Thursday, October 11, 2012

गीता का दसवां अध्याय


भगवान कृष्ण ने भगवत गीता के दसवें अध्याय में अपनी विभूतियां बताई हैं। अर्जुन ने प्रश्न किया है कि प्रभु, आपको मैं किन- किन रूपों में स्मरण कर सकता हूं, आपका ध्यान कर सकता हूं। भगवान ने सबसे पहले कहा है- मैं सबकी आत्मा हूं। फिर उन्होंने कहा है कि मैं सूर्य हूं। नक्षत्रों में चंद्रमा हूं। सिद्धों में कपिल मुनि हूं। संतों में नारद ऋषि, और पांडवों में अर्जुन यानी तुम, पर्वतों में सुमेरु पर्वत, वृक्षों में पीपल....आदि।  अध्याय के अंत में भगवान ने कहा है- जितनी भी विभूतियां तुम देखते हो, उनमें मैं ही हूं। लेकिन इन बहुत से वर्णनों से तुम्हें क्या। तुम तो बस मुझे ही स्मरण करो और तुम्हारा काम बन जाएगा। भगवान संकेत देते हैं कि उनके प्रति अनन्यता के साथ जुड़ने से ही भक्त का काम बन जाएगा। उसे कहीं और भटकने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन मैं इन-इन रूपों में भी हूं। यहां भगवान यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांड के कर्ता और ब्रह्मांड को धारण करने वाले वही हैं। वही इसके मालिक हैं, वही इसे चला रहे हैं। जो  उनकी शरण में जाएगा, उसे ब्रह्मांड का रहस्य मालूम हो जाएगा। यही नहीं, उसे भगवान की कृपा भी प्राप्त हो जाएगी।

2 comments:

Madan Mohan Saxena said...



शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन,पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब
बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये
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वन्दना said...

बिल्कुल सही आकलन किया है