Wednesday, September 19, 2012

पिता जी की मृत्यु



पिछले ३० अगस्त को पिता जी की मृत्यु हो गई।  वे ९४ वर्ष के थे। लंबे समय से बीमार चल रहे थे। शारीरिक कष्टों से उन्हें मुक्ति मिली। मुखाग्नि मैंने दी। पिता जी को चिता पर जलते देख कर एक बार फिर लगा कि मनुष्य का अंत यही है। जिस आग से हम खाना पका कर खाते हैं। जाड़े में जिसकी आंच से गर्माते हैं, उसी अग्नि में हमें भस्म हो जाना है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि अग्नि भी मैं ही हूं। तो पिता जी को अग्नि के हवाले कर दिया। काफी देर तक उनके शव को जलते हुए देखता रहा। आग की लपटें उनके पार्थिव शरीर को लील रही थीं। धीरे- धीरे उनका शव राख हो गया। उस राख को एक नई मिट्टी की हांडी में रख कर पवित्र गंगा नदी में प्रवाहित किया और उन्हें अंतिम प्रणाम कहा। इस जन्म के पिता को अलविदा कहते हुए लगा- एक दिन मेरा बेटा भी इसी तरह मुझे हमेशा के लिए अलविदा कह देगा। यही मनुष्य की नियति है। जब सिर मुड़ा रहा था तो लगा कि न जाने किन बंधनों से मुक्त हो रहा हूं। पिता जी कहां से आए थे और कहां चले गए? निश्चय ही सूक्ष्म जगत से आए थे और वापस वहीं चले गए। शायद उनका दुबारा जन्म हो। किसी नए परिवेश में, नए शरीर में। एक बार फिर गीता के अध्याय दो के श्लोक याद आए। गीता ऐसे मौकों पर संजीवनी का काम करती है।

4 comments:

DrMandhata Singh said...

श्रद्धांजलि। ईश्वर आपके पिताजी की आत्मा को शांति प्रदान करें और आपको पितृशोक का दुख सहने की शक्ति प्रदान करें। यह सच है कि इस नश्वर जगत का आभास भी ऐसे ही हो पाता है।

पुरुषोत्तम पाण्डेय said...

मार्मिक और दार्शनिक आलेख.शरीर की मृत्यु एक शाश्वत सत्य है. पर आत्मा अजर-अमर है. शोक ना करें.

ZEAL said...

जीवन एक रंगमंच है ! हम सभी को एक निश्चित अवधी के लिए इस पृथ्वी पर आने का म ओका मिलता है ! अपना-अपना कर्त्तव्य निष्ठां से निभाकर वापस जाना ही होता है ! आपके मन में आये विचारों को समझ sakti हूँ ! ईश्वर आपको शक्ति दे और दिवंगत की आत्मा को शान्ति दे !

वन्दना said...

विनम्र श्रद्धांजलि ………यही यथार्थ है ।