Tuesday, October 16, 2012

श्री रुद्राष्टकम्


नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् |
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम् ||१||

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् |
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोहम् ||२||

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं मनोभूतकोटि प्रभाश्रीशरीरम् |
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगंगा लसदभालबालेन्दुकण्ठे भुजंगा ||३||

चलत्कुण्डलं भ्रुसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् |
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ||४||

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् |
त्रयः शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेहं भावानीपतिं भावगम्यम् ||५||

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानंददाता पुरारी |
चिदानंदसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ||६||

न यावद उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् |
न तावत्सुखं शान्ति संतापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ||७||

न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् |
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ||८||


रुद्रष्टकमिदं प्रोक्तं विपेण हरतुष्टये |
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ||
|| इति श्री गोस्वामी तुलसीदास कृतं श्री रुद्राष्टकम् संपूर्णं ||

Monday, October 15, 2012

तुलसीदास की एक सुंदर रचना


काहे ते हरि मोहिं बिसारो।
जानत निज महिमा मेरे अघ, तदपि न नाथ सँभारो॥१॥
पतित-पुनीत दीन हित असुरन सरन कहत स्त्रुति चारो।
हौं नहिं अधम सभीत दीन ? किधौं बेदन मृषा पुकारो॥२॥
खग-गनिका-अज ब्याध-पाँति जहँ तहँ हौहूँ बैठारो।
अब केहि लाज कृपानिधान! परसत पनवारो फारो॥३॥
जो कलिकाल प्रबल अति हो तो तुव निदेस तें न्यारो।
तौ हरि रोष सरोस दोष गुन तेहि भजते तजि मारो॥४॥
मसक बिरंचि बिरंचि मसक सम, करहु प्रभाउ तुम्हारो।
यह सामरथ अछत मोहि त्यागहु, नाथ तहाँ कछु चारो॥५॥
नाहिन नरक परत मो कहँ डर जद्यपि हौं अति हारो।
यह बड़ि त्रास दास तुलसी प्रभु नामहु पाप न जारो॥६॥

Thursday, October 11, 2012

गीता का दसवां अध्याय


भगवान कृष्ण ने भगवत गीता के दसवें अध्याय में अपनी विभूतियां बताई हैं। अर्जुन ने प्रश्न किया है कि प्रभु, आपको मैं किन- किन रूपों में स्मरण कर सकता हूं, आपका ध्यान कर सकता हूं। भगवान ने सबसे पहले कहा है- मैं सबकी आत्मा हूं। फिर उन्होंने कहा है कि मैं सूर्य हूं। नक्षत्रों में चंद्रमा हूं। सिद्धों में कपिल मुनि हूं। संतों में नारद ऋषि, और पांडवों में अर्जुन यानी तुम, पर्वतों में सुमेरु पर्वत, वृक्षों में पीपल....आदि।  अध्याय के अंत में भगवान ने कहा है- जितनी भी विभूतियां तुम देखते हो, उनमें मैं ही हूं। लेकिन इन बहुत से वर्णनों से तुम्हें क्या। तुम तो बस मुझे ही स्मरण करो और तुम्हारा काम बन जाएगा। भगवान संकेत देते हैं कि उनके प्रति अनन्यता के साथ जुड़ने से ही भक्त का काम बन जाएगा। उसे कहीं और भटकने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन मैं इन-इन रूपों में भी हूं। यहां भगवान यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांड के कर्ता और ब्रह्मांड को धारण करने वाले वही हैं। वही इसके मालिक हैं, वही इसे चला रहे हैं। जो  उनकी शरण में जाएगा, उसे ब्रह्मांड का रहस्य मालूम हो जाएगा। यही नहीं, उसे भगवान की कृपा भी प्राप्त हो जाएगी।

Tuesday, October 9, 2012

भगवान के वचन




भगवान श्रीकृष्ण ने भगवत गीता में कहा है- जो मुझे अनन्य प्रेम से भजते हैं। जो मुझे कभी नहीं भूलते, उन्हें मैं भी कभी नहीं भूलता। वे मुझमें और मैं उनमें हूं। कितना सांत्वनादाई वादा है यह। हम अपने हृदय से भगवान के नाम का उच्चारण करते हैं और यह पुकार तत्क्षण उन तक पहुंच जाती है। भगवान कहते हैं- मेरे भक्त कभी नष्ट नहीं होते। यानी भगवान अपने भक्तों की सदा रक्षा करते हैं। रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे- भक्ति, भक्त और भगवान- एक हो जाएं तो फिर कहना ही क्या। यही चरम स्थिति तो पाने के लिए भक्त छटपटाता रहता है। वह भीतर से पुकारता रहता है- कहां हैं भगवान। दर्शन दीजिए। वह भगवान को महसूस करता रहता है लेकिन जब उनके दर्शन नहीं होते, सिर्फ अनुभूति होती है तो वह कहता- दर्शन दीजिए प्रभु। दर्शन दीजिए। भगवान यह सुन कर मुस्कराते हैं। वे भक्त की व्याकुलता को और परखना चाहते हैं। यह भक्त और भगवान के बीच चलता रहता है। यह भगवान को भी अच्छा लगता है और भक्त को भी।

Saturday, October 6, 2012

आत्मचिंतन


परमहंस योगानंद जी ने लिखा है कि यदि आप किसी आध्यात्मिक विषय पर एक घंटे पढ़ते हैं तो दो घंटे लिखिए, तीन घंटे उस पर सोचिए और बाकी बचे समय में जब फुरसत मिले ध्यान कीजिए। सचमुच आध्यात्मिक चीजें सिर्फ पढ़ना और पढ़ते जाना ही हमें ज्यादा फायदा नहीं पहुंचाता। जो पढ़ते हैं उसे लिखने से वह ज्यादा अच्छी तरह आत्मसात होता है। और जो आत्मसात किया उस पर गहरा चिंतन करने से वह हमारे भीतर गहरे बैठ जाता है। इसके बाद यदि उस पर ध्यान करें तो ज्यादा फायदा पहुंचता है। हम ईश्वर को अपने करीब ज्यादा पाते हैं। संतों ने तो कहा ही है- ईश्वर तो हमारे भीतर, बाहर, सर्वत्र हैं। हम्हीं उन्हें अपनी अज्ञानता के कारण जान- समझ नहीं पाते। सर्वं खल्विदं ब्रह्म। सबकुछ ब्रह्म ही है। यह ज्ञान भीतर तक जब तक नहीं जड़ जमा लेता, हम यही कहते रहेंगे कि भगवान हमसे दूर हो गए हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हमारे सबसे करीब भगवान ही हैं।

Thursday, October 4, 2012

रहीम के दोहे



जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय॥
अर्थ: ओछे लोग जब प्रगति करते हैं तो बहुत ही इतराते हैं। वैसे ही जैसे शतरंज के खेल में जब प्यादा फरजी बन जाता है तो वह टेढ़ी चाल चलने लगता है।

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय॥
अर्थ: जब बात बिगड़ जाती है तो किसी के लाख कोशिश करने पर भी बनती नहीं है। उसी तरह जैसे कि दूध को मथने से मक्खन नहीं निकलता।

आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गये, जबहि कहा कछु देहि॥
अर्थ: ज्यों ही कोई किसी से कुछ मांगता है त्यों ही आबरू, आदर और आंख से प्रेम चला जाता है।

खीरा सिर ते काटिये, मलियत नमक लगाय।
रहिमन करुये मुखन को, चहियत इहै सजाय॥
अर्थ: खीरे को सिर से काटना चाहिए और उस पर नमक लगाना चाहिए। यदि किसी के मुंह से कटु वाणी निकले तो उसे भी यही सजा होनी चाहिए।

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह॥
अर्थ: जिन्हें कुछ नहीं चाहिए वो राजाओं के राजा हैं। क्योंकि उन्हें ना तो किसी चीज की चाह है, ना ही चिंता और मन तो बिल्कुल बेपरवाह है।

Wednesday, October 3, 2012

जड़ प्रकृति और प्रेम



भगवत गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ये आठ तो जड़ प्रकृति है। इससे परे जो है वह आत्मा है। यानी मन और बुद्धि से भी परे है आत्मा। हम मन या बुद्धि से ईश्वर को कैसे पकड़ सकते हैं? संभव ही नहीं है। तो ध्यान कैसे करें? जब मन और बुद्धि से ईश्वर को जाना ही नहीं जा सकता तो इन्हें ईश्वर के चरणों में अर्पित कर देना ही उचित है। कबीरदास ने इसीलिए कहा है-

कबीर यहु घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
सीस उतारे हाथि करि, सो पैसे घर माहिं।।

सीस उतारे हाथि करि यानी अपने मन, अपनी बुद्धि और अपने अहंकार को नष्ट करने के बाद ही ईश्वरीय प्रेम के घर में प्रवेश किया जा सकता है। जब तक मैं, मैं, मैं लगा रहेगा, हम ईश्वर से दूर रहेंगे। जब तू, तू, तू यानी ईश्वर, ईश्वर, ईश्वर की रट हमारे अंतरमन में आ जाएगी तो बस काम बन जाएगा।
 ईश्वर सच्चे प्रेम के लिए लालायित रहते हैं। वे वहीं आकर्षित होते हैं जहां भक्त का सच्चा हृदय उन्हें पुकारता है।