Saturday, April 11, 2009

दिव्य योगी आनंदमयी मां



विनय बिहारी सिंह


आनंदमयी मां कहती थीं कि सांस के साथ ईश्वर का नाम जपते रहो। सांस अंदर आए तो भी और बाहर जाए तो भी। उनके कुछ अनुयायी सांस के आने- जाने के साथ राम- राम का जाप करते थे और बताते थे कि इससे बहुत लाभ हो रहा है। सन १८९६ में पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में जन्मी आनंदमयी मां बचपन से ही ईश्वर के प्रति आकर्षित थीं। उनके पिता विपिन बिहारी भट्टाचार्य भोर में ही उठ जाते थे और वैष्णीव गीत गाते हुए गांव में निकल पड़ते थे। वे गीत गाते हुए इतने मस्त हो जाते थे कि उन्हें खाने- पीने का होश भी नहीं रहता था। उनकी पत्नी यानी आनंदमयी मां की माता मोक्षदा सुंदरी देवी अपने पति को ढूंढ़ कर लाती थीं और उन्हें खाना खिलाती थीं। एक बार जोर की आंधी में उनके घर की टीन की छत उड़ गई लेकिन विपिन बिहारी भट्टाचार्य बारिश में भींगते हुए ही भजन गाते रहे। उन्हें घर के छत की परवाह नहीं थी। बाद में गांव के लोगों ने मिलजुल कर घर की छत को और मजबूत बनवा दिया। ऐसे माता- पिता के घर में मां आनंदमयी ने जब होश संभाला तो उन्होंने पाया कि वे ईश्वर के अलावा और किसी से प्रेम कर ही नहीं सकतीं। मुश्किल से वे १३ साल की हुई होंगी कि उनकी शादी रमणी मोहन चक्रवर्ती उर्फ भोलानाथ से कर दी गई। भोलानाथ के मन में जब भी काम भाव उठते थे, आनंदमयी मां बेहोश हो कर गिर पड़ती थीं। जब भोलानाथ उनके बेहोश शरीर को छूते थे तो उन्हें बिजली का करेंट जैसा लगता था। वे डर जाते थे। वे आनंदमयी मां को डाक्टर से दिखाने ले गए। डाक्टर ने कहा- आपकी पत्नी को कोई रोग नहीं है। वे तो दूसरों के रोग ठीक कर सकती हैं। आनंदमयी मां को कुछ मौकों पर देवताओं की मूर्तियों से जीवंत देवता निकलते दिखे थे। जब उनके पति भोलानाथ को मालूम हुआ कि उनकी पत्नी विलक्षण साध्वी हैं तो उन्होंने अपनी पत्नी से दीक्षा ली। उनके पति उनके शिष्य बने। आनंदमयी मां का कहना था कि उनके शरीर में भले परिवर्तन हुआ (बचपन, युवा अवस्था, प्रोढ़ अवस्था) , लेकिन भीतर से वे हमेशा एक जैसा ही रहीं। उनका कहना था- जन्म के पहले जो मैं थी, वही जन्म के बाद भी हूं और हमेशा वही रहूंगी। मनुष्य का जन्म सिर्फ ईश्वर को पाने के लिए हुआ है। अगर वह इसे गप हांकने या समय बरबाद करने में खर्च करता है तो उसका भला कैसे हो सकता है? आनंदमयी मां के पास जो भी जिग्यासु जाता था, उसे ईश्वर प्राप्ति के साधन मिल जाते थे। वे कहती थीं- चमत्कारों के चक्कर में मत पड़ो। जो लोग चमत्कार दिखाते हैं, जरूरी नहीं कि ईश्वर उनसे प्रसन्न हों। लेकिन आनंदमयी मां ने न जाने कितने रोगियों, पीड़ितों को स्वस्थ किया। यह भी तो एक तरह का चमत्कार ही था। हालांकि मां इसे जन सेवा कहती थीं। लेकिन उनकी पद्धति कि- सांस के साथ राम या भगवान का नाम लेना चाहिए, लोग आज भी याद करते हैं।

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