उसे जान कर रहेंगे तो ईश्वर खुद ही हमारी इस कोशिश में मददगार हो जाएंगे। वरना छुपे ही रहेंगे। एक व्यक्ति ने एक महात्मा से प्रश्न किया कि ईश्वर ने इतनी बड़ी सृष्टि की, अनंत प्रकार के सुंदर दृश्य बनाए, हमें पैदा किया और खुद क्यों छुपे रहते हैं? कोई उन्हें देख क्यों नहीं पाता? महात्मा ने उत्तर दिया- यही ईश्वर की महानता है। वरना हम कोई छोटा सा भी पराक्रम करते हैं तो चाहते हैं कि दुनिया को पता चल जाए कि मैंने अमुक काम किया है। किसी की मदद करते हैं तो चाहते हैं कि लोग हमारी प्रशंसा करें कि मैंने अमुक की मदद की। एक समाजसेवक के रूप में ख्याति मिले। लेकिन ईश्वर ने एक सूक्ष्म जीव से लेकर हाथी तक बनाया है। पहाड़, नदियां और आसमान बनाया है लेकिन खुद को छुपा कर रखते हैं। उन्हें सिर्फ वही देख सकता है जो उन्हें दिल से प्यार करता है। यह आसान भी है और कठिन भी। अगर आपका दिल ईश्वर के लिए पिघल गया तो आसान है और अगर आपके मन में शंका पैदा हो गई कि ईश्वर है भी कि नहीं, तो फिर आप खोजते- खोजते पस्त हो जाएंगे तो भी ईश्वर की अनुभूति आपको नहीं होगी। जो लोग रास्ता चलते ईश्वर को पा लेना चाहते हैं, वे निराश होते हैं और अंत में कहते हैं- कहां, ईश्वर तो है ही नहीं। होता तो क्या दिखता नहीं? बस ऐसे लोग भ्रम में ही फंसे हुए पूरा जीवन बिता देते हैं। जैसे हर चीज को पाने का एक तरीका है, पद्धति है, वैसे ही ईश्वर को भी पाने की एक पद्धति है। पातंजलि योग सूत्र इसी की व्याख्या करते हैं।

Friday, October 23, 2009

क्या हमारा जीवन सिनेमा के लोग चलाएंगे?

विनय बिहारी सिंह

सिनेमा को ही जीवन बना लेना क्या ठीक है? आज बड़े होते बच्चों के मुंह से सिनेमा के satahi गीत सुनना सामान्य सी घटना है। सिनेमा हमें कौन सा संस्कार सिखाता है? क्या वह हमें धैर्य, शांति, साहस और ईश्वर के प्रति गहरी आस्था का संदेश देता है? या कि फिल्म निर्माता अपनी कमाई के लिए तमाम तरह के मसाले डाल कर लोगों को सतही चीजों के प्रति प्रेरित करता है? मेरा आग्रह है कि यह लेख सिनेमा के खिलाफ नहीं है। लेकिन एकदम से सिनेमा का दीवाना होना भी खतरनाक है। फिल्में व्यवसाय के लिए बनाई जाती हैं। कमाई के लिए। आजकल की फिल्में अच्छे संदेश देने के लिए नहीं होतीं। कोई एक विषय लेकर सस्पेंस और कानों को अधिक प्रिय न लगने वाले गाने दर्शकों को कितना लुभाएंगे? इसीलिए फिल्में खूब फ्लाप भी हो रही हैं। तो बच्चे क्यों फिल्मों के प्रति मोहित हो रहे हैं। क्यों कोई बच्चा रास्ते में प्यार, प्यार गाता है और सच्चे प्यार का अर्थ नहीं जानता? इसकी वजह यह है कि हममें से ज्यादातर लोगों का जीवन फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों से इस तरह बंध गया है कि अगर घर में टीवी खराब हो जाए तो हंगामा खड़ा हो जाएगा। कई लोग घर में प्रवेश करते ही सबसे पहले टीवी खोलते हैं। फिर कुछ खाते पीते हैं। उनका सारा काम टीवी देखते देखते ही होता है। पात्रों की चर्चा, लाइव शो में किसने क्या किया, इसकी चर्चा। बस। जीवन मूल्यों की चर्चा कोई नहीं करता। क्या हमारा जीवन एकांगी हो गया है? क्या सिनेमा और टीवी के लोग हमें सिखाएंगे कि हमें कैसे जीना चाहिए और कैसे सोचना चाहिए? तब तो हम बाजार के उत्पादों के बारे में ही दिन रात सोचेंगे या फिर फिजूल के चरित्रों की चर्चा करेंगे। आप कहेंगे कि तब क्या करें? बैठ कर रामनाम जपें? ठीक है आप रामनाम मत जपिए। लेकिन कोई अच्छी प्रेरक किताब पढिए। बच्चों को ऐसे संस्कार दीजिए कि वे महापुरुषों के जीवन की कथा पढ़ने के लिए लालायित हों। अच्छी पुस्तकें बच्चों को ही नहीं बड़ों को भी बहुत कुछ दे जाती हैं। कुछ नहीं तो चिंता छोड़ें, सुख से जीएं नामक किताब ही पढ़ने को दीजिए। या फिर परमहंस योगानंद की योगी कथामृत (आटोबायोग्राफी आफ अ योगी का अनुवाद) पढ़ने को दीजिए। तब वह तोते की तरह प्यार प्यार न गाकर, अपने भीतर को टटोलेगा। चिंतन करेगा। शांत होकर अकेले में हम अपने भीतर कब झांकेंगे? कैसे आत्मविश्लेषण कर पाएंगे कि हमारे भीतर क्या चल रहा है? अगर कोई दिन रात अपने दिमाग को बाहर दौड़ाए रहता है तो वह अपने भीतर झांक ही नहीं सकता। तब फिर वह बाहर की सफाई तो कर सकता है, अंदर की सफाई नहीं कर सकता। अंदर कूड़ा- कचरा जमा होता रहेगा। बाद में भीतर के कूड़े कचरे की जड़ इतनी गहरी हो जाएगी कि आप उसे उखाड़ेंगे और वह फिर नए सिरे से उग आएगा। यह कूड़ा हमारे अनजाने जमा होता रहता है। इसकी सफाई का सबसे बढ़िया उपाय यह है कि आत्मविश्लेषण करें और महापुरुषों की अच्छी पुस्तकें पढ़ें और शास्त्रीय संगीत पर आधारित भजन सुनें। भजन सुनने का नशा नहीं होना चाहिए। वरना ध्यान पूजा छोड़ कर सिर्फ भजन ही सुनते रहेंगे। हर चीज की एक सीमा होनी चाहिए।