Saturday, January 12, 2013

स्वामी विवेकानंद



रामकृष्ण परमहंस
आज स्वामी विवेकानंद की १५०वां जन्मदिन है। स्वामी जी का जन्म कोलकाता के ३,गौड़ मोहन मुखर्जी स्ट्रीट स्थित घर में १२ जनवरी १८६३ को हुआ था। उनका पूरा नाम नरेंद्रनाथ दत्त। उन्होंने ४ जुलाई १९०२ को अपने पार्थिव का त्याग कर दिया। स्वामी जी के गुरु थे रामकृष्ण परमहंस। जब स्वामी विवेकानंद अपने होने वाले गुरु से मिले तो उन्होंने उनसे पूछा- क्या आपने ईश्वर को देखा है? रामकृष्ण परमहंस ने कहा- हां ठीक उसी तरह देखा है जैसे तुमको देख रहा हूं और ईश्वर से उसी तरह बातें की हैं जैसे तुमसे कर रहा हूं। यह स्वामी जी की ईश्वर के बारे में पहली प्रत्यक्ष जानकारी थी। उन्हें पहली बार लगा कि ईश्वर का साक्षात्कार किया जा सकता है। स्वामी जी ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपने गुरु के बारे में कहा- मैंने उनके जैसा विलक्षण व्यक्ति पूरे संसार में नहीं देखा। रामकृष्ण परमहंस लाल किनारे वाली धोती पहनते थे। उनके व्यक्तित्व में जादुई आकर्षण था। वे अपने ड्रेस के प्रति बहुत सतर्क नहीं रहते थे। साधारण धोती और कुर्ता। दाढ़ी बढ़ी हुई। शरीर दुबला- पतला। लेकिन उनके शरीर और चेहरे में जो तेज और गहरा आकर्षण था, वह अनोखा था। वे अवतार पुरुष थे।

स्वामी विवेकानंद ने कहा है- हम ईश्वर के जितने समीप आते जाते हैं, उतने ही अधिक स्पष्ट रूप से देखते हैं कि सब कुछ उसी में है। जब जीवात्मा इस परम प्रेमानंद को आत्मसात करने में सफल हो जाता है, तब वह ईश्वर को सर्वभूतों में देखने लगता है। इस प्रकार हमारा हृदय प्रेम का एक अनंत स्रोत बन जाता है। ईश्वर प्रेम से अलौकिक शक्ति मिलती है। प्रेम से भक्ति उत्पन्न होती है। प्रेम ही ज्ञान देता और प्रेम ही मुक्ति की ओर ले जाता है।

1 comment:

enter2050 said...

आदरनीय, विजय सिंगजी

गुगल पर ऎसे ही मन शांती के उपाय धुंड रहा था तो आपके वेब साईड की लींकं मीली . लेख पढने के बाद मुझे बहोत राहत मह्सुस हुई. और पढते-पढते मैने आपके सभी लेख पढ लीये और मेरे पास संग्राहीत भी कर लीये . मै आपके लेखन से बहोत ही प्रभावीत हुं लेख पढते वक्त ऎसा लगता है मानो कोई हमे बैठ कर समझा रहा हो . मेरा मानना है की इस तरह का लेख वही व्यक्ती लीख सकता है तो अंतर मुख हो . जिसके पास ग्यान हो. मुझे और मेरे जैसे लोगोको ग्यान की बाते सिखाने के लीये धन्यवाद

निलेश राठोड