Monday, March 9, 2009

आओ प्रभु

विनय बिहारी सिंह

(परमहंस योगानंद जी की कविता से प्रेरित होकर)
मेरी रगों में दौड़ता खून
मेरे दिल की धड़कन
मेरा मन
मेरी बुद्धि
मेरी आत्मा
तुम्हीं तो हो भगवन
हां, तुम्हीं तो हो।
मेरी हर सांस
मेरी हर याद
मेरा सब कुछ
प्रभु तुम्हीं तो हो।
कब आओगे भगवन
कब दोगे दर्शन

अब नहीं सहा जाता ।।
जल्दी आओ न
प्रभु, मेरे प्रिय
आओ,
खुला है मेरे हृदय का द्वार
और खुला रहेगा हमेशा
बहुत करा लिया इंतजार
आओ प्रभु, करो न देर

मेरे प्रियतम, आओ।।


Saturday, March 7, 2009

हनुमान जी ने जब लंकिनी पर मुक्के से प्रहार किया


विनय बिहारी सिंह

रामचरितमानस के सुंदरकांड में है कि जब माता सीता की खोज में हनुमान जी लंका रवाना हुए तो देवताओं ने उनकी परीक्षा के लिए सुरसा को उनके सामने भेजा। उसने हनुमान जी को खाने की इच्छा व्यक्त की। हनुमान जी ने कहा कि मैं माता सीता की खबर जब तक भगवान राम के पास नहीं पहुंचाता हूं, तुम्हारा भोजन नहीं बन सकता। पहले मुझे अपना काम कर लेने दो, इसके बाद स्वयं मैं तुम्हारे पास आ जाऊंगा। फिर तुम मुझे खा लेना। लेकिन सुरसा इसके लिए तैयार ही नहीं थी। तब हनुमान जी ने कहा- तो ठीक है मुझे खा। सुरसा ने अपना मुंह चार कोस जितना चौड़ा किया तो हनुमान जी ने उसका दूना अपना शरीर कर दिया। उसने आठ कोस का मुंह किया तो हनुमान जी ने १६ कोस का अपना शरीर कर लिया। जस- जस सुरसा बदन बढ़ावा।तासु दून कपि रूप दिखावा।।
बढ़ते बढ़ते सुरसा ने सौ योजना जितना मुंह चौड़ा किया तो हनुमान जी एक दम छोटे रूप में आ गए और उसके शरीर के भीतर घुस कर बाहर निकल गए। सुरसा ने उनके इस कौशल पर उन्हें आशीर्वाद दिया। उसने हनुमान जी का लोहा मान लिया। फिर छाया से आकाश में उड़ने वाले जीवों को पकड़ खाने वाली राक्षसी को मारा। आगे बढ़ने पर लंका की राक्षसी लंकिन से सामना हुआ। लंकिनी ने कहा कि चोर ही तो उसके भोजन है। वह हनुमान जी को चोर की तरह लंका में घुसने वाला कह रही थी। हनुमान जी ने उसे एक मुक्का मारा। वह तुरंत खून उगलते हुए धराशायी हो गई। थोड़ी देर बाद किसी तरह कराहते हुए उठी और बोली- ब्रह्मा जी ने मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा था- जब किसी वानर की मार से तुम बेचैन हो जाओ तो समझना राक्षसों का अंत आ गया है। अब लगता है- राक्षस नहीं बचेंगे। उसी ने कहा-प्रविसि नगर कीजै सब काजा।हृदय राखि कौसलपुर राजा।। हे हनुमान जी भगवान राम को हृदय में रख कर जाइए। आपका काम अवश्य होगा। हालांकि हनुमान जी भगवान राम के विशेष दूत थे और हमेशा ही रहेंगे। भगवान राम ने उन्हें भरत की तरह प्रिय भाई कहा है। लेकिन लंकिनी अपनी श्रद्धा भगवान राम के प्रति व्यक्त कर रही थी। यानी लंकिनी जैसी राक्षसी भी भगवान राम की परम भक्त थी। ल

Friday, March 6, 2009

शाकाहार के समर्थन में मेरा एक विनम्र निवेदन


विनय बिहारी सिंह

रोज मेरे घर के सामने से कुछ कसाई बकरियों का झुंड ले जाते हैं। मैं कोलकाता में रहता हूं। सुबह- सुबह ये बकरियां जिस तरह चिल्लाती हुई जाती हैं, वह विलाप से भी बदतर लगता है। साफ है कि बकरियां जानती हैं कि उनकी हत्या की जाएगी। यह वही समझ सकता है जिसने बकरियों का यह चित्कार सुना हो। मैं रोज यह चित्कार सुन कर हिल जाता हूं। इन बकरियों का मांस खा कर हम कौन सी नियामत पाते होंगे, मेरी समझ से बाहर है। मुझे यह चित्कार कभी नहीं भूलती। सचमुच जो लोग कहते हैं कि मांस खाना अपने पेट को कब्र में तब्दील करना है, वे गलत नहीं कहते। शाकाहार के तो अनगिनत फायदे हैं। आप पहले वे चित्कार सुनें, फिर मांसाहार पर गौर करें। यह चित्कार कोलकाता में ही नहीं, हर कहीं सुनाई दे सकता है। पौधों और पेड़ों के फल व सब्जियां तोड़ना उनकी हत्या नहीं है। अगर आम आप नहीं तोड़ेंगे तो वह स्वतः ही पक कर गिर जाएगा। संतों ने तो कहा ही है-वृक्ष कबहुं न फल भखै, नदी न संचै नीरपरमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर। शाकाहार ही मनुष्य के लिए श्रेष्ठ है। ऐसा श्रेष्ठ पोषक तत्व विग्यानियों ने कहा है। (मैं तकनीकी कारणों से ग्य ही लिख पा रहा हूं।)प

ईश्वर चंद्र विद्यासागर


विनय बिहारी सिंह

ईश्वर चंद्र विद्यासागर १९ वीं शताब्दी में पश्चिम बंगाल में पैदा हुए। जन्म वर्ष है- १८२०। उनका असली नाम ईश्वर चंद्र बंद्योपाध्याय था। संस्कृत कालेज ने उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी थी। वे इसी कालेज के विद्यार्थी थे। विद्यासागर पश्चिम बंगाल के पुनर्जागरण के पुरोधाओं में से एक माने जाते हैं। उन्होंने बाग्लाभाषा में जो सहज बदलाव किए उससे बच्चों को बांग्ला भाषा सीखने में बहुत ज्यादा मदद मिली। आज भी नर्सरी के बच्चों को पढ़ने के लिए वर्ण परिचय नाम की जो पुस्तक पश्चिम बंगाल में दी जाती है, उस पर विद्यासागर का चित्र छपा होता है। इसके अलावा विधवा विवाह की पहल में ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आप आश्चर्य कर रहे होंगे कि इस आध्यात्मिक ब्लाग पर ईश्वर चंद्र विद्यासागर का उल्लेख क्यों? इसकी वजह यह है कि विश्वविख्यात संत और स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस उनसे मिलने उनके आवास पर गए थे। रामकृष्ण परमहंस उन्हें बहुत प्यार करते थे। वे कहते थे कि विद्यासागर को इस जगत के कल्याण के लिए ईश्वर ने भेजा है। विद्यासागर के पिता ने उन्हें कोलकाता के एक संस्कृत कालेज में दाखिल करा दिया। पिता के एक मित्र ने उन्हें सलाह दी कि विद्यासागर को अंग्रेजी की भी शिक्षा दी जानी चाहिए क्योंकि यह भाषा नौकरी दिलाने में मदद करती है। इस तरह विद्यासागर संस्कृत के साथ अंग्रेजी भी पढ़ने लगे। उन्होंने कानून की पढ़ाई भी की। १८४१ में फोर्ट विलियम कालेज में वे संस्कृत के प्रोफेसर नियुक्त हुए। वे जाति- पांति को नहीं मानते थे। इसके अलावा वे कालेज के पाठ्यक्रम में बदलाव भी चाहते थे। रूढ़िवादी मानसिकता के अध्यापकों ने विद्यासागर का विरोध किया। पांच साल बाद उन्होंने फोर्ट बिलियम कालेज छोड़ दिया और संस्कृत कालेज में असिस्टेंट सेक्रेटरी के तौर पर नियुक्त हुए। वहां भी सेक्रेटरी के साथ उनका मतभेद हुआ क्योंकि विद्यासागर चाहते थे कि सभी जातियों के लड़के संस्कृत कालेज में पढ़ें। सिर्फ एक जाति विशेष के लोग वहां न पढ़ें। इसी विरोध के कारण तीन साल बाद विद्यासागर ने संस्कृत कालेज छोड़ दिया। लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने इस कालेज में फिर नौकरी इस शर्त पर की कि उनकी बात सुनी जाएगी। इसके बाद सभी जातियों के लोगों को संस्कृत कालेज में प्रवेश मिलने लगा। इसी संस्कृत कालेज के वे विद्यार्थी रह चुके थे जिसने उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी। ईश्वर चंद्र विद्यासागर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने एलान किया कि बच्चों को विग्यान पढ़ाए बिना उनका ग्यान पूरा नहीं होगा। उन्होंने इसके लिए कापरनिकस, न्यूटन और हर्षल जैसे वैग्यानिकों की जीवनियों का अंग्रेजी से बांग्ला में अनुवाद किया ताकि जो अंग्रेजी नहीं जानते वे भी वैग्यानिकों और उनकी उपलब्धियों के बारे में जान सकें। पाश्चात्य दार्शनिक फ्रांसिस बेकन को अपने देश में लोगों ने उन्हीं के माध्यम से जाना। ईश्वर चंद्र विद्यासागर लेखक, चिंतक, समाजशास्त्री, दार्शनिक और समाज सुधारक थे। उन्हें याद करने से लगातार काम करने की प्रेरणा मिलती है।

Wednesday, March 4, 2009

कभी आपने जो चीज पसंद कर खरीदी थी, वह अब आकर्षक नहीं लगती?



विनय बिहारी सिंह


कई बार ऐसा होता है कि कोई चीज आपको बहुत पसंद आ गई। कोई दीवार घड़ी, पर्स या कोई फोटो। उसे आप घर ले आए। फोटो है तो उसे दीवार पर टांग दिया। लेकिन कुछ दिनों या महीनों के बाद लगता है कि वही चीज अब आकर्षक नहीं रही। उससे भी अच्छी कोई और चीज आपको भा गई। उससे भी अच्छा कोई और फोटो आपको खींच रहा है। क्या आपने सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? अगर ऐसा हो रहा है तो इसका अर्थ है कि हमें किसी बहुत सुंदर औऱ सुख देने वाली चीज की तलाश है और वह मिल नहीं रही। फोटो कुछ दिन अच्छा लगा लेकिन दिल को छू लेने वाला फोटो कहां है? तलाश जारी है। आखिर यह तलाश कब खत्म होगी? संतों ने कहा है वह तलाश भगवान के पास जाकर खत्म होगी। दरअसल हम खोज रहे हैं भगवान का ही सुख। लेकिन हमारे कंपास की सुई भौतिक वस्तुओं पर जा कर टिक जाती है। जैसे ही वह सुई भगवान के दिव्य आनंद को छूती है, अपूर्व आनंद महसूस होने लगता है। संत- महात्माओं ने कहा है कि एक बार आप भगवान की शरण में जाकर देखिए, आपके सारे तनाव और दुख वे खत्म कर देंगे। लेकिन पूर्ण शरणागति चाहिए। संत प्रश्न पूछते हैं- क्या आप ट्रेन में बैठते हैं तो अपना सामान सिर पर लिए रहते हैं? नहीं न? तो फिर जब भगवान रूपी ट्रेन पर चढ़ गए तो चिंता रूपी गठरी अपने सिर पर क्यों ढो रहे हैं भाई? सब कुछ भगवान पर छोड़िए और कुछ नहीं तो कम से कम आधा घंटा अपने मन को ईश्वर में लय कर दीजिए। फिर देखिए आप कितना तरोताजा महसूस करते हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-सर्व धर्मान परित्यज्ये, मामेकम शरणम व्रज।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।सभी धर्मों को छोड़ कर सिर्फ मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हारे सारे दोषों से मुक्त कर मोक्ष दे दूंगा, और कुछ मत सोचो। (अठारहवां अध्याय)। क्यों न हम इसे आजमा कर देंखें।

Tuesday, March 3, 2009

पूजा करने में मन न लगने की शिकायत


विनय बिहारी सिंह

अक्सर आपको यह सुनने को मिलेगा कि क्या करें पूजा का जो नियम है उसका पालन करता हूं, लेकिन मन का क्या करूं। कैसे उसे वश में करूं। दो मिनट तो ठीक रहता है, लेकिन उसके बाद मन हजार जगह भटकने लगता है। कई बार कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिलती। अब तो सोचता हूं, यह मेरे वश में नहीं है। यही सवाल एक सन्यासी से पिछले दिनों एक व्यक्ति ने पूछा। सन्यासी ने कहा- इसका मतलब है कि भगवान से भी ज्यादा आपको कोई चीज प्यारी है। उस व्यक्ति ने कहा- नहीं। ऐसा हो ही नहीं सकता। भगवान से बढ़ कर कोई हो ही कैसे सकता है। तब सन्यासी ने कहा- अगर भगवान से बढ़ कर कोई औऱ नहीं है तो फिर आपका मन भगवान से कौन हटाता है? उस व्यक्ति ने कहा- पता नहीं। लेकिन अचानक मन भटकने लगता है। सन्यासी ने पूछा- मन किसका है? उस व्यक्ति ने कहा- मेरा है। तब तो आपका मन आपके वश में होना चाहिए। उस व्यक्ति ने कहा- लेकिन यही तो समस्या है सन्यासी जी। मेरा मन है और मेरे कहने में नहीं है। सन्यासी ने कहा- यह तो बुरी बात है। तब आपका पहला काम है- अपने मन को वश में करना। जब आप चाहते हैं तो हाथ उठा देते हैं। या हाथ से काम करने लगते हैं। लेकिन जब आपका हाथ आपका कहना मानता है तो मन को आपका कहना मानना चाहिए। अगर नहीं मानता तो उसे नियंत्रण में लाने की कोशिश कीजिए। गीता में भगवान कृष्ण से अर्जुन ने पूछा कि मन को कैसे वश में करें। वह तो प्रचंड मथ देने वाला है। मन वायु के समान चंचल है। तो भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हां, यह सच है कि मन बहुत चंचल है। लेकिन उसे वश में करने के लिए अभ्यास और वैराग्य की जरूरत है। अभ्यास यानी जब भी मन भागे तो उसे खींच कर भगवान की तरफ लाइए। यह काम बार- बार करना पड़ेगा। ऊबने से या चिंतित होने से काम नहीं चलेगा। यह तो लगातार अभ्यास से होगा। और वैराग्य? वैराग्य यह कि यह संसार हमारा नहीं है। मेरे न रहने के पहले भी यह संसार था और मरने के बाद भी रहेगा। इसके अलावा यह संसार किसी का नहीं। सब माया का खेल है। संसार जितना लुभावना लगता है, उतना ही हमारे लिए पराया है। इसका मतलब यह नहीं कि संसार छोड़ देना चाहिए। संसार में रहना चाहिए लेकिन भगवान का हाथ पकड़ कर। रामकृष्ण परमहंस ने कहा है- संसार में एक हाथ से काम कीजिए और दूसरे हाथ से भगवान को पकड़े रहिए। यानी यह मान कर सारा काम कीजिए कि मैं अपनी ड्यूटी कर रहा हूं, असली करने वाला तो भगवान है। सारा काम भगवान को सौंप कर जीवन यापन करना ही वैराग्य है। घर- परिवार छोड़ कर जंगल में रहना वैराग्य नहीं है।

Monday, March 2, 2009

कथा भृगु संहिता की


विनय बिहारी सिंह

भृगु संहिता कैसे लिखी गई, इसकी एक रोचक कथा है। ऋषि भृगु हर लोक में कभी भी जा सकते थे। एक बार वे भगवान विष्णु से मिलने बैकुंठ लोक गए। द्वार पर जय- विजय नामक द्वारपालों ने उन्हें रोका। यह ऋषि भृगु के लिए चकित करने वाली बात थी। उन्हें आज तक कहीं किसी ने रोका नहीं था। वे क्रोधित हो गए। उन्होंने जय- विजय को श्राप दे दिया। द्वारपालों ने सिर झुका लिया और उन्हें विष्णु भगवान के पास जाने दिया। उन्होंने जा कर देखा कि विष्णु भगवान सो रहे हैं और माता लक्ष्मी उनका पैर दबा रही हैं। भृगु ऋषि को लगा कि भगवान सोने का बहाना कर रहे हैं। उन्होंने गुस्से में विष्णु भगवान की छाती पर जोर से लात मारी। विष्णु भगवान ने आंखें खोलीं और हाथ जोड़ कर बोले- ऋषिवर, कहीं आपके पैर में चोट तो नहीं लगी। भगवान की यह विनम्रता देख कर भृगु जी चकित हुए। लेकिन माता लक्ष्मी को क्रोध आ गया। उन्होंने भृगु ऋषि को शाप दिया- आपने मेरे पति का अपमान किया है, इसलिए मैं शाप देती हूं कि अब तक तपस्या के लिए आप सबको बिना प्रयत्न के ही फल- फूल और धन मिल जाया करता था। लेकिन अब आपको इसके लिए श्रम करना पड़ेगा। । भृगु ऋषि ने कहा कि माता मैंने तो विष्णु भगवान से माफी मांग ली है। लेकिन जब आपने शाप दे ही दिया तो मैं एक ऐसा ज्योतिष ग्रंथ लिखूंगा, जिसके आधार पर हमारे जैसे ऋषि और अन्य ब्राह्मण अद्भुत भविष्यवाणी करेंगे और उससे उनकी जीविका चलेगी। इसके बाद वे अपने आश्रम में गए और भृगु संहिता की रचना की। लेकिन आज मूल भृगुसंहिता कहीं नहीं है। हालांकि जहां जहां भृगु संहिता होने की बात कही जाती है, वहां के लोग उसे ही मूल भृगु संहिता कहते हैं और बाकी को जाली। होशियारपुर (पंजाब) में एक भृगुसंहिता का पता चला था। लेकिन वहां जाने पर पता चला कि वहां पहुंचने वाले प्रश्नकर्ता या जातक की प्रश्न कुंडली बना कर भविष्यवाणी की जाती है। प्रश्न कुंडली तो दक्षिण भारत की कृष्णमूर्ति पद्धति में भी है और बहुत ज्यादा सटीक है। इसलिए वहां मूल भृगु संहिता है, इस पर शंका हो गई। वैसे भृगु संहिता में जो बातें हैं, उन्हें संक्षेप में यहां दिया जा रहा है-गणितीय ज्योतिष औऱ फलित ज्योतिष और अंक ज्योतिष। इसमें जन्म कुंडली, विंशोत्तरी दशा, भविष्यवाणी, पूर्व जन्म का ब्यौरा, जीवन की घटनाएं और ज्योतिषीय उपाय।मुझे इस संबंध में यही कहना है कि दक्षिण भारत की कृष्णमूर्ति पद्धति ज्यादा सटीक होती है। मैं स्वयं, उसी का विद्यार्थी रहा हूं। उससे भविष्यवाणी करने में सुविधा होती है।